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मुशर्रफ पर मुक़दमा, वाह साईं वाह

 मंगलवार, 7 जनवरी, 2014 को 06:58 IST तक के समाचार
ज़ुल्फीकार अली भुट्टो

पांच जनवरी 2014 को अगर भुट्टो होते तो 86 बरस के होते. लेकिन शायद ये मेरी ख़्वाहिश है.

क्योंकि आज तक पाकिस्तान में जितने भी गवर्नर जनरल या राष्ट्रपति बने उनमें सिवाय फ़ज़ल इलाही चौधरी (82 वर्ष) और ग़ुलाम इसहाक़ खान (91 वर्ष) को छोड़कर किसी ने भी 80 का आंकड़ा पार नहीं किया जबकि प्रधानमंत्री तो एक भी ऐसा नहीं गुज़रा जो 80वां साल देख सका हो.

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लेकिन भुट्टो साहब आज ख़ास तौर पर यूं याद आए कि जब वो कालकोठरी में थे तो उन्हें दांतों की बड़ी तकलीफ़ होती रही लेकिन ज़िया सरकार ने जेल के अस्पताल में ही उनका इलाज जारी रखा और उनके निजी डेंटिस्ट डॉक्टर ज़फ़र नियाज़ को कभी परेशान नहीं होने दिया जबकि कम्बाईंड मिलिट्री हॉस्पीटल वहाँ से चंद क़दमों के फ़ासले पर स्थित था.

परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर नवाब मोहम्मद अहमद ख़ान के क़त्ल में भुट्टो साहब शायद इससे कम शामिल थे जितने परवेज़ मुशर्रफ़, अकबर बुगटी की हत्या या जामिया हफ्साह की कार्रवाई में लिप्त बताए जाते हैं. लेकिन भुट्टो की ज़मानत नहीं हो सकी और मसूद महमूद की सरकारी गवाही ने भुट्टो को फांसी के तख्ते तक ले जाने की वाजिब वजह दी थी.

मुक़दमा

पाकिस्तान

लेकिन जब असली गवाहों के ग़ायब या बयान से मुकर जाने का फ़ैशन शुरू हो गया है और कोई किसी मामले में सरकारी गवाह बनने को तैयार नहीं है. बल्कि हालात कुछ ऐसे बन गए हैं कि गवाह तो क्या आज कल कोई वकील तक किसी व्यक्तिगत, सामूहिक या संस्थागत दबाव के आगे टिक नहीं पाते और अपने वकालतनामे को ख़ुद रद्द कर देते हैं.

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लेकिन वकीलों को एक तरफ़ रखिए, ख़ुद कई जज भी तारीख़ पर तारीख़ डालते चले जाते हैं जबतक कि उनका तबादला न हो जाए या फिर वे छुट्टी न ले लें या फिर तरक्क़ी पाकर मुक़दमा किसी और के हवाले न कर जाएं.

जज ही क्या ख़ुद कई जाँच अधिकारी भी तफ्तीश के नतीजों से डर कर मुजरिम के पैरों के निशान का रुख़ दरवाज़े तक पहुंचने से ठीक पहले ही एहतियातन जंगल की ओर मोड़ देते हैं.

भला कौन होगा कि किसी को इंसाफ़ दिलाते-दिलाते ख़ुद अपने बेडरूम के पंखे से झूल जाए या जांच करते-करते फूले पेट के साथ किसी नहर के पुल के नीचे किसी झाड़ी में अटका पाया जाए या इत्तेफ़ाक़न ही सही लेकिन अपनी ही रिवाल्वर इस तरह से चल जाए कि गोली अपनी ही कनपटी फाड़कर निकल जाए या मरने के बाद चौथी मंज़िल से कूद जाए.

विस्फोटक सामाग्री

अब्दुल कदीर खान जनरल मुशर्रफ के साथ

इसलिए आज कल जो यह कहता है कि काग़ज़ पर बंदूक़ की नाल से दस्तख़त नहीं हो सकता, ज़रा सामने आकर तो कहे. चार अप्रैल 1979 तक जनता को तीन तरह के विस्फोटक रटे हुए थे, यानी डायनामाइट, आरडीएक्स और प्लास्टिक एक्सप्लोसिव.

