|
|
 |
गुरुवार, 12 दिसंबर, 2002 को 09:43 GMT तक के समाचार यूरोपीय संघ का विस्तार
|

सम्मेलन में कड़े सुरक्षा इंतज़ाम
|
यूरोपीय संघ की कोपनहेगन में हो रही बैठक में पूर्वी यूरोप के कुछ सदस्यों को शामिल किए जाने की संभावना है.
इनमें पोलैंड, हंगरी, चेक गणराज्य,स्लोवाकिया, स्लोवेनिया, एस्टोनिया, लिथुवानिया और लेटविया के अलावा साइप्रस और मालटा शामिल हैं.
कोपनहेगन में विदेश नीति निर्धारित करने वाले एक प्रमुख नेता हाविए सोलाना का कहना है कि साइप्रस के शामिल होने का रास्ता साफ करने के लिए समझौता हो सकता है.
इसके तहत साइप्रस का ग्रीक और तुर्की बोलने वाले हिस्से दोनों ही संघ का सदस्य बन पायेंगे.
यदि इस बारे में अंतिम समझौता नहीं भी होता तो भी इस बैठक में उसके बहुत नज़दीक पहुँचा जा सकेगा.
 तुर्की पर विवाद | यूरोपीय संघ का विस्तार 2004 में लागू होगा और इसे शीत युद्ध के बाद एक बार फिर यूरोप के एकीकरण के ऐतिहासिक क़दम के रूप में देखा जा रहा है.
यूरोपीय संघ के विस्तार के बाद एक ऐसी राजनीतिक और आर्थिक इकाई तैयार हो जाएगी जिसमें 45 करोड़ लोग शामिल होंगे.
चीन और भारत के बाद यूरोपीय संघ संख्या के आधार पर तीसरे नंबर पर होगा.
यूरोपीय संघ विश्व व्यापार में एक बड़ी ताक़त के रूप में उभरा है और यूरोपीय आयोग के ज़रिए अमरीका के साथ बराबरी के आधार पर व्यापार करता है.
पर यूरोप की आर्थिक प्रगति अमरीका से बहुत कम है और इन नए ग़रीब देशों के संघ में शामिल होने से उसकी स्थिति कमज़ोर ही होगी.
पर सवाल यह उठता है कि इसका राजनीतिक स्तर पर क्या असर पड़ेगा.
विदेश नीति
यूरोपीय संघ एक देश नहीं है और उसकी विदेश नीति भी हर मामले में एक नहीं है.
एक राष्ट्रपति या एक विदेशमंत्री नियुक्त करने की चर्चा चल रही है.
माना जा रहा है कि यह विदेश नीति में यूरोप को एक स्वर में बोलने का रास्ता तैयार कर पाएगी.
कई लोगो का मानना है कि 15 से 25 की सदस्यता यूरोपीय संघ को एक ढीला-ढाला संगठन बना देगी यानी कोई भी निर्णय लेना इसके लिए और भी मुश्किल होगा.
इसलिए राजनीतिक स्तर पर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में यूरोपीय संघ अमरीका का मुक़ाबला नहीं कर सकता. सैनिक मुक़ाबला तो फिर बहुत दूर की बात है.
पर संघ का विस्तार उसके झगड़े सुलझाने की क्षमता और क्षेत्र में लोकतंत्र विस्तार में उसकी सफलता को दिखाती है.
यूरोपीय संघ का हिस्सा बनने की कोशिश में पूर्वी यूरोप में कई सीमा विवाद और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के मामले जल्दी सुलझे है.
तुर्की में भी मानवाधिकार सुधार और लोकतंत्र को मज़बूत बनाने की कोशिश तेज़ कर दी गई है ताकि तुर्की संघ का सदस्य बन सके.
तुर्की को जिस तरह अमरीका और अन्य देशों का समर्थन मिल रहा है वह अन्य मुस्लिम राज्यों को दिखाएगा कि एक समृद्ध लोकतंत्र स्थापित करना नामुमक़िन नहीं है.
पर दुनिया के लाखों ग़रीब लोगो के लिए यूरोप एक और मज़बूत किला साबित होगा और उनका प्रवेश और भी मुश्किल. |
|
|
|