BBC navigation

इराक़ः अब क्या करेगा अमरीका?

 गुरुवार, 12 जून, 2014 को 16:28 IST तक के समाचार
इराक़ आईएसआईएस लड़ाके

इराक़ के दूसरे सबसे बड़े शहर मोसूल पर सुन्नी जिहादियों ने बिना कोई ख़ास प्रतिरोध झेले आसानी से क़ब्ज़ा कर लिया.

इसके बाद तिकरित उनके क़ब्ज़े में आया.

ऐसा हुआ क्यों और मौजूदा हालात में अमरीका के पास क्या विकल्प हैं?

विश्लेषण कर रहे हैं डेलावेयर विश्वविद्यालय में मध्य-पूर्व के मामलों के विशेषज्ञ मुक़्तदर ख़ान.

दरअसल इराक़ की सेना ग़ैर पेशेवर है, पूरी तरह से प्रशिक्षित भी नहीं है. सेना नस्लीय आधार पर गठित की गई है जिसमें बड़े पदों पर शिया बैठे हैं जो लड़ने के लिए तैयार नहीं हैं.

मोसूल में जो हुआ वह दिखाता है कि यह सेना लड़ने के लिए बिलकुल तैयार ही नहीं थी. सैनिक अपनी वर्दियां और हथियार छोड़कर शरणार्थियों की तरह छुप-छुपाकर भागे हैं. उन्होंने न सिर्फ़ अपनी चौकियां छोड़ीं, बल्कि उनकी वजह से ही मोसूल हार भी गया.

आईएसआईएस (इस्लामिक स्टेट इन इराक़ एंड अल-शाम) के हाथों में बड़ी तादाद में अमरीकी हथियार भी आ गए. आईएसआईएस के लड़ाके सीरिया और इराक़ में सेनाओं के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं और उन्हें अरब सेनाओं के ख़िलाफ काफ़ी अनुभव भी हो गया है.

मूसल

बड़ी आसानी से सुन्नी जिहादियों ने मोसूल जीत लिया. इससे यह भी साबित हो गया है कि इराक़ भी अब सीरिया और सोमालिया की तरह नाकाम राष्ट्रों की श्रेणी में आ गया है.

राष्ट्रपति बुश के ज़माने में जब इराक़ में पहला संविधान बना था और उसके लिए जनमत संग्रह हुआ था तब सुन्नियों ने उसका पूरी तरह बहिष्कार किया था.

हताश सुन्नी

नए संविधान में इराक़ के सुन्नियों की कोई भूमिका नहीं थी. मौजूदा कार्यवाहक प्रधानमंत्री नूरी अल-मलिकी ने ज़रूर सुन्नियों के साथ रिश्ते स्थापित करने की कोशिश की थी. हालांकि बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकला और यह भी बीच में ही रुक गई.

यही वजह है कि इराक़ में अब भी राजनीतिक स्थिरता नहीं आई है. उत्तर क्षेत्र में रह रहे क़ुर्द नागरिकों को काफ़ी हद तक स्वायत्ता मिली हुई है. देश के बाकी हिस्से और संसाधन पूरी तरह से शियाओं के हाथ में हैं क्योंकि वे लगातार चुनाव जीत रहे हैं.

ऐसे में अल्पसंख्यक सुन्नी समुदाय ख़ुद को सत्ता से बेदख़ल समझता है.

हालांकि सुन्नियों ने लंबे अर्से तक इराक़ पर राज किया है. राजनीतिक समाधान न होने की वजह से स्थानीय क़बायली नेताओं ने सुन्नी लड़ाकों का समर्थन किया.

मूसल

सऊदी अरब जैसे देशों ने भी इराक़ पर ईरान के असर को कम करने के लिए ऐसे समूहों को भड़काया है.

अमरीका की उलझन

इराक़ को लेकर इस समय अमरीका की उलझन यह है कि उसने जो दस साल में किया उसका कोई नतीजा नहीं निकला. मौजूदा हालात में अमरीका के पास दो विकल्प हैं. या तो वह इराक़ में सीधा ऑपरेशन करे या विपक्षी गुटों को हथियार दे.

हथियार देने की सबसे बड़ी समस्या यह है कि लीबिया में जो हथियार अमरीका ने दिए थे वे सीरिया, माली और ट्यूनीशिया जैसे देशों में नज़र आए.

सीरिया में उन्हीं हथियारों का इस्तेमाल सरकार के ख़िलाफ़ हो रहा है जो पश्चिमी देशों ने दिए थे. ऐसे में हथियार देने का विकल्प आसान नहीं है.

वहीं सीधे सैन्य अभियान के लिए इस समय अमरीकी जनता तैयार नहीं है. वह नहीं चाहती कि मुस्लिम देशों में जाकर अमरीका एक और युद्ध लड़े.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप क्लिक करें यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें क्लिक करें फ़ेसबुक और क्लिक करें ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

इसे भी पढ़ें

टॉपिक

BBC © 2014 बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.