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सागर किनारे...

 शुक्रवार, 2 अगस्त, 2013 को 12:34 IST तक के समाचार
  • नुकुस के नजदीक मिज़्दाखान का कब्रिस्तान
    नुकुस के नजदीक मिज़्दाखान का कब्रिस्तान. ईसा पूर्व चौथी शताब्दी के दौरान श्रद्धालुओं के लिए ये एक पवित्र जगह हुआ करती थी. उस जमाने में इस जगह का इस्तेमाल पारसी समुदाय के लोगों के शवों के अंतिम संस्कार के लिए होता था. बाद में इस्लामी तौर तरीके अपनाए जाने लगे. लेकिन खास बात यह थी कि इस जगह पर पारसियों का असर बरकरार रहा. इस स्थान पर मौजूद टीले का इस्तेमाल महिलाएँ संतान की इच्छा के लिए प्रार्थना करने में आज भी करती हैं. (ब्रितानी फ़ोटोग्राफ़र कैटरिओना ग्रे ने वहाँ की ये ख़ूबसूरत तस्वीरें ली हैं.)
  • मिज़्दाखान के कब्रगाह की एक कब्र
    मिज़्दाखान के कब्रगाह की एक कब्र. करकलपाक के कब्र ज्यादातर खुले हुए हैं. इससे पारसियों के शवों की अंत्येष्टि के तौर तरीके का आभास होता है, जिसमें मृत को खुले में छोड़ दिया जाता है.
  • सुडोकी के झील में मौजूद एक मछुआरा
    सुडोकी के झील के पास एक मछुआरा. अरल सागर तक पहुँचने से पहले आपको सुडोकी के झील और उजाड़ हो चुके मछुआरों के गाँव से होकर गुजरना होता है. हालांकि ये जगह पूरी तरह से कटी हुई है लेकिन इसके बावजूद अनुकूल मौसम में मछली मारने वाले मछुआरे यहाँ अब भी रहते हैं. जाड़ों के दिनों में वे झील से बर्फ ले आया करते हैं ताकि हिम गृहों में उसे भरा जा सके. इसका मतलब यह हुआ कि वे अपने शिकार को गर्मी से बचाकर रख सकते हैं.
  • सुडोकी झील के किनारे बना उर्गा का रूसी कब्रिस्तान
    सुडोकी झील के किनारे बना उर्गा का रूसी कब्रिस्तान. रूस के रूढ़िवादी “पुरानी मान्यताओं वाले लोगों” को कभी उर्गा में निर्वासित किया जाता था. सोवियत युग में यह जगह उजाड़ होने लगी. यह कब्रिस्तान बरकरार है और झील की पृष्ठभूमि इसकी खूबसूरती को बढ़ा देती है.
  • अरल का सागर तट
    अरल सागर तट. इस इलाके में जो हमारी गाइड थी वह करकलपाक में ही पैदा और बड़ी हुई थीं. मालूम पड़ता था कि उन्हें अपनी मातृभूमि से गहरा लगाव था. यहाँ आने वाले ज्यादातर लोग इसके पारिस्थितिकी तंत्र और सामाजिक व आर्थिक समस्याओं को तवज्जो दिया करते हैं. वह इस बात को समझ रही थीं कि हम इस इलाके की खूबसूरती पर ध्यान दे रहे हैं.
  • अरल के सागर तट की तरफ रुख किए हुए.
    हमने एक पथरीली सतह पर डेरा डाला था. उस चट्टान का रुख अरल के सागर तट की तरफ था. घने बादलों के पीछे छुप गए सूरज को देखने के लिए मैं सेवेरे उठ जाया करती थी. इस इलाके के पहाड़ और पत्थरों में पिस्ते के हरे रंग की झलक मिलती है. शायद इसकी वजह यहाँ के खनिज या इस जलवायु में पनपने वाले जीव होंगे.
  • दरकी हुई जमीन
    दरकी हुई जमीन. कभी यहाँ से समंदर की लहरें इकठ्ठा हुआ करती थीं. यहाँ की वनस्पतियाँ भी कड़ी होती हैं. जमीन दलदली और लवणीय है.
  • उस्टीयर्ट के पठार पर स्थित कजाख का कब्रगाह
    उस्टीयर्ट के पठार पर स्थित कजाख का कब्रगाह. साल 1930 में पड़े अकाल के दौरान कजाख लोगों ने भाग कर उजबेकिस्तान के उस्टीयर्ट पठार पर आकर शरण ली. लंबे सफर के बाद जो लोग मर गए थे उनकी कब्रें यहाँ देखी जा सकती हैं.
  • उस्टीयर्ट पठार का दर्रा
    उस्टीयर्ट पठार का दर्रा. पठार के छोर पर कभी खड़ी चट्टानें रही होंगी लेकिन बाद वे ढह गई जिसकी वजह से वहाँ खूबसूरत से दर्रे बन गए.
  • एरालकुम
    एरालकुम. हमने एरालकुम के पास 150 किलोमीटर का सफर तय किया. यहाँ का रेगिस्तान कभी सागर हुआ करता था. सतह पर नमक की एक परत देखी जा सकती है. हवा में भी नमक महसूस होता है और यहाँ की हर चीज पर धूल की एक परत देखी जा सकती है. यूनेस्को इस इलाके के पर्यावरण में सुधार के लिए एक परियोजना पर काम कर रही है. इस परियोजना के तहत हवा की धूल को कम करने के लिए और वन्यजीवों को आकर्षित करने के लिए नई तरह की वनस्पतियाँ लगाई जानी हैं.
  • जादू टोने वाला उकसई गाँव
    जादू टोने वाला उकसई गाँव. इस इलाके में ऐसे कई घर देखे जा सकते हैं जिनके बाहर बुरी नजर से बचाने के लिए कुछ चीजें लटकी हुई देखी जा सकती हैं.
  • जमीन पर नाव, मोयनक़
    ज़मीन पर नाव, मोयनक़. रेत पर खड़े इस जहाज को देखकर यह लगता है कि ये जगह कभी एक व्यस्त बंदरगाह रहा होगा.

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