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कैसे रफ़्तार की दीवानी हुई दिल्ली

 गुरुवार, 8 दिसंबर, 2011 को 10:36 IST तक के समाचार

कैसे बदलीं दिल्ली की सवारियां

  • दिल्ली की पुरानी तस्वीरें
    1911में जब दिल्ली भारत की राजधानी घोषित हुई उससे पहले ये धीमी गति से खिसकता एक सुस्त शहर था. शाही ठाठ को संजोते रजवाड़े और नवाब अक्सर इस तरह की पालकियों में सवार होकर आम रास्तों पर निकलते थे.
  • दिल्ली की पुरानी तस्वीरें
    कच्चे रास्तों पर अक्सर इस तरह की बड़े पहियों वाली बग्गियां इस्तेमाल की जाती थीं. किंग जॉर्ज पंचम और क्वीन मैरी शाही बग्गी में सवार होकर दिल्ली दरबार के लिए रवाना होते हुए.
  • दिल्ली की पुरानी तस्वीरें
    ब्रिटेन की महारानी क्वीन मैरी की एक दुर्लभ तस्वीर. उस दौर में गाड़ियां बेहद खूबसूरत और अलग-अलग तरह की हुआ करती थीं. कई औरतें पर्दा करती थीं और गाड़ियों में पार्टिशन हुआ करते थे. अलग-अलग कूपों वाली गाड़ियां भी थीं, जो पंखे-शीशे साज-सज्जा से भरपूर थीं. (तस्वीर साभार: दिलजीत टाइटस)
  • दिल्ली की पुरानी तस्वीरें
    दिल्ली दरबार के दौरान कई बड़े कार निर्माताओं ने दिल्ली के बाज़ारों का रुख किया. दरबार में आने वाले विशिष्ट अतिथियों के लिए रोल्स-रॉयस जैसी कंपनियों ने ‘सिल्वर घोस्ट’ जैसे मॉडल बाज़ार में उतारे. दिल्ली दरबार से पहले किंग जॉर्ज के स्वागत के लिए गाड़ियों की एक दुकान पर लगा बोर्ड. (तस्वीर साभार: दिलजीत टाइटस )
  • दिल्ली की पुरानी तस्वीरें
    दिल्ली दरबार के तैयार गाड़ियों का एक काफ़िला. चौपहिया वाहनों यानि कारों का इस्तेमाल दिल्ली में उन दिनों बेहद कम था, भले ही सन 1900 की शुरुआत में पेट्रोल का भारतीय मूल्य आठ आना प्रति गैलन और तेल की कीमत 2.8 आने रही हो.
  • दिल्ली की पुरानी तस्वीरें
    1864 में दिल्ली-कलकत्ता के बीच पहली रेल शुरु हुई, लेकिन 1911 के बाद दिल्ली में गतिविधियों के एक नए दौर की शुरुआत की. दिल्ली में व्यापक स्तर पर शुरु हुए निर्माण के लिए बड़ी संख्या में सीमेंट, पत्थर, ईंट, बदरपुर लाने ले जाने की ज़रूरत थी. इसके लिए शहर भर में रेलवे लाइन बिछाई गईं जिसे ‘इंपीरियल डेल्ही रेलवे’ का नाम दिया गया.
  • दिल्ली की पुरानी तस्वीरें
    दिल्ली के दिल कनॉटप्लेस में रेल के इन डिब्बों की मरम्मत के लिए एक कारखाना बनाया गया. कनॉटप्लेस का ये इलाका आज बाराखम्बा रोड के नाम से जाना जाता है जहां कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के दफ़्तर हैं.
  • ट्राम
    मुसाफ़िरों के शहर दिल्ली का ऐसा ही एक गुमशुदा अध्याय है यहां चलने वाले ट्राम. 1952 तक कलकत्ता की तरह दिल्ली में भी ट्राम सड़कों का हिस्सा थे. 1908 में ‘दिल्ली इलेक्ट्रिक ट्रामवेज़ लाइटिंग कंपनी’ ने शहर में ट्राम की शुरुआत की जो 1930 सिविल लाइंस, पुरानी दिल्ली, करोलबाग जैसे इलाकों तक पहुंच गए.
  • दिल्ली की पुरानी तस्वीरें
    1927 में दिल्ली में पहला एयर शो हुआ. ये तस्वीर है विलिंग्डन हवाई पट्टी की जिसे हम आज सफ़रजंग हवाई अड्डे के नाम से जानते है. दिल्लीवालों के अलावा इस शो में हिस्सा लेने के लिए खुद लॉर्ड और लेडी इरविन आए. लॉर्ड इरविन (आगे की कतार में दांए से चौथे)
