|
|
 |
गुरुवार, 04 अप्रैल, 2002 को 12:36 GMT तक के समाचार विवाद का क्षेत्र पर प्रभाव
|

हिज़्बुल्लाह के लोग अभी भी अपना अभियान जारी रखे हैं
|
अरब-इसराइली संघर्ष ने इस पूरे क्षेत्र यानी मोरोक्को से लेकर खाड़ी तक अपनी एक स्थायी छाप छोड़ दी है.
इसराइल को अस्तित्व में आए आधी शताब्दी से ज़्यादा समय बीत चुका है लेकिन अरब जनता की नई पीढ़ी के लिए यह संघर्ष उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा है.
यह न केवल अरब जगत की राजनीति में घुलमिल गया है बल्कि यह इस क्षेत्र की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक भावना का एक हिस्सा बन गया है.
 इसराइल के ख़िलाफ़ रोष है | लेकिन फ़र्क़ सिर्फ़ यह है कि अब सोचने का ढंग बदल गया है.
पुरानी पीढ़ी अभी भी विगत के अन्याय और नुक़सान का ज़िक्र करती है जबकि युवा अरब टेलीविज़न के पर्दे पर इसराइली-फ़लस्तीनी हिंसा के दृश्य देख-देख कर धैर्य खो चुके हैं और इस बारे में कोई ठोस कार्रवाई चाहते हैं.
पश्चिमी तट और ग़ज़ा पट्टी में रह रहे फ़लस्तीनियों के लिए अरब-इसराइली संघर्ष अब एक छाया मात्र नहीं रहा है-उसे तो वे जी रहे हैं, उसमें साँस ले रहे हैं.
इसराइल की सीमा से जुड़े हुए अरब राष्ट्रों के लिए मध्य पूर्व समस्या उनके दिन-प्रति-दिन के जीवन को उतनी गहराई से प्रभावित नहीं करती है.
 मिस्र के दिवंगत राष्ट्रपति अनवर सादात | लेकिन लेबनान और सीरिया विशेषकर, तब तक किसी और पहलू पर विचार ही नहीं कर सकते जब तक इस समस्या का कोई स्थायी समाधान न निकल आए.
लेबनान में 1975 से 1990 तक चले गृह-युद्ध में अरब-इसराइल संघर्ष एक प्रमुख वजह थी जिनसे इस समृद्ध देश को तबाही की कगार पर पहुंचा दिया.
अब इसराइल और लेबनान के बीच कोई शांति समझौता भी नहीं है और उनकी सीमा पर छिटपुट झड़पें चलती रहती हैं.
ईरान-समर्थित हिज़्बुल्लाह छापामार इसराइली ठिकानों पर हमले करते रहते हैं जबकि इसराइली विमान जब-तब लेबनान की वायु-सीमा में प्रवेश कर जाते हैं.
उधर, लेबनान के राजनीतिक जीवन पर सीरिया की इतनी गहरी छाप है कि इसराइल के साथ तब तक उसका कोई शांति समझौता हो ही नहीं सकता जब तक सीरिया से उसके संबंध अच्छे न हो जाएं.
 सीरियाई राष्ट्रपति हाफ़िज़ असद |
मिस्र वह पहला अरब राष्ट् है जिसने इसराइल के साथ संबंध बहाल किए और इससे उसे आर्थिक लाभ भी हुए.
जोर्डन को भी हाल के दिनों में अमरीका और अन्य जगह से वित्तीय सहायता हासिल हुई है.
लेकिन इन देशों के इसराइल के साथ संबंध औपचारिक ही हैं उनमें घनिष्ठता नहीं है.
इसकी वजह शायद यह है कि आम जनता के मन में अभी भी इसराइल के लिए ग़ुस्सा मौजूद है.
वैसे दूरदराज़ के अरब देशों के लिए भी इसराइल संकट का निबटारा लाभदायक ही साबित होगा.
सबसे प्रमुख बात यह होगी कि इससे सीमाएं खुलेंगी और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में बढ़ोतरी होगी. |
|
|
|