ठिठुरती दिल्ली, रैनबसेरों का सहारा नहीं

  • दिल्ली में बुधवार को न्यूनतम तापमान 8.6 डिग्री सेल्सियस रहा, बढ़ती ठंड ने खुले आसमान के नीचे रात बिताने वालों की परेशानियाँ बढ़ा दी हैं.
  • दिल्ली में खुले आसमान के नीचे रात बिताने वालों में काफी संख्या में बच्चे और महिलाएँ शामिल हैं. जो छत की कमी के चलते सड़क पर रात बिताने को मजबूर हैं.
  • कुछ लोग रिक्शा को ही अपना बिस्तर बना लेते हैं, तो कुछ लोग ज़मीन पर ही रात गुज़ारते हैं. सर्दी की वजह से जानवर भी इन्हीं की रजाइयों के पास दुबके नज़र आते हैं.
  • इन लोगों की मजबूरी ने कुछ को पैसा कमाने का अवसर दे दिया है. पुरानी दिल्ली में बहुत से ऐसे लोग हैं जो रजाई किराए पर देते हैं. रजाई का एक रात का किराया 20 रुपये है. ठंड बढ़ने के साथ ही रजाई का किराया भी बढ़ जाता है.
  • भले ही इस बडे बोर्ड पर बड़े-बड़े अक्षरों में आसान दरों पर कर्ज देकर आवास मुहैया करवाने का प्रचार किया गया है. लेकिन इसके नीचे सो रहे मजदूरों के पास शायद ही रजाई के किराए से ज़्यादा पैसा हों.
  • आसमान तले रात गुज़ारने वाले लोगों ने बीबीसी को बताया कि रैनबसेरों में जेबकतरों का खतरा रहता है और अगर पहुँचने में देर हो जाए तो वहाँ जगह नही मिलती.इसी वजह से वो वहाँ जाने से बचते हैं.
  • दिल्ली सरकार द्वारा स्थापित रैन बसेरों में मुहैया करवाई जाने वाली सुविधाओं का पर्चा इस रैन बसेरे के दरवाजे़ पर लगा है, लेकिन रैनबसेरों में रहने वालो ने बीबीसी को बताया कि उन्होंने कभी भी इस रैनबसेरे में डॉक्टर को नहीं देखा.
  • दिल्ली सरकार ये रैनबसेरे कुछ सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर चलाती है. इनमें ठहरने के लिए एक रात का किराया छह रुपये है.
  • रैनबसेरों में महिलाओं और बच्चों के लिए कोई शुल्क नहीं लगता, लेकिन कुछ बच्चों ने बीबीसी को बताया कि वो वहाँ जाने से डरते हैं.
  • सर्वोच्च अदालत ने पिछले ही दिनों दिल्ली सरकार को आदेश दिए थे कि अस्थाई रैनबसेरे ना तोडे़ जाए.

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