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टॉयलेट पेपर पर अख़बार निकालने वाला क़ैदी

 मंगलवार, 11 मार्च, 2014 को 20:05 IST तक के समाचार
पहले विश्व युद्ध के दौरान जेल से निकाला गया अखबार विनचेस्टर विस्परर

ब्रिटेन में पहले विश्वयुद्ध के दौरान करीब 100 लोगों को जेल में डाल दिया गया क्योंकि इन लोगों ने युद्ध में शामिल होने से इनकार कर दिया था.

दरअसल ये लोग शांति चाहते थे और किसी भी सूरत में हिंसा में शामिल होना नहीं चाहते थे.

नियमों के मुताबिक़ वो दूसरे क़ैदियों से बातचीत भी नहीं कर सकते थे, लेकिन उनमें से एक व्यक्ति हेरोल्ड बिंग ने जेल प्रशासन की नज़रों से बचकर एक समाचार पत्र निकाल दिया.

इस समाचार पत्र को टॉयलेट पेपर पर लिखकर तैयार किया गया.

हेरोल्ड बिंग को 1916 में जेल भेजा गया था. उनका कहना था कि वो किसी भी सूरत में युद्ध में शामिल नहीं होंगे और इस वजह से उन्हें 1919 तक जेल में रहना पड़ा.

जब उन्हें जेल भेजा गया, तब उनकी उम्र 18 साल थी. लेकिन क़ैद किए जाने के बावजूद युद्ध को लेकर उनकी राय को दबाया नहीं जा सका.

विनचेस्टर व्हिस्परर

उन्होंने अपने दोस्तों के साथ मिलकर गोपनीय ढंग से एक समाचार पत्र तैयार कर दिया. समाचार पत्र का नाम 'विनचेस्टर व्हिस्परर' रखा गया. उन्होंने पेन के रूप में सुई का इस्तेमाल किया और कागज के लिए टॉयलेट पेपर का.

पहले विश्व युद्ध के दौरान जेल से विनचेस्टर विस्परर अखबार निकालने वाले बेंग

बेंग ने 1974 में दिए एक साक्षात्कार में कहा था, "इसमें कई लोगों ने छोटे निबंध या कविताएं लिखीं, या कभी-कभार इसमें छोटे कार्टून या स्केच भी होते थे."

उन्होंने बताया, "विनचेस्टर व्हिस्परर की कोई भी कॉपी वार्डन नहीं पकड़ सके, हालांकि मुझे लगता है कि कुछ को संदेह था कि कुछ चल रहा है."

उन्होंने बताया कि इसे बंडी में या कपड़े की बांह में छिपाकर जेल में एक जगह से दूसरी जगह तक पहुंचाया जाता था.

कुछ साथी बाद में युद्ध से जुड़े कुछ दूसरे काम करने लगे. लेकिन बिंग जैसे कुछ शांतिवादियों ने वर्दी पहनने, आदेशों को मानने या युद्ध से जुड़ा कोई काम करने से इनकार कर दिया.

विनचेस्टर जेल में अख़बार तैयार करने के साथ ही उन्हें कठिन परिश्रम करना पड़ता था.

उन्होंने बताया, "कठोर श्रम की सज़ा के चलते पहला महीना तो यूं ही निकल गया."

सुई या पेन!

क़ैदियों को कसरत करने के लिए हर दिन आधे घंटे का समय मिलता था, लेकिन किसी को आपस में बात करने की इजाज़त नहीं थी.

उन्हें अपनी कोठरी में चाक और स्लेट के अलावा लिखने की कोई सामग्री रखने की इजाज़त नहीं थी और पत्र लिखने की अनुमति मिलने पर ही उन्हें कुछ समय के लिए पेन और स्याही दी जाती थी.

पहले विश्व युद्ध के दौरान जेल से निकाला गया अखबार विनचेस्टर विस्परर

ऐसे में अख़बार निकालना से असंभव ही लगता था. चोरी से स्याही लाई गई. अख़बार हल्के भूरे रंग के टॉयलेट पेपर पर निकाला जाता था.

उन्होंने बताया, "मैंने पेन के रूप में सुई का इस्तेमाल किया. नुकीले सिरे को स्याही में डुबोकर लिखा जाता था." इसका मतलब था कि लगभग हर एक शब्द लिखने के लिए सुई को स्याही में डुबोना पड़ता था.

इसी तरह से वैंड्सवर्थ जेल सहित कुछ दूसरी जेलों में भी अख़बार निकाले गए.

विनचेस्टर व्हिस्परर की एक प्रति सोसाइटी ऑफ फ्रैंड्स (क्वाकर्स) ने बचाकर रखी है. क्वाकर्स के पुस्तकालय और अभिलेखागार प्रमुख डेविड बाल्के इसे "आश्चर्यजनक दस्तावेज़" बताया.

उन्होंने बताया, "मेरा मानना है कि ये इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कुछ ऐसे लोग थे जो इस मसले पर काफी दृढ़ थे और वो जेल जाने के लिए भी तैयार थे."

जेल से रिहा होने के बाद बिंग ने शिक्षा के क्षेत्र में करियर बनाने का फैसला किया, लेकिन उन्हें लोगों के पूर्वाग्रहों का सामना करना पड़ा.

उस समय शिक्षा से जुड़े रोजगार के विज्ञापनों में लिखा रहता था कि तार्किक ढंग से युद्ध का विरोध करने वालों को आवेदन करने की आवश्यकता नहीं है.

हालांकि कई प्रयासों के बाद वो अध्यापक बन गए और लाउबरों के कोऑपरेटिव कॉलेज से लेक्चरर के रूप में सेवानिवृत्त हुए.

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