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पाकिस्तान की राजनीतिः कहाँ से चले, कहाँ आ गए?

 मंगलवार, 31 दिसंबर, 2013 को 07:48 IST तक के समाचार
ताहिरुल कादिरी

"सारे देश की जनता, 40-50 लाख के करीब लोग, सब ने जमा होकर, जिन्होंने आप को वोट के ज़रिए जनादेश दिया था, उन्होंने विरोध की शक्ल में अपना मैंडेट आप से वापस ले लिया है." पाकिस्तान में साल 2013 नए इंकलाब के इसी नारे के साथ शुरू हुआ था.

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तहरीके मिनहाजुल कुरान के प्रमुख ताहिरुल कादिरी कनाडा से पाकिस्तान आए और अपने हज़ारों समर्थकों के साथ राजधानी इस्लामाबाद में धरना दे दिया.

उनकी मांगों में संघीय और प्रांतीय असेंबलियों को भंग करना भी शामिल था. विश्लेषक ख़ादिम हुसैन कहते हैं कि ताहिरूल कादिरी के पीछे वो सारी जमातें थीं जो लोकतंत्र का गला घोटती रही हैं.

उन्होंने बताया, "आप देखते हैं कि जब ताहिरुल कादरी साहब तशरीफ ले आए तो अचानक उन्हें याद आया कि पाकिस्तान के संविधान में दो प्रावधान ऐसे हैं जिन पर अभी तक अमल नहीं हो पाया है और जब तक कि इन पर अमल नहीं होगा ये लोकतांत्रिक व्यवस्था चल नहीं सकती."

लेकिन जितनी तेज़ी से ये नारे बुलंद हुए थे उसी तरह शांत भी हो गए. ख़ादिम हुसैन मानते हैं कि ऐसा होने की वजह थी सभी राजनीतिक दलों का इस बात पर राज़ी होना कि लोकतंत्र की जो बयार देश में चली है वो जारी रहे.

पाकिस्तानी आवाम

पाकिस्तानी आवाम

ख़ादिम हुसैन बताते हैं, "इस पूरे हथकंडे में जो बात बहुत अहम थी, वो ये थी कि किस तरह से लोकतांत्रिक अंदाज से पाकिस्तान के राजनीतिक प्रशासन ने उस पूरी कवायद के ग़ुब्बारे की हवा निकाल दी. ये बहुत अहम बात है. उसे जेल में नहीं डाला गया, उसका रास्ता नहीं रोका गया, उसे डराया धमकाया नहीं गया. उसके पास जाकर केवल छह घंटे बैठे और फिर एक प्रेस कांफ्रेंस में सब कुछ तय हो गया."

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और फिर 11 मई को देश में आम चुनाव हुए और तमाम धमकियों और ख़तरों के बावजूद लोगों की बहुत बड़ी तादाद वोट डालने के लिए घरों से निकली और पाकिस्तान के इतिहास में पहली बार वोट के ज़रिए चुनी गई एक सरकार ने लोकतांत्रिक तरीके से बहुमत में आए राजनीतिक दल को सत्ता की बागडोर सौंपी.

हालांकि चुनाव में धांधली के आरोप भी लगे लेकिन सभी राजनीतिक दलों ने नतीजों को ख़ुशी से स्वीकार किया. वरिष्ठ पत्रकार मुबर्शर जैदी कहते हैं कि ये पाकिस्तान की जनता के लिए बहुत अहम घड़ी थी.

उन्होंने बताया, "मेरे ख्याल में बीते तीन चार दशकों में इससे बढ़कर कोई ख़ुशी पाकिस्तान की जनता के लिए नहीं आई, क्योंकि सेना ने इतनी ज़्यादा सरकारों को सत्ता से बाहर किया और ख़ुद कमान संभाल ली. सब का ख्याल ये था कि जनादेश कुछ ऐसा होगा कि किसी को बहुमत हासिल नहीं हो पाएगा. पाकिस्तान की जनता ने सबको चौंका दिया."

ज़रदारी की विदाई

बिलावल भुट्टो, आसिफ अली ज़रदारी

लेकिन आम चुनाव में सभी राजनीतिक दल खुलकर चुनाव प्रचार नहीं कर पाए. कई राजनीतिक दल चरमपंथी तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान की हिट लिस्ट में थे जिसकी वजह से वो न कोई रैलियां कर पाए न ही वो खुले तौर पर लोगों से भेंट-मुलाक़ात कर पाए.