  • हवाई जहाज़
    1918 में दिल्ली के विलिंग्डन हवाई अड्डे पर पहला डाक-वाहक विमान उतरा. सफ़दरजंग के मकबरे के साये में हर तरफ फैली घास और कुछ अस्थाई शिविरों के अलावा इस विमान के स्वागत के लिए हवाई अड्डे पर कुछ नहीं था. ये विमान आज दिल्ली एरो क्लब के दफ़्तर में सुरक्षित है.
  • ट्रेन
    1948 में दिल्ली में महात्मा गांधी की हत्या के बाद उनकी अस्थियां इलाहाबाद ले जाने के लिए दिल्ली से एक विशेष रेल चली. दिल्ली स्थित रेल-संग्रहालय में मौजूद अस्थिकार का एक मॉडल. ट्रेनों के लिए समय पाबंदी उन दिनों एक बड़ी चुनौती थी लेकिन लाखों की संख्या में जुटी भीड़ के बावजूद यह ट्रेन हर स्टेशन से तय समय पर गुज़री और सही समय अपने गंतव्य पर पहुंची.
  • दिल्ली की पुरानी तस्वीरें
    दिल्ली में एक दौर वो भी था जब सड़कें चौड़ी थीं, गाड़ियां कम और लोग आमतौर पर साइकिलों से या पैदल सफ़र करते थे. चांदनी चौक के जिस इलाके की ये तस्वीर है उस पर आज पैदल चलने की जगह भी मुश्किल से मिलती है.
  • तांगा
    दिल्ली की सड़कों पर जिस सवारी ने लंबे अरसे तक राज किया वो है तांगा. माना जाता है कि मुग़लों के ज़माने में लाल किले और जामा मस्जिद के निर्माण के दौरान ईंट-पत्थर ढोने के लिए काबुल से घोड़े-खच्चर यहां लाए गए. दिल्ली का तुर्कमान गेट इलाका इनका गढ़ बना और गधेवालों के नाम से जाना जाने लगा. समय के साथ इन लोगों ने तांगा चलाने का पेशा अपना लिया.
  • बसें
    30 के दशक में दिल्ली में बस सेवा शुरु हुई लेकिन दिल्ली के पास सीमित संख्या में मौजूद खस्ताहाल बसों के अलावा कुछ नहीं था. पहले पहल चलाई गई 'लाल-परी' बसों ने जब बड़ी संख्या में सड़क हादसों को अंजाम दिया तो उन्हें हटाकर ब्लू-लाइन बसें लाई गईं. लेकिन ब्लू लाइन बसों का अध्याय भी खून से ही लिखा गया और अब दिल्ली में नई चमचमाती लो-फ्लोर बसें चलाई गई हैं.
  • नई दिल्ली
    आज देशभर से लोग दिल्ली आते हैं दिल्ली का ये विस्तार सड़कों पर भी दिख रहा है. रिंग-रोड के बाद बाहरी रिंग रोड से भी जब काम नहीं चला तो बाहरी-बाहरी रिंग रोड बनाने की नौबत आ गई. दिल्ली में इन दिनों वाहनों की कुल संख्या 69,32,706 है. जिन्हें समेटने के लिए नए से नए फ्लाई-ओवर भी कम पड़ रहे हैं.
  • नई दिल्ली
    साल 2002 में मेट्रो ने वो कर दिखाया जो भारत में आमतौर पर नहीं होता. समय से आगे चली इस परियोजना ने दिल्ली की यातायात व्यवस्था का नक्शा बदल दिया. मेट्रो की हर साइट के दफ़्तर में आज भी एक डिजिटल घड़ी टंगी दिखती है जो प्रत्येक दिन के हिसाब से कामगारों को समयसीमा की याद दिलाती है.
  • दिल्ली मेट्रो
    मेट्रो में मज़दूर, मैकेनिक, मैनेजर सभी आपको साथ सफ़र करते दिखाई दे जाएंगे. कंटकसिंह अपनी बेटियों और बहुओं के साथ राजस्थान के गंगानगर से दिल्ली मेट्रो की सवारी करने आए हैं.
  • नई दिल्ली
    दिल्ली की यातायात व्यवस्था पर हुए एक अध्ययन के मुताबिक भारत की राजधानी में सड़कों पर कुल 27 तरह के यातायात साधन वक्त और जगह से एकसाथ लड़ते देखे जा सकते हैं!

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