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बांग्लादेश में आज भी जिंदा है 1971 की त्रासदी

 शनिवार, 21 दिसंबर, 2013 को 05:19 IST तक के समाचार

बांग्लादेश के आम जीवन का एक पुराना टकराव फिर उठ खड़ा हुआ है. यह टकराव चार दशक पहले आज़ादी की लड़ाई के दौरान हुए अत्याचारों में शामिल अभियुक्तों के मुकदमों की सुनवाई से पैदा हुआ है.

कुछ लोग चाहते हैं कि न्याय होना चाहिए, लेकिन कुछ का कहना है कि इसके राजनीतिक कारण हैं.

"उन्हें तीन अन्य लोगों के साथ अगले दरवाज़े पर मार दिया गया. तुम्हारे नाना काफी अच्छे, ईमानदार इंसान थे, वो काफी प्रसिद्ध थे और अमीर-गरीब दोनों उनकी इज़्ज़त करते थे."

जब मैं अपनी मां के साथ पश्चिमी क्लिक करें बांग्लदेश के कुशतिया स्थित उनके बचपन के घर गई तो इन शब्दों ने हमें भावुक कर दिया. उन्होंने इस घर को पिछले 40 सालों से नहीं देखा था और मैं वहां कभी नहीं रही.

ये एक काफ़ी बड़ा घर है. मेरी मां के लिए इस घर के साथ कई सुखद यादें जुड़ी हुई हैं. साथ ही एक बर्बर घटना भी जुड़ी है जो उनके युवा जीवन पर काली परछाईं की तरह छा गई.

मेरे नाना रफ़ीक अहमद एक जानेमाने कारोबारी थे और अपने समुदाय में उनके ऊंचे कद के कारण ही पाकिस्तानी सेना ने अप्रैल 1971 में उन्हें गोली मार दी.

दुखद यादें

फरहाना हैदर का कुशतिया स्थित पारिवारिक मकान.

उनकी मृत्यु के वक्त मेरी मां लंदन में पढ़ाई कर रहीं थीं और यह एक ऐसी घटना थी, जिसके बारे में बात करने से वो बचना चाहती थीं.

उन्होंने बताया, "हमने सुना कि शायद उनका नाम पाकिस्तानी सेना को दी गई सूची में शामिल है. हमें उनका शव कभी नहीं मिला. यह बहुत ही दुखदायी था कि हम उन्हें श्रद्धांजलि भी नहीं दे सके."

मेरे नाना की केवल एक तस्वीर बची है. बाकी सब कुछ नष्ट कर दिया गया.

वर्ष 1971 में क्लिक करें पश्चिमी पाकिस्तान से पूर्वी पाकिस्तान अलग हुआ और बांग्लादेश नाम का एक नया राष्ट्र बना. इसकी पृष्ठभूमि में व्यापक जनसंहार, बलात्कार और यातना थे, जिसने पूर्वी पाकिस्तान के लगभग सभी परिवारों को प्रभावित किया. बांग्लादेशियों का कहना है कि इस दौरान करीब 30 लाख लोगों की मौत हुई.

पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान के बीच तनाव का नतीजा आखिरकार युद्ध के रूप में सामने आया. ये दोनों क्षेत्र आश्चर्यजनक रूप से 1,500 किलोमीटर की दूरी पर थे. हालांकि इन दोनों देशों में मुस्लिम आबादी की बहुलता थी, लेकिन इसके अलावा उनमें मुश्किल से ही कोई समानता थी.

पाकिस्तानी दमन

जब 1971 में एक करिश्माई बंगाली नेता शेख़ मुजीबुर रहमान ने पूर्वी पाकिस्तान की आज़ादी के लिए प्रतिदिन प्रदर्शन शुरू किया तो पश्चिम बंगाल से हजारों सैनिक वहां पहुंच गए.

25 मार्च को उन्होंने सैन्य अभियान शुरू कर दिया. उन लोगों के ख़िलाफ तलाशी अभियान शुरू कर दिया गया जिन्हें सरकार "आतंकवादी" और "भारत का एजेंट" कहती थी और जो देश को बांटने का इरादा रखते थे.

उस समय ढाका विश्वविद्यालय के युवा प्रोफ़ेसर सिराजुल इस्लाम चौधरी पुराने दिनों को याद करते हुए बताते हैं, "यह हमारी कल्पना, समझ-बूझ और डर से परे था."

उन्होंने बताया, "वो नरसंहार, हां वास्तव में वो नरसंहार ही था, रात में शुरू हुआ. उस रात मेरे कई साथियों को मार दिया गया."

करीब एक करोड़ शरणार्थियों ने भारत में पनाह ली. जल्द ही अत्याचार की कहानियां आनी शुरू हो गईं, जिसमें करीब दो लाख महिलाओं के साथ बलात्कार की बात शामिल थी.

बांग्लादेश के दक्षिणी हिस्से खुलना में रह रही फ़िरदौसी प्रियवर्शिनी की उम्र 1971 में 20 साल थी. उनके बॉस ने उन्हें एक स्थानीय पाकिस्तानी सेना कमांडर के पास भेजा. उसने प्रियोवर्शिनी की साड़ी खींच ली और उसे खींच कर अपने कमरे में ले गया. इसके बाद क्रूरता के साथ बलात्कार किया गया.

