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'हिंदी बेहद पसंद है इसलिए पढ़ती हूं'

 रविवार, 6 अप्रैल, 2014 को 19:24 IST तक के समाचार
सोआस में हिंदी क्लास

रोज़गार, शिक्षा और अन्य ज़रूरतों से प्रेरित होकर जिस तरह लोग भारत की राजधानी दिल्ली में पहुंचते हैं, ठीक उसी तरह ब्रिटेन की राजधानी लंदन में भी पूरी दुनिया से लोग आते हैं.

शहर में आप कहीं भी निकल जाएं आपको तरह-तरह की भाषाएं बोलते लोग मिल जाएंगे.

यहां आए लोगों की कोशिश यही होती है कि अंग्रेज़ी भाषा सीख ली जाए और धीरे-धीरे यहां की संस्कृति का हिस्सा बन जाया जाए.

ऐसे अंग्रेज़ीदां माहौल में यदि कोई ग़ैर भारतीय गंभीरता से हिंदी सीखता मिल जाए तो सुखद आश्चर्य होना लाज़िमी है.

लंदन स्थित सोआस यानी स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ़्रीकन स्टडीज़ में हिंदी के छात्रों से मिलकर ऐसा ही लगा.

कनाडा से सोआस में हिंदी पढ़ने आई केट कहती हैं, “मैं हिंदी सीखना चाहती हूं क्योंकि मैं भारत के बारे में जानना चाहती हूं.”

स्कूल ऑफ़ अफ़्रीकन एंड एशियन स्टडी, हिंदी छात्रा

सोआस में हिंदी छात्रा सेरेना हिंदी सीखकर भारत को समझना चाहती हैं.

वहीं एक अन्य छात्रा सेरेना कहती हैं, “हिंदी इसलिए पढ़ती हैं क्योंकि हिंदी मुझे बेहद पसंद है.”

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'कारोबार में मदद'

सोआस में चतुर्थ वर्ष के छात्र जॉर्ज हिंदी के ज़रिए भारत में कारोबार करना चाहते हैं. वो कहते हैं, "मैं पढ़ने के बाद बिज़नेस करना चाहता हूं, मुझे लगता है कि हिंदी इसमें बहुत उपयोगी होगी. हिंदी सीखने से बहुत फ़ायदा होगा बिज़नेस में."

वहीं नॉर्वे से आए एड्रिएन हिंदी सिर्फ़ शौक़ से पढ़ते हैं. उनका कहना है कि हिंदी में प्रेमचंद जैसे लेखकों की कहानियां पढ़कर बहुत आनंद आता है.

अंतिम वर्ष के ये छात्र आपस में धाराप्रवाह हिंदी में बातें कर रहे थे और उन्हें देखकर यही लगता था जैसे हिंदी उनकी अपनी ही भाषा हो.

सोएस में हिंदी छात्र जॉर्ज

फ़र्राटेदार हिंदी बोलनेवाले जॉर्ज हिंदी का इस्तेमाल भारत के साथ कारोबार में करना चाहते हैं.

सोआस में चार साल का हिंदी का पाठ्यक्रम है और क़रीब सौ छात्र यहां हिंदी सीख रहे हैं. चार साल के पाठ्यक्रम के दौरान उन्हें एक साल जयपुर में जाकर ठेठ हिंदी के माहौल सीखने का मौक़ा मिलता है.

हिंदी सिखाने की प्रारंभिक कक्षा में शिक्षक बेहद सरल तरीक़े से छात्रों को भाषा का ज्ञान करवाते हैं ताकि हिंदी सीखना रोचक बन सके. इसलिए छात्रों को कभी हिंदी फिल्मों के गाने दिखाए जाते हैं, तो कभी उन्हें लिखे हुए संवाद देकर आपस में बातचीत करने को कहा जाता है.

रोचक बनाने की कोशिश

राकेश नौटियाल, सोआस में हिंदी शिक्षक

"हम बीबीसी हिंदी ऑनलाइन से भी बहुत मदद लेते हैं. हम छात्रों को बीबीसी के कार्यक्रम सुनने को भी कहते हैं"

सोआस में हिंदी व्याख्याता राकेश नौटियाल इन छात्रों को दिए जा रही हिंदी शिक्षा के बारे में कहते हैं, “पहले साल में छात्रों को व्याकरण में बहुत समस्या रहती है. उन्हें रोचक तरीके से व्याकरण का ज्ञान देने की कोशिश की जाती है. उसके बाद भाषा की शिक्षा दी जाती है जिसमें हम बीबीसी हिंदी ऑनलाइन से भी बहुत मदद लेते हैं. हम छात्रों को बीबीसी के कार्यक्रम सुनने को भी कहते हैं.”

छात्रों को हिंदी भाषा में दक्षता दिलाने के लिए कक्षा में मेहनत करने के साथ ही शिक्षक ऐसी पाठ्य पुस्तकें भी तैयार करते हैं जिससे छात्रों को हिंदी सीख कर रोज़गार हासिल करने और भारत में काम करने में मदद मिल सके.

सोआस में ही वरिष्ठ व्याख्याता नरेश शर्मा कहते हैं, “शिक्षक तो परिश्रम करते ही हैं लेकिन चुनौती छात्रों के लिए ज़्यादा होती है. और जब वो तीन-चार साल की मेहनत के बाद हिंदी लिखने-बोलने लगते हैं तो हमें बहुत संतोष मिलता है, अच्छा लगता है.“

केंब्रिज विश्वविद्यालय

पश्चिम के बड़े शिक्षा केंद्रों ऑक्सफ़ोर्ड और केंब्रिज में हिंदी के बजट में कटौती की गई है.

लेकिन ये भी सच है कि पहले के मुकाबले ब्रिटेन में हिंदी पढ़ने वाले छात्रों की संख्या घट रही है. सोआस में ये संख्या भले की सौ के क़रीब हो. लेकिन केंब्रिज, ऑक्सफोर्ड जैसे शिक्षा के बड़े केंद्रों में हिंदी पढ़नेवाले लगातार कम हो रहे हैं.

हिंदी पर मंदी का असर

ऐश्वर्ज कुमार, केंब्रिज में हिंदी शिक्षक

"हिंदी की स्थिति बदली है. पूरे ब्रिटेन में स्नातक स्तर पर हिंदी का पूरा पाठ्यक्रम आज कहीं नहीं पढ़ाया जाता"

केंब्रिज में हिंदी के शिक्षक ऐश्वर्ज कपूर इसके पीछे ब्रिटेन के आर्थिक परिदृश्य को कारण मानते हैं.

वे कहते हैं, “ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था आर्थिक मंदी के दौर से गुज़र रही है और विश्वविद्यालयों में भी आर्थिक कटौती का असर जारी है. इसी वजह से पहले की तुलना में हिंदी की स्थिति बदली है. पूरे ब्रिटेन में स्नातक स्तर पर हिंदी का पूरा पाठ्यक्रम आज कहीं नहीं पढ़ाया जाता.”

ब्रिटेन में हिंदी पढ़ने वाले भले ही कम हो रहे हों, लेकिन जानकारों का मानना है कि भारत में तेज़ी से फैलते अंतरराष्ट्रीय कारोबारी हितों और दूरदराज़ के ग्रामीण इलाकों में शोध के लिए जानेवाले विदेशी छात्रों की बढ़ती संख्या की वजह से हिंदी की मांग आनेवाले समय में बढ़ सकती है.

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