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'रिक्शे से चलो तो बेहतर, नहीं तो बम पड़ सकता है'

 सोमवार, 13 जनवरी, 2014 को 07:10 IST तक के समाचार
नितिन श्रीवास्तव, ऑटो, बांग्लादेश, चुनाव

नए साल के पहले दिन ढाका के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतरने के साथ ही तस्वीर थोड़ी साफ़ होने लगी थी.

होटल से लेने के लिए गाड़ी के बदले एक मैटाडोर पहुंची थी जिस पर बांग्ला में लिखा था 'इमरजेंसी सेवा'. ड्राइवर ने सफ़ाई दे डाली, "हालात ठीक नहीं हैं, गाड़ियां जलाई जा रहीं हैं और पथराव कहीं पर भी हो सकता है".

होटल पहुंचे, चेक-इन किया तो कमरे में एक नोट मिला, "देशव्यापी हड़ताल जारी है, होटल से बाहर निकलने पर मेहमानों की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है".

सोचा कहाँ फँस गए यार! नितिन श्रीवास्तव, फिर से. बहरहाल दफ्तर के ख़र्चे पर आए थे, काम भी करना था और अपनी ड्यूटी ट्रिप को 'जस्टिफाई भी', मजबूरी का नाम कुछ भी समझ लीजिए!

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लेकिन नौ दिनों में बांग्लादेश में जो देखा, जो सुना वो न तो अख़बार पढ़ने में समझ आता है और न ही इंटरनेट पर सर्फिंग कर के.

राजनीतिक अनिश्चितता के दौर में राजधानी ढाका जैसे ठप पड़ी थी. सत्ताधारी आवामी लीग गठबंधन आम चुनावों के लिए कमर कस चुका था और विपक्षी बीएनपी और सहयोगी जमात-ए-इस्लामी ने ठान रखा था कि किसी क़ीमत पर चुनाव में हिस्सा नहीं लेना है.

'शीशा नहीं खोलना'

बांग्लादेश, पेट्रोल बम

पूरे देश में हिंसा, हड़ताल और विरोध-प्रदर्शनों का तांडव जारी था.

कैमरामैन और वीडियो एडिटर की तलाश ख़त्म हुई, तो टैक्सी वाले ने निकलते समय निर्देश दे डाले, "खिड़की का शीशा भूल कर भी नहीं खोलिएगा".

हिम्मत नहीं पड़ी उनसे सफ़ाई मांगने की.

असल ताज्जुब तब शुरू हुआ जब ढाका में बड़े पत्रकारों, प्रोफेसरों और राजनीतिक विशेषज्ञों से मुलाकातें शुरू हुईं.

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लगभग सभी की राय बेबाक थी…लेकिन एक ही धारा की ओर. या तो लोग बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान और उनकी पार्टी के समर्थक हैं या फिर बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के.

साथ ही कुछ लोग सिर्फ़ संविधान की ही बात करते हैं और कुछ सिर्फ़ उसके उल्लंघन किए जाने की.

ये सभी दुविधाएं दूर हुईं बीबीसी बांग्ला सेवा के सहयोगियों के साथ बैठ कर अपना दर्द बांटने के बाद.

उन्होंने एक निष्पक्ष और सुलझे हुए तरीके से बांग्लादेश की राजनीतिक व्यवस्था, उसमे बैठी हुई सोच और हिंसा की वजह का पर्दाफ़ाश किया.

करीब तीन दिन ही हुए थे ढाका में कि एक स्थानीय सहयोगी अकबर हुसैन खाना खिलाने ले गए, रिक्शे पर.

'नहीं तो बम पड़ सकता है'

बांग्लादेश, हिंसा, हिंदू

बांग्लादेश में हिंसा में हिंदुओं को भी निशाना बनाया गया.

मैंने चिकन कोरमा का पहला लुकमा खाने के बाद हिम्मत जुटाई, "यार, हमें चार किलोमीटर रिक्शे से क्यों लाए हो?". अकबर साहब का जवाब था, "रिक्शे से ही चलो तो बेहतर, नहीं तो बम पड़ सकता है".

अब इस बात में कोई दो राय नहीं रही कि आज की तारीख़ में बांग्लादेश एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है जहाँ से पीछे मुड़ना उतना ही कठिन है जितना आगे के रास्ते का चयन करना.

दो बड़ी पार्टियों के प्रभुत्व की लड़ाई में निश्चित तौर पर आम बांग्लादेशी ही पिस रहा है.

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वो आम आदमी जो नौकरी पर जाता है, जो व्यापार करता है, जो सड़कों पर टैक्सी या बस चलाता है या फिर वो आम आदमी जिसे राजनीति से कुछ भी लेना-देना नहीं है.

एक ख़ूबसूरत देश जहाँ का मलमल और माछ दुनिया भर में विख्यात है, अपनी आज़ादी के कई दशक बाद भी एक ऐसी व्यवस्था की तलाश में हैं जिससे सरकार भी चल सके और हिंसा भी न हो.

क्योंकि बांग्लादेश में हिंसा का शिकार होने के बाद ही पता चलता है कि आहत हुए लोगों में मुसलमान भी थे और हिन्दू भी.

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