तालिबानः नवाज शरीफ़ ने चरमपंथी धार्मिक नेता से मांगी मदद

  • 1 जनवरी 2014

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने एक चरमपंथी धार्मिक नेता से कहा है कि वह सरकार और पाकिस्तानी तालिबान के बीच रुकी हुई बातचीत फिर से शुरू करने में मदद करें.

इस धर्मगुरु को 'फ़ादर ऑफ तालिबान' के नाम से जाना जाता है और इनका तालिबान पर ख़ासा असर है.

जमात उलेमा-ए-इस्लाम के एक धड़े के मुखिया मौलाना सामी-उल-हक़ ने प्रधानमंत्री के घर उनसे मुलाकात की.

एक आधिकारिक बयान में कहा गया है, ''दोनों नेताओं ने राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर विमर्श किया.'' हालांकि इस बारे में विस्तृत जानकारी नहीं दी गई.

बैठक में शामिल मौलाना समी उल के प्रवक्ता अहमद शाह ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि रविवार को प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने मौलाना को फ़ोन करके बुलाया था .

अहमद शाह के मुताबिक प्रधानमंत्री ने बैठक में सामी हक से कहा कि हम तालिबान से बातचीत करना चाहते हैं.

ख़बरों में यह भी कहा गया है कि हक़ ने प्रधानमंत्री को इस बात का आश्वासन दिया कि वो शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में अपने प्रभाव का इस्तेमाल करेंगे.

ड्रोन हमला

हकीमुल्लाह महसूद
पाकिस्तानी तालीबान के नेता हकीमुल्लाह महसूद एक ड्रोन हमले में मारे गए थे.

पिछले साल जून में प्रधानमंत्री बनने के बाद शरीफ़ पाकिस्तानी तालिबान और अन्य चरमपंथी समूहों से शांति वार्ता शुरू करने की कोशिश कर रहे हैं.

पिछले साल नवंबर में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के मुखिया हकीमुल्लाह महसूद के अमरीकी ड्रोन हमले में मारे जाने के बाद इस संगठन ने शांति प्रक्रिया से ख़ुद को अलग कर लिया था.

हक़ 'दारुल उलूम हक्कानिया' मदरसे के मुखिया हैं जहां से तालिबान के कई शीर्ष नेता निकले हुए हैं.

चरमपंथियों से बातचीत के लिए शरीफ़ व्यक्तिगत रूप से राजनीतिक और धार्मिक लोगों से मुलाकात कर रहे हैं.

एक्सप्रेस ट्रिब्यून के अनुसार, प्रधानमंत्री ने हक़ से वज़ीरिस्तान में सैन्य कार्रवाई के बारे में जानकारी दी और बातचीत की प्रक्रिया में शामिल होने का न्यौता दिया.

हक़ ने कहा कि सरकारी नीति में बदलाव से तालिबान बातचीत के लिए राज़ी हो सकते हैं.

जियो चैनल से बातचीत में उन्होंने कहा कि वो बातचीत के अवरोध को खत्म करने की कोशिश करेंगे लेकिन मुख्य मुद्दा ड्रोन हमलों को रोकना है.

ग़ौरतलब है कि इससे पहले शांति प्रक्रिया के लिए आयोजित ऑल पार्टी कांफ़्रेस में हक़ की पार्टी को शामिल नहीं किया गया था.

सरकार ने पहले हक़ को इसमें शामिल होने का न्यौता दिया था लेकिन उनके बारे में जानने के बाद उनका नाम हटा दिया गया था.

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