'मच्छी-भात मिलता रहे, वोट से क्या मिलेगा'

  • 7 फरवरी 2014
बांग्लादेश की राजधानी ढाका में एक रिक्शाचालक सिराज

दोपहर का समय है और ढाका की क़ाज़ी नज़रुल सड़क पर एक रिक्शा चालक मेरी ओर पूरे पांच मिनट से देख रहा था. दो बार पूछने की कोशिश भी की पर मैंने इशारे से बता दिया 'किराए पर नहीं चाहिए.'

फिर रहा नहीं गया, पास पहुँचकर पूछा कितना कमा लेते हो दिन में, कल वोट देने जा रहे हो? जवाब मिलता है, "बांग्ला, बांग्ला!"

(जहाँ चुनाव के पहले ही तय है हार-जीत)

किसी तरह बस स्टॉप पर खड़े सज्जन को मनाया और इस बार जवाब मिला, "मच्छी-भात मिलता रहे, वोट से क्या मिलेगा'. मेरी दिलचस्पी भी बढ़ी और जिज्ञासा भी.

30 बरस से रिक्शा चला रहे सिराज इस्लाम ढाका के बाहर ग़ाज़ीपुर इलाक़े में रहते हैं.

वह कहते हैं, "हमारे पिताजी सिलीगुड़ी से हमें भी यहाँ ले आए. पढ़े-लिखे थे नहीं, बस यही काम किया है, लेकिन खलता बहुत है जब राजनीतिक हिंसा के चलते कई दिन बिना एक टका कमाए रहना पड़ता है."

उन्होंने बताया, "आप किसी भी साधारण आदमी से बात कर लीजिए. कोई हड़ताल, आगज़नी और ख़ून-ख़राबा नहीं चाहता."

तनाव

बांग्लादेश

प्रमुख विपक्षी दलों के बहिष्कार के बावजूद रविवार को बांग्लादेश में आम चुनाव होने जा रहे हैं.

(इस्लामी नेता पर युद्ध अपराध का आरोप)

राजधानी ढाका के बाहर का माहौल बेहद ख़राब बताया जा रहा है क्योंकि ट्रेनों समेत बसों पर हमले हो रहे हैं और सड़कों पर यातायात ठप है.

प्रधानमंत्री शेख हसीना ने सभी दलों से चुनावी प्रक्रिया में शामिल होने की अपील पहले ही कर रखी है, लेकिन ख़ालिदा ज़िया की बीएनपी पार्टी और जमात-ए-इस्लामी ने इसका विरोध किया है.

हक़ीक़त यही है कि 300 संसदीय सीटों में से 153 पर आवामी लीग और उसके सहयोगियों के लिए मैदान खाली पड़ा है क्योंकि विपक्ष ने विरोध में उम्मीदवार नहीं उतारे हैं.

आम आदमी

बांग्लादेश की राजधानी ढाका में झालमुड़ी विक्रेता रहमान

लेकिन कई लोग ऐसे भी हैं जिन्हें देश में नई सरकार बनने-बिगड़ने में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं है. स्थानीय लोगों से पता चला कि रहमान की झालमुड़ी खाने लोग ढाका में दूरदराज़ से आते हैं.

(पुलिस और प्रदर्शनकारियों में टकराव)

रहमान खुद पांच बच्चों के पिता हैं और बताते हैं कि उनके परिवार का पेट पालने के लिए कम से कम 5,000 टका महीने की आमदनी तो चाहिए ही.

उन्होंने कहा, "बड़े नेता तो बड़ी गाड़ियों में चलते हैं, अफ़सर लोग बड़े घरों में रहते हैं, जिनमें सुरक्षा भी होती है. हमारा क्या जो सुबह रेहड़ी लगाते हैं. अपनी जान जोखिम में डालते हुए इस उम्मीद के साथ कि शाम की रोटी का बंदोबस्त हो जाएगा."

रहमान और सिराज की तरह ढाका में अब तक मुझे सैंकड़ों-हज़ारों लोग दिख चुके हैं, जिनका मक़सद अपनी दिहाड़ी कमाना और शाम को घर लौट जाना है.

ग़ौर करने वाली बात यह भी है कि यह सब कुछ सड़कों पर व्याप्त तनाव और किसी भी पल हिंसा भड़क उठने के डर के बावजूद हो रहा है.

बांग्लादेश के संवैधानिक इतिहास के लिए पाँच जनवरी, 2014 एक बड़ी तारीख़ ज़रूर होगी लेकिन सिराज और रहमान जैसों को साल के 365 दिन एक ही आज और एक ही कल से दो-चार होना पड़ता है.

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