युद्ध, भूख, दर्द और आंसुओं की दास्तां....

  • 25 फरवरी 2014
यारमुक शरणार्थी शिविर, सीरिया

"हमें बचा लो, हम यहाँ मर रहे हैं. हमें यहाँ से दूर ले चलो." 60 साल की वफ़ीक़ा गुहार लगा रही हैं. उनके आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे हैं और वो अपने खुरदुरे हाथों में अपने झुर्रीदार चेहरे को छिपा लेती हैं.

वफ़ीक़ा गृहयुद्ध से जूझ रहे सीरिया की राजधानी दमिश्क के दक्षिण में स्थित यारमुक के एक फ़लस्तीनी शरणार्थी शिविर में पिछले आठ महीने से फंसी हुई हैं.

उनका दर्द अब हद से गुजर चुका है और वह हर उस व्यक्ति की तरफ दौड़ पड़ती हैं जो उन्हें इस स्थिति से बाहर निकाल सके.

उनके पीछे सैकड़ों लोग सुरक्षा घेरे को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं. ये लोग संयुक्त राष्ट्र के खाद्य वितरण केंद्र तक पहुँचने की कोशिश कर रहे हैं और सुरक्षाकर्मियों को उन्हें संभालने के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ रही है.

इतने में एक महिला चिल्लाती है, "मैं यह सब झेलते झेलते थक चुकी हूँ." ऐसा लग रहा है जैसे यह महिला एक त्रासदी को झेल रहे लोगों की स्वयंभू प्रवक्ता है.

कई लोग रो रहे हैं. बुजुर्ग लोग व्हीलचेयर पर पड़े हैं, बेहद थकी नज़र आ रही महिलाएं शून्य को निहार रही हैं और हर उम्र के बेबस बच्चे. इनमें कई बच्चों में कुपोषण के लक्षण साफ़ देखे जा सकते हैं.

घासफूस

वफ़ीक़ा
वफ़ीक़ा को अब पीछे छूट गए अपने तीन बेटों की चिंता है.

एक माँ ने मुझसे कहा, "हमें घासफूस को मसालों के साथ उबालकर खाना पड़ा." गुलाबी पुशचेयर में बैठी उनकी एक बेटी लगातार रोए जा रही है. उन्होंने काले रंग के जूते और एक कोट पहना है जो शायद उनके बेहतर अतीत की आख़िरी निशानी है.

भावनाओं का ज्वार इतना उग्र है कि ऐसा लगता है जैसे आफत अभी-अभी आई है.

यारमुक को देखकर लगता है कि जैसे आप किसी भूकंप प्रभावित इलाक़े में हैं. मकानों में तोपगोलों के निशान देखें जा सकते हैं और उनमें से अधिकांश महज मलबे का ढेर हैं.

लेकिन यह एक मानवीय विपदा है जो ऐसे संघर्ष से उपजी है जिसमें भोजन को लड़ाई के एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है.

फ़लस्तीनी शरणार्थियों के बीच काम करने वाली संयुक्त राष्ट्र की रिलीफ़ एंड वर्क्स एजेंसी उनर्वा को सबसे पहले 18 जनवरी को एक शिविर में पहुँचने में सफलता मिली.

सीरिया के विद्रोहियों और सरकारी सेनाओं के बीच हुए एक समझौते के तहत सीमित मात्रा में भोजन और दवाओं के वितरण की अनुमति दी गई.

समझौते के मुताबिक़ सीरिया के विद्रोही शिविर से बाहर चले जाएंगे और उनकी जगह सरकार के साथ मिले फ़लस्तीनी गुट उनकी जगह लेंगे.

समझौता

यारमुक
खाने के पैकेट लेने के लिए कतारों में खड़े लोग.

अभी इससमझौते की विस्तृत रूपरेखा तैयार हो रही है लेकिन संयुक्त राष्ट्र को लोगों तक मदद पहुँचाने के लिए रोज लड़ाई लड़नी पड़ रही है. कई बार तो ऐसा होता है कि भोजन का वितरण हो ही नहीं पाता.