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लेकिन आज तो अल्लाह जाने कितने तरह की विस्फोटक सामाग्री मौजूद हैं. यहां तक कि फ़्रेंड्ली आईईडी (इंप्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) भी आ गए हैं जो फटते-वटते नहीं बल्कि केवल डराने-धमकाने के काम आते हैं.

ऐसे माहौल में ऐसे मीडिया के पंडितों को देख सुनकर बड़ा अच्छा लगता है जो निर्दोष मासूम सवालों से बास्केटबॉल खेल रहे हैं.

मसलन क्या मुशर्रफ़ साहब के बॉडीगार्ड एमबीबीएस भी थे जो सीने में दर्द उठते ही हार्टअटैक को भांप लिया और आपातकालीन चिकित्सा के लिए अच्छी भली अदालत जाती गाड़ी का रुख़ दो मिनट की दूरी पर स्थित पॉलीक्लिनिक या आठ मिनट दूर पीआईएमएस अस्पताल की ओर मोड़ने के बजाय 25 मिनट की जानलेवा दूरी पर स्थित आर्म्ड फोर्सेज़ इंस्टीच्यूट ऑफ़ कार्डियोलॉजी की ओर कर लिया?

परमाणु कार्यक्रम

पाकिस्तान का एक परमाणु संयंत्र

हालांकि दिल के दौरे के बाद मरीज़ की ज़िंदगी के लिए एक-एक लम्हा क़ीमती होता है. या ये सवाल केवल मुशर्रफ़ से ही क्यों पूछा जाए? उन्होंने ये सब कुछ अकेले तो नहीं किया. इस गुनाह में शामिल बाक़ी लोग कहाँ हैं?

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मगर यह सवाल तब भी पूछना चाहिए था जब परमाणु बम निर्माता अब्दुल क़दीर ख़ान से टीवी पर ये कहलवाया गया था कि वो अकेले परमाणु सामग्री की तस्करी में लिप्त हैं और इसके लिए अकेले ही शर्मिंदा हैं और इसलिए अकेले ही माफ़ी भी मांगते हैं.

आसान ज़ुबान में तर्जुमा यूं होगा कि फौज़ की निगरानी में जारी परमाणु कार्यक्रम के आला अफ़सरान से लेकर कहूटा के गेट पर उँघने वाले संतरी तक किसी को कभी भी इसकी भनक तक नहीं हुई कि सैकड़ों सेंट्रीफ्यूज और संवेदनशील नक्शे बुश कोट और पतलूनों की जेबों में अड़स कर उड़ने वाली कालीन पर बैठकर पियोंगयांग, तेहरान और दुबई तक 'आ रिया हूँ, जा रिया हूँ, जा रिया हूँ, आ रिया हूँ...' का सिलसिला चलाते रहे.

कोर्ट मार्शल

परवेज मुशर्रफ

क़दीर तो अकेले परमाणु बाज़ीगर बन सकते हैं लेकिन कमांडो मुशर्रफ़ एक मामूली सा संविधान भी अकेले नहीं तोड़ सकते? वाह साईं वाह.

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या ये दलील कि 12 अक्तूबर, 1999 को तत्कालीन सर्विस चीफ़ ऑफ़ आर्मी स्टाफ़ ने तख्ता पलट किया और तीन नवंबर 2007 की इमरजेंसी और संविधान का आंशिक निलंबन भी चीफ़ ऑफ आर्मी स्टाफ़ का काम था इसलिए उन पर किसी नागरिक अदालत में मुक़दमा नहीं चल सकता लेकिन कोर्ट मार्शल हो सकता है.

बात ये है कि अगर कोर्ट मार्शल उतना ही आसान होता तो जनरल याह्या ख़ान और जनरल नियाज़ का भी हो जाता.

ब्राह्मण, सैयद और जनरल और जनरल अगर सैयद हो तो? बात कहीं से कहीं निकल जाएगी... तो इस बात पर मिट्टी डालते हैं...

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