सद्दाम हुसैन का हमनाम होने के ख़तरे

  • 23 फरवरी 2014
सद्दाम हुसैन

कुछ घंटों के सफ़र के बाद हमें आख़िरकार बग़दाद के दक्षिण-पूर्वी इलाक़े अज़ीज़ीया में अंदर जाने वाले रास्ते पर रोक दिया गया.

वहां मौजूद एक पुलिसकर्मी हमसे यह जानना चाह रहे थे कि विदेशी समाचार संगठन के पत्रकारों की हमारी टीम उनके उस छोटे शहर में क्या कर रही है.

वो पुलिसकर्मी हमारे काग़जात को देखने में मसरूफ़ थे तभी पास मौजूद एक कार से एक व्यक्ति बाहर निकला जिसने लंबी काले रंग की पोशाक और चमड़े की जैकेट पहनी थी.

उस शख़्स ने कहा, "ये लोग मुझसे मिलने आए हैं."

पुलिसकर्मी ने पूछा, "और आप कौन हैं?"

उस शख़्स ने जवाब दिया, "मैं सद्दाम हुसैन हूं."

मुझे पता है इसे पढ़कर आप क्या सोच रहे हैं. क्या सद्दाम हुसैन ज़िंदा हैं और वह भी शिया बहुल क्षेत्र में वो इस तरह अपना परिचय दे रहे हैं?

क्या इराक़ पर दो दशकों से ज़्यादा समय तक शासन करने वाले सद्दाम हुसैन को साल 2006 में फांसी नहीं दी गई थी ?

वही सद्दाम जो इराक़ में एक सुन्नी अरब शासन का नेतृत्व करते थे, जिन्हें बहुत से शियाओं समेत हज़ारों लोगों की हत्या का ज़िम्मेदार माना जाता है.

लेकिन ये वो सद्दाम नहीं हैं, ये तो कोई दूसरे ही सद्दाम हैं.

इन्हें भी देश के उन अनगिनत शिया-सुन्नी समुदाय के लोगों की तरह ही इस नाम का दंश झेलना पड़ रहा है जिनका नाम मूलतः देश के पूर्व राष्ट्रपति के सम्मान में रखा गया था लेकिन अब यह नाम एक क्रूर तानाशाह की याद दिलाता है.

परेशानियों का सबब

मेरी मुलाक़ात शिया समुदाय से ताल्लुक़ रखने वाले 35 साल के सद्दाम हुसैन उलैवी से हुई जो जेनरेटर ऑपरेटर का काम कर थोड़े से पैसे कमाकर गुज़ारा करते हैं.

वह बेहद मिलनसार लगे. जब हमने उनसे बैठकर बात करके यह जानना चाहा कि देश के पूर्व राष्ट्रपति का हमनाम होने की वजह से उनकी ज़िंदगी में किस तरह का बदलाव आता है, तो बातचीत के दौरान ही उन्होंने हमसे दोपहर के भोजन की पेशकश भी की.

सद्दाम हुसैन

वर्ष 1978 में उनके दादा ने उनका नाम तब रखा था जब सद्दाम इराक़ के राष्ट्रपति नहीं बने थे लेकिन वह काफ़ी लोकप्रिय हो रहे थे. हालांकि उनका नाम जल्द ही उनके लिए परेशानियों का सबब बन गया.

स्कूल में उनके शिक्षकों ने उन्हें ऊंचे दर्जे पर रखना शुरू कर दिया और वे यह उम्मीद करने लगे कि युवा सद्दाम हुसैन अपने हमनाम के नक़्शेक़दम पर चलते हुए सफलताएं हासिल करेगा. जब वे उनकी उम्मीदों पर खरे नहीं उतरते थे तब उन्हें कड़ी सज़ा भी मिलती थी.

सेना में अनिवार्य भर्ती के प्रावधान के तहत जब वह सेना से जुड़े तो उन्हें यह उम्मीद थी कि सेना, सैनिक और वहां मौजूद अधिकारी उनसे बेहतर बर्ताव करेंगे लेकिन वास्तव में सब कुछ इसके उलट हुआ.

जब पहली दफ़ा वह अपनी वर्दी लेने गए तब वहां ड्यूटी कर रहे अधिकारी ने उनका नाम जानने के बाद उनसे हिंसक बर्ताव किया और गुस्से में यह भी कहा कि राष्ट्रपति से मिलता-जुलता नाम रखने का दुस्साहस कर उन्होंने उनके नाम का अनादर करने की कोशिश की है.

