चीन: अपनों के बीच बेगाने हुए माओत्से तुंग

  • 26 दिसंबर 2013

अमरीकी नागरिक सिडनी रिडेनबर्ग ने चीन में उस समय 35 साल गुजारे जब वहां बेहद उथल-पुथल मची हुई थी और माओत्से तुंग सहित कई दूसरे प्रमुख चीनी नेताओं के साथ उनकी गहरी दोस्ती थी. यहां हम चीन के गृह युद्ध, साम्यवाद के शुरुआती दिनों और माओ के दर्शन के बारे में उनके नज़रिए को रख रहे हैं.

चीन की किसी भी दूसरी चीज़ की तरह ही माओ की भूमिका भी विरोधाभाषी अध्ययन का विषय है. वो कमोबेश एक ऐसा विराट व्यक्तित्व थे जो बीजिंग की पहचान पर हावी रहे और यह प्रभाव फिलहाल तो कम होता नहीं दिखाई दे रहा है.

चीनी जनवादी प्रजातंत्र की स्थापना करने वाले माओ की पहचान जार्ज वाशिंगटन की तरह है. वो अपने समय में एकता के महान सूत्रधार थे.

लेकिन आज उनकी पार्टी के नए सदस्यों सहित चीन के युवा मुश्किल से ही उनके लेखन, उनके सिद्धान्तों, उनकी महान सफलताओं और भयानक भूलों के बारे में कुछ जानते हैं.

उहापोह का दौर

शी जिगपिंग और उनके प्रमुख साथियों ने चेतावनी दी थी कि सोवियत की तर्ज पर माओवाद को उदार बनाने से काफी भ्रम फैल सकता है और इससे मौजूदा शासन कमजोर होगा.

इसके साथ ही वो 1950 के दशक के 'ग्रेट लीफ फॉरवर्ड' या 1966 से 1976 तक चली सांस्कृतिक क्रांति जैसे भयानक माओवादी रोमांच से भी नहीं गुजरना चाहेंगे. सत्ता के अहंकार में किए गए इन सामाजिक प्रयोगों में करोड़ों निर्दोष लोगों की मौत हो गई थी.

स्टालिन के विपरीत माओ ने किसी को जेल में नहीं डाला और निश्चित रूप से वो भयानक अत्याचार के पक्ष में नहीं थे.

लेकिन वो अच्छी तरह से जानते थे कि वो एक बड़े सामाजिक प्रयोग में शामिल हैं, जिसने लाखों लोगों की जान जोखिम में डाल दी है और नतीजों को लेकर वो खुद भी बहुत अधिक आशावान नहीं थे.

उन्होंने वामपंथी अमरीकी लेखक अन्ना लुईस स्ट्रांग से 1958 में इस बात को स्वीकार किया था. स्ट्रांग उस समय माओ की सफलताओं पर केंद्रित एक किताब लिख रहीं थीं.

इंतजार कीजिए!

जब उन्होंने माओ से बात की तो उन्होंने कहा, "इस बारे में लिखने से पहले अभी पांच साल और इंतजार कीजिए." स्ट्रांग बताती हैं कि वो नतीजों को लेकर आश्वस्त नहीं थे.

तो क्या शी जिनपिंग माओवाद की समीक्षा कर रहे हैं? या इसी कारण चॉन्गचिंग में पार्टी के पूर्व प्रमुख बो शिलाई के महत्व को कम किया गया.

दोनों ही सवालों का उत्तर है ''नहीं.''

बो गरीबों का समर्थन हासिल करने के लिए एक लोकप्रिय नेता की तरह समतावादी नारों का इस्तेमाल कर रहे थे.

जहां तक शी जिनपिंग की बात है, तो उनकी सुधारवादी नीतियां सीधे माओवादी अर्थशास्त्र के विपरीत हैं, लेकिन उन्होंने चीन की समस्याओं का विश्लेषण और उनके समाधान के लिए कुशलता के साथ माओवादी द्वंद्वात्मकता के तर्क का इस्तेमाल किया है.

वो माओ के नेतृत्व की सकारात्मक उपलब्धियों को स्वीकार करते हैं.

संघर्ष के दिन

इस तरह हम एक बेहद रोचक मोड़ पर आ जाते हैं. मोटेतौर पर पश्चिमी विद्वानों ने माओ के विश्लेषणों और दर्शन की अनदेखी की है. हालांकि अब खुद चीन में ही उनकी अनदेखी की जा रही है.

जब मैं सितंबर 1945 में चीन आया, उस दौर को याद कीजिए.

दो विरोधी दल कुओमिटांग (केएमटी) राष्ट्रवादी और चीन के कम्युनिस्ट अपने सैन्य बलों को तैयार कर रहे थे. दोनों ही गरीबों के हितों के नाम पर एक खुनी गृह युद्ध के लिए खुद को तैयार कर रहे थे.

राष्ट्रवादी पक्ष के पास हट्टे-कट्टे और अच्छी तरह से प्रशिक्षित सैन्य टुकड़ी थी, जिसके पास हवाई सहायता और टैंक डिवीजन, भारी तोपखाने और मोटर आधारित परिवाहन प्रणाली थी. उनकी संख्या कम्युनिस्टों के मुकाबले कई गुना थी.

संचार के सभी प्रमुख साधनों पर उनका नियंत्रण था और मंचूरिया के बाहर सभी प्रमुख शहरों पर उनका ही प्रभाव था.

उन्हें हथियार और धन के रूप में अमरीका की मदद हासिल थी. हर लिहाज से उनकी श्रेष्ठता जगजाहिर थी.

दर्शन के शिक्षक

कम्युनिस्ट पक्ष की बात करें तो साधनविहीन ही दिखते थे. नवंबर 1946 में यनन से 40 किलोमीटर दूर कम्युनिस्ट की 359वीं ब्रिगेड से मिलने गया, जिसका कमांडर वांग जेन मेरा दोस्त था.

359वीं ब्रिगेड का लंबा इतिहास रहा है और उसने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान एक अमरीकी एयरबेस तैयार करने में मदद भी की थी.

यनन में उन्हें मार्च करते हुए देखकर मैं चकित रह गया. वो पुराने कपड़ों में एक भीड़ की तरह दिखाई दे रहे थे. उनमें से ज्यादातर तरुण थे.

प्रत्येक दस्ते में कुछ लोगों के पास ही जूते थे और ज्यादातर के पास खुद तैयार की गई घास की चप्पलें थीं. दस लोगों में पांच या छह के पास जापानी राइफल थी. बाकी बरछी-भाला लिए हुए थे.

यह दृश्य देखकर मेरा दिल दहल उठा: ये कैसे जीत सकेंगे?

इसके बावजूद वो जीते. आखिर क्यों? एक श्रेष्ठ, अधिक वैज्ञानिक सोच के कारण, जिसने कुशल और अधिक लोकप्रिय नीतियों (जैसे भूमि सुधार) को बढ़ावा दिया.

माओ खुद को हमेशा एक प्राथमिक स्कूल का शिक्षक बताते थे. वास्तव में वो मानवता के इतिहास में दर्शन के एक महान शिक्षक थे.

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