उत्तराखंड बाढ़ के बाद जो बचे

15 जुलाई 2013 अतिम अपडेट 11:30 IST पर

उत्तराखंड में पिछले महीने आई विनाशकारी बाढ़ में सैकड़ों लोग मारे गए और हज़ारों लापता हैं. फ़ोटोग्राफर रॉनी सेन ने राहत शिविर का दौरा कर बाढ़ पीड़ितो की व्यथा को अपने कैमरे में कैद किया.
फ़ोटोग्राफर रॉनी सेन ने अपने कैमरे के माध्यम मे राहत शिविर में रह रहे उत्तराखंड के बाढ़ प्रभावितों का जायजा लिया. 70 साल की कौशल्या चौहान का गांव इस बाढ़ में बह गया. उनका कहना है, “मैं इस तरह नहीं रह सकती. काश मैं अपने गांव में ही मर जाती.”
63 साल के प्रहलाद सिंह बीमार हैं और उनकी आंखें भी कमजोर हैं. सेना के हेलीकॉप्टर ने उनकी जान बचाई. उनका कहना है, “मैंने अपनी जिंदगी में कभी भी इतनी भीषण तबाही नहीं देखी है.”
दस साल के रिषभ चौहान राहत शिविर में अपनी बड़ी बहन अमृता के साथ रह रहे हैं. वो गांव लौटकर अपने घर को दोबारा बनाना चाहते हैं और स्कूल जाना चाहते हैं.
बसावर सिंह एक गांव में पोस्टमास्टर थे जो अब बह चुका है. उनकी पत्नी को चिंता है कि उनके आगे की गुजर बसर कैसे होगी.
32 साल की सीमा सिंह का परिवार बाढ़ में बच गया लेकिन उन्हें अपने बच्चों के भविष्य की चिंता है.
हाई स्कूल की छात्रा मनीषा चौहान का घर बाढ़ में बह गया है और वो भविष्य को लेकर निश्चित नहीं हैं. मनीषा और उनकी चचेरी बहन अदिति इन दिनों 40 अन्य महिलाओं के साथ एक कमरे में रह रही हैं.
राहत शिविर के खाना परोसे जाने वाले क्षेत्र में एक बच्चा. खाना राहत शिविर में रह रहे लोग खुद ही बनाते हैं.
भूपेन्द्र सिंह चौहान एक फ़ोटोग्राफर और टूरिस्ट गाइड का काम करते हैं. उन्हें आशंका है कि इस आपदा के बाद पर्यटक उत्तराखंड से दूर रहेंगे और उनकी आजीविका प्रभावित होगी.
एक बच्चा राहत शिविर के गेट पर लगे कांच के दरवाजे से देखते हुए.
52 साल के कंचन सिंह ने नया मकान बनाने के लिए दस लाख का लोन लिया था. मई में ही वो अपने नए घर में गए थे लेकिन जून में आई बाढ़ में उनका मकान बह गया.
मंजू चौहान स्कूल जाने वाली अपनी दो पोतियों सुकन्या और संजना के साथ राहत शिविर में. उनकी मां मवेशियों की देखभाल के लिए बाढ़ प्रभावित गांव में ही हैं.