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ख़ादिम हुसैन कहते हैं, "उनको मुहिम चलाने नहीं दी गई, उनको अपने घर से बाहर निकलने नहीं दिया, उनके मतदाताओं को डराया धमकाया गया. लोगों को अगवा किया गया, उन पर हमले किए गए. डर का कुछ ऐसा माहौल बना दिया गया कि ख़ैबर पख़्तूनख़्वाह में रैली नहीं हुई, सिॆध में रैली नहीं हुई, बलूचिस्तान में रैली नहीं हुई. रैलियां केवल पंजाब में हो रही थीं जैसे बस वहीं चुनाव हो रहे हों."

लेकिन फिर भी चुनाव का काम जारी रहा. आम चुनावों के ढाई माह बाद राष्ट्रपति का चुनाव हुआ. मुस्लिम लीग नवाज के ममनून हुसैन पाकिस्तान के नए राष्ट्रपति चुने गए. और फिर 8 सितंबर को आसिफ़ अली ज़रदारी पद से विदा हुए.

नवाज़ शरीफ़ ने ज़रदारी के पद छोड़ने के मौके पर कहा, "पाकिस्तान के 66 साल के इतिहास में आसिफ़ अली ज़रदारी पहले ऐसे निर्वाचित राष्ट्रपति हैं जो अपना संवैधानिक कार्यकाल पूरा करके पूरे सम्मान के साथ विदा हुए."

पाकिस्तान तालिबान

नवाज़ शरीफ़

हालांकि आसिफ़ अली ज़रदारी पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे थे लेकिन उनके विरोधी भी मानते हैं कि देश में लोकतंत्र के पक्ष में जो माहौल तैयार हुआ उसमें उनका भी योगदान था.

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आसिफ़ अली ज़रदारी की राष्ट्रपति भवन से विदाई के दूसरे दिन ही संघीय सरकार के निमंत्रण पर सभी राजनीतिक दलों की बैठक हुई जिसमें ये तय हुआ कि देश में चरमपंथ को ख़त्म किया जाएगा और इसकी शुरूआत पाकिस्तान तालिबान से बातचीत से होगी.

मगर सितंबर के ही महीने में दीर बाला, पेशावर और दूसरी जगहों पर चर्चों और सैन्य काफिले पर हमले हुए, जिसमें एक फौजी जनरल समेत लगभग सवा सौ लोगों की मौत हो गई. बावजूद इसके नवाज़ शरीफ़ सरकार तालिबान से बातचीत के अपने फैसले पर क़ायम रही.

लेकिन नवंबर में एक अमरीकी ड्रोन के हमले में पाकिस्तानी तालिबान के प्रमुख हकीमुल्लाह महसूद की मौत के बाद तालिबान के भीतर ही बातचीत को लेकर फूट पड़ गई. मुस्लिम लीग नवाज़ और तहरीके इंसाफ़, दोनों राजनीतिक दलों ने इसे शांति की स्थापना की कोशिश पर हमला बताया.

मुशर्रफ पर मुकदमा

परवेज़ मुशर्रफ

जमीयते उलमाए इस्लाम और जमाते इस्लामी के प्रमुखों ने तो हकीमुल्लाह महसूद को शहीद ही कह डाला. इस पर पाकिस्तान की सेना ने नाराज़गी जताई और कहा कि वो इसके लिए माफी मांगे.

लेकिन जमात ने ऐसा करने से इनकार कर दिया. इसके बाद पाकिस्तानी सरकार के नजरिए में भी बदलाव दिख रहा है और वो शांति की बात को उतने ज़ोर से नहीं कह रही है.

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ख़ादिम हुसैन का माना है कि देश में चरमपंथ को खत्म करने के लिए एक नीति तैयार करनी होगी. वे कहते हैं, "उसके लिए फ्रेमवर्क बनाने की ज़रूरत है कि बातचीत कैसे की जाएगी. इस मुद्दे पर तस्वीर अभी तक साफ़ नहीं है. पहले बातचीत के तौर तरीके तय किए जाएं फिर उस पर आगे बढ़ा जाए."

और साल 2013 में ही पूर्व सेनाध्यक्ष और राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के खिलाफ देशद्रोह के मामले में मुक़दमा शुरू किया गया है.

पाकिस्तान में ये पहली बार है कि सेना के किसी पूर्व प्रमुख को देशद्रोह के मामले में कटघरे में खड़ा किया जा रहा है. मगर इस मामले का आधार 1999 के सैन्य तख़्तापलट को नहीं बल्कि उनके आदेश पर संविधान के निलंबन और इमरजेंसी लागू करने को बनाया गया है.

कुछ वर्गों में इसे संदेह की निगाह से देखा जा रहा है.

साल 2013 पाकिस्तान के लोकतंत्र और लोकतांत्रिक ताकतों के लिए बेहतर और हौसले वाला साल रहा है लेकिन चरमपंथ, गंभीर आर्थिक स्थिति जैसी समस्याएं उसके आसपास के घेरे को तंग कर रही हैं.

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