'नेता होता तो दो घंटे में इंतज़ाम होता, सेना के जवान के लिए कुछ नहीं'

  • 22 दिसंबर 2013

अफ्रीकी देश दक्षिणी सूडान के जोंगलेई राज्य में संयुक्त राष्ट्र की शांति सेना के मारे गए दो भारतीय जवानों में से एक सूबेदार कुवँर पाल सिंह की बेटी की न अब स्कूटी आएगी, न उनकी बीवी को शादी की पच्चीसवीं सालगिरह का तोहफ़ा मिलेगा.

गुड़गाँव के पास हरियाणा के भोंडसी गाँव में सूबेदार कुवँर पाल सिंह की पत्नी की पत्नी का विलाप बिना प्लास्टर की दीवारों वाले उनके घर के बाहर तक सुना जा सकता था.

अस्लिंहता देवी अपने पति को बार बार याद करती हैं, "मेरे राम चले गए, मैं कैसे जिउंगी."

लोगों में मलाल

दक्षिणी सूडान में संयुक्त राष्ट्र के मिशन के प्रवक्ता के बयान में कहा गया है कि गुनारक में लगभग 84 भारतीय शांति सैनिक हैं.

सभी को बोर इलाके में स्थानांतरित करने की कोशिश की जा रही है. लेकिन बोर की हवाई पट्टी के असुरक्षित होने के कारण इसमें दिक्कतें आ रही हैं.

कुंवर पाल गुरुवार को भारतीय शांति सैनिकों के शिविर पर हुए हमले में मारे गए.

दक्षिणी सूडान से उनके शव को लाने में हो रही देरी पर उनके परिवार और गांव में बहुत रोष है.

उनकी पत्नी के भाई सुमित कहते हैं, "कोई नेता होता तो दो घंटे में इंतज़ाम हो जाता. यहाँ सेना के जवान के लिए कोई सुविधा नहीं है?"

कुवँर पाल सिंह के चचेरे भाई राम किशन राघव ने बताया, "हमारे भाई का शव पहले रविवार को आना था लेकिन अब कर्नल शोयम सिंह का फ़ोन आया था कि अब हमारे भाई का शव सोमवार सुबह गाँव पहुंचेगा."

स्थानीय लोगों को इस बात का भी मलाल है कि कुवँर पाल सिंह के घर अभी तक गाँव के सरपंच के अलावा कोई नेता या सरकारी अफ़सर नहीं पहुँचा है.

दक्षिणी सूडान में भारतीय सैनिकों की मौत

आठवीं तक पढ़ी सूबेदार कुवँर पाल सिंह की पत्नी अस्लिंहता देवी पर अब 18 साल की बेटी अंजली राघव और 13 साल के बेटे तरुण राघव की परवरिश की ज़िम्मेदारी आ गई है.

वह कहती हैं, "बेटी को डॉक्टर बनाना चाहते थे, बेटे को अफसर बनाना चाहते थे, घर अधूरा बना है, उसे पूरा करना था, अब मैं कैसे ये सब पूरा करुँगी."

'पापा पर गर्व है'

अंजली
बीएससी कर रही अंजली अपने पिता के जाने से लगभग बदहवासी की हालत में हैं.

बीएससी कर रही अंजली राघव ने दो दिन पहले ही मेडिकल का फॉर्म भरा था. वह अपने पिता के जाने से सदमे में हैं.

अंजली पूछती हैं, "जब मेरे पापा पर सूडान में हमला हुआ तब कहाँ थी इंडियन आर्मी? मेरे पापा को बचाने के लिए कोई नहीं आया." वह कहती हैं, "मुझे अपने पापा पर गर्व है."

सूबेदार कुवँर पाल सिंह पूरे गाँव में एक आदर्श इंसान, ज़िम्मेदार पिता और परिवार को प्यार करने वाले व्यक्ति के रूप में याद किए जा रहे हैं.

सूबेदार कुवँर पाल सिंह की पत्नी और बच्चे मेरठ में रहते हैं लेकिन यह ख़बर मिलने के बाद वे लोग भोंडसी आए हुए थे.

अस्लिंहता देवी ने आख़िरी बार अपने पति को 24 मई को मेरठ कैंट स्टेशन पर विदा किया था.

वह कहती हैं, "जाते वक्त मुझसे कह रहे थे कि बेटी बस से कोचिंग जाती है. मैं वापस आकर स्कूटी दिला दूंगा. ट्रेन जाते समय उन्होंने खिड़की से झाँक कर, हाथ हिलाकर विदा ली थी."

पच्चीसवीं सालगिरह बीती थी

अस्लिंहता देवी
अस्लिंहता देवी अपने पति को याद करते हुए उन्हें राम नाम से पुकार रहीं थीं.

सूबेदार कुवँर पाल सिंह और अस्लिंहता देवी की शादी की इस नवंबर में पच्चीसवीं सालगिरह बीती थी. फोन पर उन्होंने अपनी पत्नी से वादा किया था कि वह आपस आकर तोहफ़ा देंगे.

अस्लिंहता देवी रोते हुए कहती हैं, "तुम्हें तो जनवरी में आना था अब इतनी जल्दी क्यों आ रहे हो?"

शहीद कुवँर पाल सिंह के परिवार में अब उनकी पत्नी और बच्चों के अलावा बूढ़े माता पिता कन्हैया सिंह राघव और मूर्ती देवी, दो भाई महेंद्र और अजय हैं.

महेंद्र जहाँ गाँव में परिवार को संभालते हैं वहीँ अजय भी सेना की मेडिकल कोर में हैं. अस्लिंहता देवी कहती हैं, "मैं अब अपने बेटे को सेना में नहीं भेजूँगी."

कुवँर पाल सिंह के चचेरे भाई राम किशन राघव बताते हैं, "हमारे दादा जी चार भाई थे. कुनबे में हम 17-18 भाई हैं. हमारी पाँच-छह बहनें हैं. उनकी शादी भी सेना के जवानों से हुई. आर्मी में हमारे गाँव से बहुत से अफ़सर और जवान हैं. देश की रक्षा करना हमारे नौजवानों का काम है. अगर हम ऐसे हिम्मत तोड़ बैठेंगे तो देश की रक्षा कैसे करेंगे ?"

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