नए देश का जन्म

दिसंबर 1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच शुरू हुए युद्ध के फलस्वरूप बांग्लादेश के रूप में एक नए देश का जन्म हुआ.

इसके बाद अन्य पाकिस्तानी सैनिकों ने करीब आठ माह तक उसके साथ बार-बार बलात्कार किया.

वह कहती है, "वर्षों तक रोते-रोते मेरे आंसू सूख गए."

उन्होंने कहा, "मेरी कहानी सैकड़ों बार कही गई. देश के दूसरे हिस्सों में रहने वाले लोगों ने हजारों बार उसकी चर्चा की. मेरी कहानी बांग्लादेश की दूसरी महिलाओं की कहानी है."

दिसंबर 1971 में क्लिक करें भारत और पाकिस्तान के बीच एक व्यापक युद्ध छिड़ गया.

पूर्व में यह लड़ाई जल्दी खत्म हो गई. करीब 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों को युद्धबंदी बनाया गया. लंबे समय तक राजनीतिक अस्थिरता के बाद एक नए राष्ट्र का उदय हुआ.

लंबी राजनीतिक अस्थिरता ने ये पता करना मुश्किल कर दिया था कि युद्ध अपराधों के लिए कौन दोषी है.

इसके बाद 2008 में मुजीब की बेटी शेख़ हसीना को चुनावों में शानदार कामयाबी मिली. अब अगले चुनाव पांच जनवरी को होने हैं.

निष्पक्षता पर सवाल

पाकिस्तानी सेना का साथ देने वाले बंगाली जनाक्रोश के केंद्र में हैं. जमात-ए-इस्लामी के ज्यादातर अभियुक्तों पर नरसंघार के लिए अर्धसैनिक समूहों के गठन का अभियोग लगाया गया है.

इस साल पूरे मामले की पहली सुनवाई हुई. इनमें से ज्यादातर को क्लिक करें युद्ध अपराधों का दोषी पाया गया और उन्हें मौत की सज़ा दी गई. जमात-ए-इस्लामी के एक नेता क्लिक करें अब्दुल कादर मुल्ला को फांसी दी जा चुकी है.

अभी तक बचाव पक्ष के जिन अभियुक्तों की सुनवाई हुई है, उनमें से ज्यादातर एक ही पार्टी के हैं और विपक्षी दलों ने सरकार पर आरोप लगाया है कि सरकार अपने राजनीतिक शत्रुओं को शिकार बनाने के लिए सुनवाई का इस्तेमाल कर रही है. ताकि क्लिक करें पांच जनवरी को होने वाले चुनावों में उसे बढ़त मिल सके.

आरोप ये भी हैं कि गवाहों ने अपने बयान बदले हैं और अदालत में फैसलों की घोषणा से पहले फ़ैसले की प्रति सरकार को ईमेल की गई.

एक प्रमुख अभियुक्त 91 वर्षीय गुलाम आज़म को नरसंहार की साज़िश रचने के लिए 90 साल कैद की सजा दी गई है.

उनके बेटे ब्रिगेडियर अमन आज़मी ने कहा कि यह निष्पक्ष मुकदमा नहीं था, बल्कि यह एक "राजनीतिक प्रतिशोध" है.

बांग्लादेश की बेचैनी

बांग्लादेश में लोग इस बात पर बंट गए हैं कि क्या सुनवाई निष्पक्ष, तटस्थ और पारदर्शी ढंग से हो रही है या नहीं

ढाका विश्वविद्यालय में कानून के प्राध्यापक आसिफ़ नज़रूल के मुताबिक बांग्लदेश में इन मुकदमों को लेकर काफी उत्सुकता है. करीब 80 प्रतिश से 90 प्रतिशत तक जनता मुकदमों के पक्ष में है.

हालांकि इस बात के पुख़्ता सबूत हैं कि अभियुक्त युद्ध अपराधों में शामिल थे, लेकिन यह भी महत्वपूर्ण है कि जनता को दिखना चाहिए कि न्याय निष्पक्ष ढंग से हो रहा है.

उन्होंने कहा, "समाज इस बात पर बंट गया है कि क्या सुनवाई निष्पक्ष, तटस्थ और पारदर्शी ढंग से हो रही है या नहीं. क्या ये मुकदमे एक श्रेष्ठ मकसद के लिए चल रहे हैं या फिर राजनीतिक उद्देश्यों के लिए."

अगर मुकदमें निष्पक्ष, तटस्थ और पारदर्शी ढंग से चलाए जाएं तो भी पीड़ितों को न्याय दिलानें में इनकी सीमित भूमिका ही है. 1971 में हुए ज्यादातर अपराध पाकिस्तानी सेना ने किए. जैसे मेरे नाना की हत्या. लेकिन इनमें से किसी पर भी मुकदमा नहीं चल रहा है.

फ़िरदौसी प्रियवर्शिनी के साथ हालांकि अपराध पाकिस्तानी सैनिकों ने किया, लेकिन वो उनके बांग्लादेश साथियों से अधिक नाराज़ हैं. वो कहती हैं कि वो सुनवाई के आगे बढ़ने से "काफ़ी ख़ुश" हैं, लेकिन इससे उनका चैन वापस नहीं मिल सकता है.

1971 की घटना के 40 साल बाद बांग्लादेश को भी अभी तक चैन नहीं मिल सका है.

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