सीरिया सरकार से अनुमति लेने के बाद जिस दिन हम संयुक्त राष्ट्र के साथ यारमुक पहुँचे, उस दिन भोजन के केवल 60 पार्सल वितरित किए गए. वहां पुरुष और महिलाएं अलग-अलग लाइनों में सलीके से खडी थीं.

लेकिन उनके पीछे बर्बाद इमारतों में कई लाइनें लगी थीं और लोग चिल्ला रहे थे. हज़ारों लोग तो वितरण केंद्र तक पहुँच भी नहीं पाए.

कई बार तो लोगों ने इस मांग को लेकर प्रदर्शन किया कि उन्हें इस संकरी जगह के बजाए उनर्वा की इमारतों में जाने दिया जाए जो अपेक्षाकृत खुली हैं.

उनर्वा के कमिश्नर जनरल फिलिपो ग्रेंडी भी लोगों को उम्मीद का संदेश देने के लिए यारमुक आए हैं. ग्रेंडी उनके इर्द गिर्द जमा हुई भीड़ से कहते हैं, "हम आपको नहीं भूलेंगे और न ही दुनिया आपको भूलेगी."

ग्रेंडी ने कहा, "हम हर व्यक्ति तक पहुँचना चाहते हैं बशर्ते इस लड़ाई में शामिल लोग हमें यह मौका दें."

धुंधली किरण

फिलिपो ग्रांडी
फ़िलिपो ग्रेंडी ने कहा कि वह हर ज़रूरतमंद तक पहुँचना चाहते हैं.

यारमुक में जहाँ उम्मीद की धुंधली किरण नज़र आती है लेकिन यह युद्ध के कड़वे सच को भी उजागर करता है.

इस शिविर को 1948 में अरब-इसराइल युद्ध के दौरान बेघर हुए फ़लस्तीनी शरणार्थियों को बसाने के लिए स्थापित किया गया था. लेकिन साल 2012 के अंत में विद्रोही गुटों के यहाँ आने से यह युद्ध के मैदान में तब्दील हो गया था.

इस शिविर में एक लाख 80 हज़ार फ़लस्तीनी शरणार्थी रहते थे और यह सीरिया का सबसे बड़ा शरणार्थी शिविर था. लड़ाई शुरू होने के बाद हज़ारों लोग यहाँ से भाग गए थे.

लेकिन सेना ने जब पिछले साल जुलाई में विद्रोही के कब्जे वाले शिविर की घेराबंदी की तो क़रीब 20 हज़ार शरणार्थी वहां फंस गए थे. इनमें कई सीरियाई भी शामिल थे.

उनमें से अब कुछ ही वहां से निकलने में सफल रहे हैं. जब हम यारमुक से निकलने की तैयारी कर रहे थे तो हमें 13 साल का किफ़ाह मिला जो अपनी दो छोटी बहनों के साथ निकलने की तैयारी में था.

उसने साहस का परिचय देते हुए कहा, "यहां सबकुछ सामान्य है."

आंसुओं का सैलाब

यारमुक
शिविर का अधिकांश हिस्सा बर्बाद हो चुका है.

लेकिन जैसे ही उसने भूख की बात की, वह अपने आंसुओं को नहीं रोक पाया. उसने केवल इतना कहा, "यहां खाने की कोई व्यवस्था नहीं है."

जब हम वहां से निकल रहे थे तो वफ़ीक़ा हमसे बहुत दूर नहीं थीं. वह अपने एक रिश्तेदार की मदद से वहां से निकलने में कामयाब रहीं.

रोटी का एक टुकड़ा चबाते हुए उन्होंने कहा, "मैं उस नर्क से निकल आई हूं. अब हमें घास नहीं खाना पड़ेगा."

लेकिन पाँच बेटों और चार बेटियों की माँ और सात पोते-पोतियों वाली वफ़ीक़ा को अब भी चैन नहीं मिला है.

उन्होंने कहा, "मेरे तीन बेटे अब भी वहां हैं."

यारमुक इस व्यापक युद्ध की एक छोटी झलक है. लेकिन यह इस युद्ध में विनाश और दुख की पूरी तस्वीर दिखाता है और साथ ही चीख-चीखकर यह संदेश भी देता है कि इसका रास्ता निकालने की ज़रूरत है.

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