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शुक्रवार, 21 मार्च, 2003 को 21:09 GMT तक के समाचार
 
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सद्दाम की ज़िंदगी के अहम पड़ाव
सद्दाम हुसैन पिछले दो दशकों से इराक़ के राष्ट्रपति हैं
सद्दाम हुसैन पिछले दो दशकों से इराक़ के राष्ट्रपति हैं
 

सद्दाम हुसैन का जन्म 1937 के अप्रैल महीने में बग़दाद के उत्तर स्थित तिकरित में एक गाँव में हुआ.

1957 में युवा हुसैन ने बाथ पार्टी की सदस्यता ली जो अरब राष्ट्रवाद के एक समाजवादी रूप का अभियान चला रही थी.

ब्रिटेन ने तत्कालीन राष्ट्रसंघ से अनुमति लेने के बाद 1920 से 1932 तक इराक़ पर शासन किया था और इसके बाद के वर्षों में भी इराक़ पर उनका राजनीतिक और सैनिक प्रभाव क़ायम रहा.

स्वाभाविक तौर पर देश में पश्चिम के ख़िलाफ़ ज़बरदस्त विरोध की भावना घर कर चुकी थी.

आख़िरकार 1962 में इराक़ में विद्रोह हुआ और ब्रिगेडियर अब्दुल करीम क़ासिम ने ब्रिटेन के समर्थन से चल रही राजशाही को हटाकर सत्ता अपने क़ब्ज़े में कर ली.

क़ासिम सरकार के ख़िलाफ़ भी बग़ावत हुई और ब्रिगेडियर क़ासिम को मारने का प्रयास किया गया जो नाक़ाम रहा.

सद्दाम का परिवार
सद्दाम के परिवार के कई लोग इराक़ी सत्ता में महत्वपूर्ण पदों पर रहे हैं
 

सद्दाम हुसैन भी इसमें शामिल थे और इस षडयंत्र के बाद उन्हें भागकर मिस्र में शरण लेनी पड़ी.

लेकिन वे फिर लौटे 1963 में, जब बाथ पार्टी ने विद्रोह के बाद सत्ता हासिल कर ली.

मगर कुछ ही महीनों में ब्रिगेडियर क़ासिम के सहयोगी कर्नल अब्द-अल-सलाम मोहम्मद आरिफ़ ने बाथ पार्टी को गद्दी से हटाने में क़ामयाबी पाई.

एक बार फिर सद्दाम हुसैन सींखचों के पीछे डाल दिए गए.

फिर 1966 में वे जेल से भाग निकले और बाथ पार्टी के सहायक महासचिव बने.

सत्ता

1968 में फिर विद्रोह हुआ और इस बार 31 वर्षीय सद्दाम हुसैन ने जेनरल अहमद हसन अल बक्र के साथ मिलकर सत्ता पर क़ब्ज़ा किया.

दोनों ही तकरित के थे, रिश्तेदार थे और जल्दी ही दोनों बाथ पार्टी के सबसे प्रभावशाली नेता बन बैठे.

जनरल अल बक्र के नेतृत्व में सद्दाम हुसैन ने कई ऐसे क़दम उठाए जिनसे पश्चिमी जगत के माथे पर शिकन पैदा हो गई.

1972 में इराक़ ने तत्कालीन सोवियत संघ के साथ उस वक्त पंद्रह साल का सहयोग समझौता किया जब शीतयुद्ध अपनी चरम सीमा पर था.

इराक़ ने अपनी उन तेल कंपनियों का भी राष्ट्रीयकरण कर दिया जो पश्चिमी देशों को तब तक काफ़ी सस्ती दरों पर तेल दे रही थीं.

1973 में आया तेल संकट और उस वक़्त जो भी फ़ायदा हुआ उसका निवेश देश के उद्योग, शिक्षा और स्वास्थ्य में किया गया.

जल्दी ही जीवन स्तर के मामले में इराक़ का स्थान अरब जगत में सबसे ऊपर के देशों में माना जाने लगा.

धीरे-धीरे सद्दाम हुसैन ने सत्ता पर अपनी पकड़ मज़बूत की और अपने रिश्तेदारों तथा सहयोगियों को महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त करते चले गए.

पकड़

1978 में नया क़ानून बना और विपक्षी दलों की सदस्यता लेने का मतलब जान से हाथ धोना माना जाने लगा.

सद्दाम हुसैन
अमरीका ने ढाई करोड़ डॉलर का इनाम घोषित कर रखा था
 

माना जाता है कि अगले ही साल यानी 1979 में, सद्दाम हुसैन ने ख़राब स्वास्थ्य के नाम पर जनरल बक्र को इस्तीफ़ा देने के लिए मजबूर कर दिया और ख़ुद देश के राष्ट्रपति बन बैठे.

आरोप हैं कि सत्ता संभालते ही उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वियों को मारना शुरू कर दिया.

कुछ वर्ष पहले इस सिलसिले में एक बार किसी यूरोपीय पत्रकार ने सद्दाम हुसैन से पूछा कि इराक़ी सरकार के अपने विरोधियों को मारने की बात क्या सही है तो सद्दाम ने बिना विचलित हुए कहा था - "निश्चित रूप से."

सद्दाम हुसैन के शब्द थे - "'आप क्या अपेक्षा करते हैं? जब वे आपकी सत्ता का विरोध कर रहे हों?"

 
 
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