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सोमवार, 13 मई, 2002 को 03:28 GMT तक के समाचार काबुल में 'महँगाई बढ़ाते विदेशी'
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सड़कों पर अब बड़ी गाड़ियों की भीड़
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अफ़ग़ानिस्तान में काम कर रही सहायता एजेंसियों के एक संगठन ने आगाह किया है कि विदेशी संस्थाओं की वजह से वहाँ चीज़ों की क़ीमतें बहुत तेज़ी से बढ़ रही हैं.
अफ़ग़ानिस्तान में काम रही सहायता एजेंसियों के बीच समन्वय करने वाली संस्था एसीबीएआर का कहना है कि संयुक्त राष्ट्र जैसे संगठन लोगों को अधिक वेतन, किराया और क़ीमत देकर स्थानीय अर्थव्यवस्था को बिगाड़ रहे हैं.
एसीबीएआर का कहना है कि इस वजह से अर्थव्यवस्था तो ख़राब हो ही रही है, साथ ही अंतरिम प्रशासन की नौकरियों के लिए उपयुक्त लोगों का मिलना मुश्किल हो रहा है.
काबुल में कीमतें बढ़ रही हैं और स्थानीय प्रशासन के लिए उपयुक्त लोगों का मिलना मुश्किल होता जा रहा है | | एसीबीएआर | एसीबीएआर के मुताबिक काबुल अंतरराष्ट्रीय सहायता एजेंसियों की पसंदीदा जगह बन गया है जिसकी वजह से शहर में डॉलर लेकर घूमने वालों की भरमार हो गई है.
सहायता एजेंसियों के लोग भी मानते हैं कि उनकी बड़ी संख्या में मौजूदगी एक समस्या बन गई है.
तालेबान के पतन के बाद से अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में काबुल में परियोजनाएँ शुरू करने की होड़ सी लगी है.
अफ़ग़ानिस्तान की अंतरिम सरकार को बड़ी संख्या में कर्मचारियों की ज़रूरत है लेकिन वे अपने कर्मचारियों को उतना वेतन नहीं दे सकते जितना ये एजेंसियाँ दे रही हैं.
मिसाल के तौर पर अफ़ग़ानिस्तान की अंतरिम सरकार के अधिकारी को 30 डॉलर प्रति माह मिलते हैं जबकि अंतरराष्ट्रीय एजेंसियाँ अपने ड्राइवरों को 500 डॉलर तक वेतन देती हैं.
इन एजेंसियों का कहना है कि उनका वेतन अंतरराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से तय होता है.
लेकिन एसीबीएआर के इयन पर्वेस का कहना है कि वेतन की ये असमानता कम होनी ही चाहिए.
किराए की समस्या
इसके अलावा मकान और दफ़्तर के किराए का सवाल भी गंभीर होता दिख रहा है.
काबुल में रहने लायक़ हालत में बहुत कम मकान हैं और घर छोड़कर भागे लोग बड़ी संख्या में काबुल लौट रहे हैं.
पर्वेस कहते हैं, अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों को भी मकान और दफ़्तरों की बहुत ज़रूरत है, वे ऊँचा किराया दे सकते हैं इसलिए स्थानीय लोगों को रहने की जगह मिलना मुश्किल होता जा रहा है.
एसीबीएआर का कहना है कि काबुल जल्द से जल्द किराया नियंत्रण की व्यवस्था बनाने की ज़रूरत है. |
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