शेख हसीना फिर बनीं बांग्लादेश की प्रधानमंत्री

  • 12 जनवरी 2014
शेख हसीना

बांग्लादेश की निवर्तमान प्रधानमंत्री शेख हसीना ने एक बार फिर देश की नई प्रधानमंत्री के बतौर शपथ ले ली है. प्रधानमंत्री के बतौर उनका यह तीसरा कार्यकाल होगा.

पिछले हफ़्ते देश में आम चुनाव हुए थे जिसका विपक्ष ने बहिष्कार किया था और हिंसा की कई घटनाएं हुई थीं, जिनमें कम से कम 18 लोगों की मौत हो गई थी और क़रीब 100 चुनाव केंद्रों पर आगज़नी की वारदात हुई थीं.

राजधानी ढाका में शपथ ग्रहण समारोह का आयोजन किया गया जिसे राष्ट्रीय टेलीविज़न पर पूरे देश में लाइव दिखाया गया.

हसीना की कैबिनेट के मंत्रियों को भी शपथ दिलाई गई है. राष्ट्रपति अब्दुल हामिद ने कैबिनेट के 29 मंत्रियों और 19 उपमंत्रियों को शपथ दिलाई.

शपथ ग्रहण के बाद शेख हसीना ने कहा कि वो लोकतंत्र की रक्षा के लिए काम करेंगी और अगर सर्वसम्मति से कोई फ़ैसला लेना पड़ा तो पीछे नहीं हटेंगी.

शेख हसीना की अवामी लीग पार्टी ने पिछले हफ़्ते हुए चुनावों में पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की है लेकिन बहुत सी सीटों पर विपक्ष ने अपने उम्मीदवार ही चुनाव मैदान में नहीं उतारे थे.

फिर चुनाव की मांग

विपक्ष की मांग थी कि मतदान प्रक्रिया के दौरान एक निष्पक्ष कार्यकारी सरकार का गठन किया जाए. इस बीच अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने देश में फिर से चुनाव कराने की मांग की है. माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में और हिंसा की वारदात हो सकती हैं.

बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने हसीना की सरकार को न चलने देने का ऐलान किया है और अपना पक्ष नरम करते हुए कहा हैकि अगर दोबारा चुनाव कराए जाते हैं तो वो भाग लेने को तैयार हैं.

बांग्लादेश के मौजूदा चुनाव 1971 के बाद देश में हुए सबसे हिंसात्मक चुनाव माने जा रहे हैं. शेख हसीना की कड़ी प्रतिद्वंद्वी और विपक्षी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की नेता ख़ालेदा ज़िया की तरफ़ से बहिष्कार का आह्वान किया गया था. इसके बाद देश में कई बार हड़तालें और विरोध प्रदर्शन हुए थे.

शपथ ग्रहण समारोह के दौरान ढाका के राष्ट्रपति भवन में विपक्षी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की नेता ख़ालेदा ज़िया मौजूद नहीं थीं. हालांकि पश्चिमी देशों के कई राजनयिकों ने इस समारोह में भाग लिया. संयुक्त राष्ट्र संघ, अमरीका और यूरोपियन यूनियन ने सभी पक्षों को विश्वास में लेकर चुनाव कराने की मांग की थी.

ज़िया की पार्टी की तरफ़ से चुनाव का बहिष्कार की वजह से नई सरकार को संसद में विपक्ष की तक़रीबन गैरमौजूदगी में सरकार चलानी होगी.

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