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बुधवार, 04 सितंबर, 2002 को 10:32 GMT तक के समाचार
बीमा कराना कई गुना महँगा
बीमा कंपनियों के लिए जोखिम की परिभाषा ही बदल गई
बीमा कंपनियों के लिए जोखिम की परिभाषा ही बदल गई

ग्यारह सितंबर के हमलों के बाद बीमा कंपनियों ने लगभग 50 अरब डॉलर की भरपाई की है.

कई बीमा कंपनियाँ दावों का निबटारा करने के बाद कंगाल हो गई हैं और कई कंपनियों को भविष्य की चिंता में अपना प्रीमियम बढ़ाना पड़ा है.

कई बीमा कंपनियों ने पिछले वर्ष सितंबर महीने के अंत में ही भविष्यवाणी कर दी थी कि बीमा के प्रीमियम पहले के मुक़ाबले बहुत बढ़ जाएँगे.


वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले के बाद सैकड़ों बीमा दावे किए गए
मिसाल के तौर पर वाशिंगटन में व्हाइट के हाउस के निकट खड़ी एक इमारत के मालिक से कहा गया कि इस वर्ष उन्हें बीमा के लिए 40 लाख डॉलर देने होंगे, जो पिछले वर्ष तक सिर्फ़ 20 लाख डॉलर था.

कई कंपनियाँ अपने घाटे को प्रीमियम बढ़ाकर पूरा करना चाहती हैं लेकिन इससे उन्हें नुक़सान भी हो रहा है.

नुक़सान की एक बड़ी वजह ये है कि कई छोटे व्यापारियों और आम लोगों ने ऊँचे प्रीमियम से तंग आकर बीमा ही न कराने का फ़ैसला कर लिया है.

फुटबॉल वर्ल्ड कप का आयोजन करने वाली फ़ीफ़ा ने भी माना कि प्रतियोगिता के आयोजन का ख़र्च महँगे बीमा प्रीमियम के कारण बहुत बढ़ गया.

आरोप

कुछ लोगों का आरोप है कि बीमा कंपनियों ने अपनी कमाई बढ़ाने के लिए ग्यारहर सितंबर को एक बहाना बना लिया है.


ख़तरा हर जगह है और जोखिम हम जितना समझते हैं उससे ज़्यादा है

जो हार्वड
दूसरी ओर, बीमा कंपनियों का कहना है कि दुनिया भर में सभी मान रहे हैं कि आतंकवादी हमलों का ख़तरा बढ़ा है, ऐसे में बीमा कंपनियाँ भुगतान करने के लिए पैसा कहाँ से लाएँगी.

यह बात सच है कि पिछले कई दशकों में बीमा की दरें इतनी ऊँची कभी नहीं रहीं लेकिन बीमा क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि जोखिम की परिभाषा ही बदल चुकी है.

एक बड़ी बीमा कंपनी के प्रमुख जो हार्वड कहते हैं, "क्या कभी किसी ने कल्पना की थी कि वर्ल्ड ट्रेड सेंटर जैसी इमारत धूल में मिल जाएगी और हज़ारों लोग बीच न्यूयॉर्क में मारे जाएँगे."

उनका कहना है, "बीमा कंपनियों को जो 50 अरब डॉलर भरने पड़े हैं, उसने हम सबको को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि ख़तरा हर जगह है और उससे कहीं अधिक है जितना हम सोचते हैं."

हार्वड कहते हैं, "हम आख़िर ऐसी किसी स्थिति से निबटने के लिए पैसा कहाँ से लाएँगे, सब लोग उसके बारे में सोचते हैं जिसका नुक़सान हुआ है लेकिन असली नुक़सान तो हमें होता है."
 
 
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