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शनिवार, 11 मई, 2002 को 09:58 GMT तक के समाचार कैफ़ी आज़मी नहीं रहे
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प्रगतिशील शायरों की शृंखला की अंतिम कड़ी कैफ़ी आज़मी
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उर्दू के मशहूर शायर और फ़िल्मी गीतकार कैफ़ी आज़मी का 82 वर्ष की आयु में दिल का दौरा पड़ने से मुंबई में निधन हो गया है.
इसके साथ ही प्रगतिशील लेखक संघ का आख़िरी स्तंभ भी ढह गया है.
मजाज़, जाँनिसार अख़्तर, साहिर लुधियानवी, मजरूह सुलतानपुरी और सज्जाद ज़हीर की परिपाटी को वह अंतिम समय तक जीवित रखे रहे.
कैफ़ी साहब के निधन के साथ ही एक युग का समापन हो गया है | | जावेद अख़्तर | कैफ़ी का जन्म उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ ज़िले के एक ज़मींदार परिवार में हुआ.
उनको बचपन से ही मज़हबी तालीम दी जाने लगी.
लेकिन उन्हें बचपन से ही शायरी का शौक था.
उपनाम
अतहर हुसैन रिज़वी ने जब शायरी की दुनिया में क़दम रखा तो उन्होंने अपना तख़ल्लुस कैफ़ी रख लिया.
उन्होंने ग्यारह वर्ष की आयु में अपने पहले मुशायरे में शिरकत की.
उस ज़माने की उनकी एक ग़ज़ल बेहद लोकप्रिय हुई और बेगम अख़्तर की आवाज़ उसमें शामिल होने के बाद तो वह बच्चे-बच्चे की ज़ुबान पर आ गई.
उसका पहला शेर थाः इतना तो ज़िंदगी में किसी की ख़लल पड़े, हँसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े.
युग का अंत
मशहूर शायर और फ़िल्मी पटकथा लेखक और गीतकार जावेद अख़्तर उनके दामाद हैं.
उनका कहना है कि यह निधन उनके लिए एक व्यक्तिगत क्षति है, "मेरा उनका संबंध शबाना की वजह से भी था और एक शायर होने के नाते भी. मुझे बड़ा अफ़सोस है कि कैफ़ी साहब के निधन के साथ ही एक युग का समापन हो गया है".
 शबाना के लिए एक निजी क्षति | लड़कपन से ही वह शोषित वर्ग, किसानों और मज़दूरों की समस्याओं से उलझते रहे और 1943 में कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए.
वर्ष 1947 में उन्होंने शौकत कैफ़ी से विवाह किया जो बाद में थियेटर और फ़िल्म जगत की एक जानी मानी हस्ती बन गईं.
कैफ़ी ने उस दौर के अधिकतर शायरों की तरह अपने लेखन की शुरुआत ग़ज़लों से की लेकिन फिर साम्यवादी आंदोलन के साथ अपनी निकटता के कारण वह नज़्मों की ओर मुड़े और उनकी क़लम ने उस तबक़े की तकलीफ़ों को समाज के सामने पहुंचाना शुरू कर दिया.
प्रख्यात शायर निदा फ़ाज़ली का कहना है, "वह अपने प्रभावशाली अंदाज़ और आवाज़ से स्टेज पर एक रंग जमा देते थे. लोग तरन्नुम से पढ़ने वालों के बजाय उन्हें सुनना ज़्यादा पसंद करते थे."
फ़िल्मों से उनका जुड़ाव एक सुखद संयोग रहा और फ़िल्म जगत को साहित्यिक रचनाओ का एक अनूठा ख़ज़ाना हाथ आया.
अर्थपूर्ण गीत
उनके कुछ मशहूर फ़िल्मी गीत हैः तुम इतना क्यों मुसकरा रही हो (अर्थ), जाने क्या ढूढँती रहती हैं यह आँखें मुझमें (शोला और शबनम)वक़्त ने किया क्या हसीं सितम (काग़ज़ के फूल), चलो दिलदार चलो चाँद के पार चलो (पाकीज़ा), होके मजबूर मुझे उसने भुलाया होगा (हक़ीक़त), या दिल की सुनो दुनियावालो (अनुपमा) आदि सार्थक और श्रेष्ठ गीतों की एक लंबी सूची है.
वह अपने प्रभावशाली अंदाज़ और आवाज़ से स्टेज पर एक रंग जमा देते थे | | निदा फ़ाज़ली | फ़िल्म हीर रांझा उनके फ़िल्मी लेखन में एक मील का पत्थर रही जिसके सभी डायलॉग काव्यमय थे.
उन्हें अनेक साहित्यिक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया जिनमें सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार और ऐफ़्रो ऐशियन लोटस पुरस्कार प्रमुख हैं.
भारत सरकार ने उनको पद्मश्री की उपाधि दी.
उनकी कृतियाँ झंकार, आख़िर-ए-शब, आवारा सजदे और इबलीस की मजलिसे शूरा के नाम से प्रकाशित हुईं.
शौकत आज़मी के पति, शबाना आज़मी के पिता और जावेद अख़्तर के श्वसुर कैफ़ी आज़मी का निधन भारत और अन्य देशों के अनगिनत संगीत प्रेमियों और शायरी में दिलचस्पी रखने वाले लोगों के लिए एक अपूरणीय क्षति है. |
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