नाम बदलने में भी मुसीबत

जब 2003 में तानाशाह सद्दाम हुसैन को अपदस्थ कर दिया गया तब जेनरेटर ऑपरेटर सद्दाम ने सोचा कि अब उनके नाम से जुड़ा बोझ ख़त्म हो जाएगा लेकिन इराक़ में अमरीकी आक्रमण के बाद हक़ीक़त और भी जटिल हो गई.

राजनीतिक दलों ने उनके पिता को फोन कर उनका नाम बदलने के लिए कहा लेकिन उनके परिवार ने ऐसा करने से साफ़ इनकार कर दिया. लोग अब भी उन्हें सड़क पर धमकाते हैं. सरकारी कार्यालयों के कर्मचारी भी अक्सर उनके किसी अनुरोध पर सुनवाई करने से मना कर देते हैं.

जब उन्होंने साल 2006 में अपने नाम बदलने की कोशिश की तब हालात और बदतर हुए. नाम बदलने के इस काम के लिए इराक़ में यूनानी परंपरा वाली नौकरशाही को काफी वक़्त चाहिए था और सद्दाम को इसके लिए काफी रक़म भी खर्च करनी पड़ती.

इराक़ के उत्तरी और पश्चिमी सुन्नी बहुल इलाके और दक्षिण के शिया समुदाय से जुड़े दूसरे कई सद्दाम हुसैन ने मुझे अलग-अलग तरह की अपनी दुखद दास्तां सुनाई.

नाम और निष्ठा

इराक़ के रेगिस्तानी प्रांत अनबार के एक सुन्नी शहर रमादी में काम कर रहे एक पत्रकार सद्दाम ने बताया कि उनके पिता को सरकारी नौकरी से निकाल दिया गया था क्योंकि वह अपने वरिष्ठ अधिकारियों को इस बात के लिए आश्वस्त नहीं कर सके कि वह सद्दाम हुसैन की बाथ पार्टी के सदस्य नहीं हैं.

उन्होंने अपने बेटे का नाम सद्दाम रखा था इसलिए उनके वरिष्ठ अधिकारियों ने यह तर्क दिया कि अपदस्थ राष्ट्रपति के प्रति इससे ज़्यादा निष्ठा कैसे जताई जा सकती है कि कोई अपने बेटे का नाम ही उनके नाम पर रख ले.

सद्दाम हुसैन प्रतिमा
सद्दाम हुसैन को वर्ष 2006 में फांसी दी गई

एक दूसरे सद्दाम हुसैन ने मुझे और भी भयानक अनुभव सुनाए. उनका कहना था कि उन्हें शिया नागरिक सेना ने पकड़ लिया और उनके घुटनों पर बैठ कर उनके सिर के पीछे के हिस्से में बंदूक तान दी.

ख़ुशकिस्मती की बात यह थी कि वह बंदूक चल नहीं पाई और आख़िरकार उन्हें छोड़ दिया गया.

याद बाक़ी है

एक दोस्त ने मुझे बताया कि बग़दाद में एक कुर्द स्कूली बच्चे के रूप में उनकी दोस्ती सद्दाम हुसैन नाम के एक सहपाठी से हुई.

जब उस लड़के के साथ बच्चे फुटबॉल खेल रहे होते थे तो वे अक्सर उस पर चिल्लाते पाए जाते थे, "न केवल हम बल्कि पूरा देश तुमसे नफ़रत करता है."

सद्दाम को जब पकड़ा गया था तब से लेकर अब एक दशक गुज़र चुका है उनका शासन ख़त्म हो चुका है लोग उनके शासन के ख़त्म होने की सार्वजनिक तौर पर ख़ुशी जाहिर करते हैं.

अब उन्हें सम्मान देने वाली मूर्तियां, पोस्टर या कोई सार्वजनिक स्थल नहीं है.

लेकिन अब भी उनके हमनाम मौजूद हैं. इनके नाम की वजह से ही इस तानाशाह शासक की कुछ यादें बची हुई हैं.

मैंने जेनरेटर ऑपरेटर सद्दाम से पूछा कि जब लोग सड़कों पर उनके नाम के प्रति गुस्सा ज़ाहिर करते हुए चिल्लाते हैं तो उन्हें कैसा लगता है.

अपने एक मंजिला घर में पिता के साथ बैठे हुए सद्दाम कहते हैं, "मेरे पास नाम के सिवा कुछ भी नहीं है."

वह कहते हैं, "यह केवल एक नाम है." थोड़ा और ज़ोर देकर वह कहते हैं, "इसका कोई मतलब भी नहीं है."

प्रशांत राव एएफपी के इराक़़ ब्यूरो चीफ हैं.

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