ईंटों में दफ़न बचपन

23 मार्च 2014 अतिम अपडेट 19:21 IST पर

महानगर हों या क़स्बे बहुमंजिला इमारतों और मॉल्स की संस्कृति हर जगह पैर पसार रही है. मगर ये इमारतें जिन ईंटों से तैयार होती हैं, उन्हें बनाने में कई बच्चों का बचपन छिन जाता है. देखिए तस्वीरें
ईंट भट्टों में जीवन
बहुमंज़िला इमारतें बनने में बहुत सारी ईंटें लगती हैं और इनका निर्माण होता है ईंट भट्टों में. (सभी तस्वीरें अंकित पाण्डेय की)
ईंट भट्टों में जीवन
इलाहाबाद के नज़दीक इस ईंट भट्टे पर आधुनिक उपकरणों का दूर-दूर तक कोई निशान नहीं है.
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इस भट्ठे पर ज़्यादातर काम हाथ से ही होता है और मज़दूरों को कई बार लगातार 20 घंटे तक काम करना पड़ता है.
ईंट भट्टों में जीवन
ज़्यादातर मज़दूर बिहार और उड़ीसा से अपने पूरे परिवार के साथ काम करने आते हैं.
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इन परिवारों में बच्चे भी होते हैं और ग़रीबी के चलते उन्हें काम पर लगा दिया जाता है.
ईंट भट्टों में जीवन
आधुनिक जीवन तो दूर की बात है, इन्हें शिक्षा और मूलभूत स्वास्थ्य सुविधाएं तक नहीं मिलतीं.
ईंट भट्टों में जीवन
ये बच्चे ज़्यादातर बाहर से आए परिवारों के होते हैं और ईंट-भट्टों के ठेकेदार इन्हें बात करने की इजाज़त भी नहीं देते.
ईंट भट्टों में जीवन
अक्सर बच्चों की मज़दूरी की शुरुआत कोयला तोड़ने जैसे कामों से होती है.
ईंट भट्टों में जीवन
इनके माता-पिता ख़ुद तो दिन-रात मेहनत करते हैं, पर उनमें इतनी हिम्मत नहीं होती कि वे अपने बच्चों को ठेकेदारों के चंगुल बचा सकें.
ईंट भट्टों में जीवन
कई बार कोशिश के बाद सावित्री देवी ने बात की और बताया कि ठेकेदार उन्हें एकमुश्त रक़म देकर देश के दूर-दराज़ के इलाक़ों में ले जाते हैं.
ईंट भट्टों में जीवन
एकमुश्त रक़म देकर लाए गए बच्चों को फिर ईंट भट्टों के मालिकों के हवाले कर दिया जाता है.
ईंट भट्टों में जीवन
कुछ मज़दूरों ने बताया कि कई बार उनका दिल भाग जाने को करता है, मगर ग़रीबी उन्हें ऐसा नहीं करने देती.
ईंट भट्टों में जीवन
बचपन से महरूम रहते हुए ये मासूम इन्हीं भट्टों में बड़े होते हैं और फिर इनकी ज़िंदगी इन्हीं भट्ठों में गुम हो जाती है.
ईंट भट्टों में जीवन
ख़ुद ईंट बनाने वाले ये बच्चे अपने कच्चे घरों को ही एक दिन अपना भविष्य मान लेते हैं.