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सोमालिया, संघर्ष और समोसे!

 शुक्रवार, 24 फ़रवरी, 2012 को 05:30 IST तक के समाचार

सोमालिया, संघर्ष और समोसे!

  • 37 वर्षीय फद्युमा एडेन मोहम्मद
    सोमालिया में पिछले दो दशकों से जारी संघर्ष को खत्म करने के लिए लंदन में 40 देशों की एक बैठक हुई. इस सबके बीच पेश है 37 वर्षीय फद्युमा एडेन मोहम्मद की ज़बानी मोगादीशू में उनके संघर्षभरे जीवन की कहानी. फद्युमा एक शरणार्थी शिविर में समोसे और कोल्डड्रिंग बेचकर अपना गुजारा चलाती हैं.
  • 37 वर्षीय फद्युमा एडेन मोहम्मद
    ''फिलहाल मैं दस बच्चों की देखभाल कर रही हूं. इनमें से आठ मेरे अपने बच्चे हैं और दो मेरे भाई के बच्चे हैं जो 2009 में सोमालिया से इथियोपियाई सेना की वापसी के बाद छिड़े गृहयुद्ध में मारा गया.''
  • 37 वर्षीय फद्युमा एडेन मोहम्मद
    ''मूल रुप से मैं दक्षिण सोमालिया की रहने वाली हूं. पिछले छह सालों में मेरे परिवार ने दर-दर की ठोकरें खाई हैं. मोगादीशू के इस कैंप में हम 2009 में आए.''
  • 37 वर्षीय फद्युमा एडेन मोहम्मद
    ''मेरे पति बेरोजगार हैं. कई दिन वो घर में बेकार बैठकर गुज़ारते हैं. कभी-कभी वो मेरी मदद करते हैं, लेकिन ज़्यादातर काम मैं और मेरी 13 साल की बेटी ही करते हैं. मेरे घर पर मौजूद न होने पर वो बच्चों की देखभाल करती है.''
  • 37 वर्षीय फद्युमा एडेन मोहम्मद
    ''सुबह सवेरे मैं सामान खरीदने बाज़ार जाती हूं और घर पर समोसे बनाती हूं. इसके बाद मैं उन्हें बेचने जाती हूं और भगवान से प्रार्थना करती हूं कि मेरे बच्चों का पेट भरा रहे. फिर भी कई दिन हम भूखे सोते हैं.''
  • 37 वर्षीय फद्युमा एडेन मोहम्मद
    ''रोज़मर्रा के इस संघर्ष के बीच अक्सर होने वाले धमाके और गोलाबारी हमारे लिए मुसीबतों का सबब बन गए हैं. इन धमाकों की दहशत अब बच्चों के दिलोदिमाग पर असर कर रही है.''
  • 37 वर्षीय फद्युमा एडेन मोहम्मद
    ''एक दिन मैं दुकान पर थी और बमबारी शुरु हो गई. बच्चे घर छोड़कर शरण के लिए एक ऐसी इमारत की ओर भागे जो सीमेंट की बनी हो. इस बीच घर में चोर घुस आए और उन्हें हमारे घर सहित पड़ोस के घर से काफी सामान चुरा कर ले गए. ऐसा कई बार हो चुका है.''
  • 37 वर्षीय फद्युमा एडेन मोहम्मद
    ''मोगादीशू में हालात अब थोड़े सुधर रहे हैं जैसे अब हम मुख्य बाज़ार बकारा तक जा सकते हैं. हालांकि धमाके अब भी अक्सर सुनाई देते हैं.''
  • 37 वर्षीय फद्युमा एडेन मोहम्मद
    ''सोमालिया में जब शांति थी तब यहां जीवन आसान था. परिवार के लिए पैसा कमाना उसे अपनी सुविधा के लिए खर्च करना मुमकिन था. अब तो ज़्यादातर लोग बेरोज़गार हैं.''
  • 37 वर्षीय फद्युमा एडेन मोहम्मद
    ''कभी-कभार हमें राहत एजेंसियों से मदद मिलती है लेकिन हम ये जानते हैं कि अपनी जिंदगी की लड़ाई आखिरकार हमें खुद ही लड़नी है.''
  • 37 वर्षीय फद्युमा एडेन मोहम्मद
    समोसे और चाय बेचकर होने वाली आमदनी से ही मैंने ये छोटी सी दुकान खरीदी है ताकि मेरी ज़िंदगी का कम से कम एक सहारा हो.
  • 37 वर्षीय फद्युमा एडेन मोहम्मद
    ''मेरा मानना है कि सोमालिया में औरतों को घर, बाहर और समाज की मुश्किलों से जूझने के लिए आपस में बातचीत करनी चाहिए. मैं सोमीलिया के लिए शांति चाहती हूं और कुछ नहीं.''

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