साड़ी पहनना कितना मुश्किल है?

  • 14 दिसंबर 2013
साड़ी
साड़ी पहनना अक्सर मुश्किल समझा जाता है.

छह मीटर लंबे और बगैर सिले कपड़े को लोग बगैर उलझे हुए कैसे पहन लेते हैं? मेरा साड़ी से हमेशा पसंद और नापसंद का रिश्ता रहा है.

मैं जब भी किसी भारतीय महिला को रेशमी सुरक्षा कवच में लिपटी हुई देखती हूं मुझे साड़ी पहनने की इच्छा होती है.

गर्दन को उभार देती हुई साड़ी और एक सिरा कंधे पर, जब कोई महिला चलती है तो रेशमी सलवटें सरसराती हैं और उघड़ा हुआ पेट, भले ही कमर का साइज़ कुछ भी हो, वो सौम्य भी होता है और सांकेतिक भी.

लेकिन जब भी छह मीटर का यह कपड़ा सामने आता है मैं नाउम्मीद और उलझ कर रह जाती हूं.

वैसे जब भी किसी ने मुझे साड़ी पहनाई है तो मुझे न सिर्फ़ यह लगा है कि मैं धोखा कर रही हूं बल्कि वह स्टाइल मुझे बाधित करती हुई भी लगती है. आखिर कौन चाहता है कि उसे छोटे-छोटे नाज़ुक कदम लेने को मजबूर किया जाए?

भारतीय मूल की महिला होने के नाते मैं हमेशा साड़ी पहनना सीखना चाहती थी. और अब जब मैं भारत में रहती हूं तो कोई बहाना भी नहीं बना सकती. मेरी ख़ुशकिस्मती है कि दिल्ली में एक साड़ी स्कूल है.

साड़ी का स्कूल

मैं एक दिन शनिवार को सुबह-सुबह अपनी जींस और काली टीशर्ट पहने इस स्कूल में जा पहुंची जहां कुछ भारतीय और कुछ विदेशी महिलाएं साड़ी पहनना सीख रही थीं.

साड़ी
रीता कपूर चिश्ती अपने साड़ी स्कूल में साड़ी पहनना सिखाती हैं.

यहां साड़ी पहनना सिखाती हैं रीता कपूर चिश्ती. उनकी उम्र 60 साल के करीब है और उन्हें साड़ी का पूरा इतिहास पता है. वो बताती हैं कि उन्होंने पहली बार पांच साल की उम्र में साड़ी पहनी थी और वो साड़ी पहनने के 108 तरीके जानती हैं.

चिश्ती कहती हैं कि साड़ी ज़िंदगी भर पहने जाना वाला वस्त्र है. कस कर बांधी हो या ढीली ढाली, नाभि दिखाते हुए नीचे की ओर बांधी हो या गर्भवती महिला पहने एक ही साड़ी जवानी से बुढ़ापे तक पहनी जा सकती है. इसे एक पोशाक की तरह पहना जा सकता है, सैरोंग की तरह या फिर शॉर्ट की तरह भी.

वो हमें भारत के अलग-अलग इलाकों की साड़ियों के बारे में बताती हैं. राजस्थान की बंधनी, असम की मोगा सिल्क, गुजरात की पटोला और कश्मीर की ऊनी साड़ियां.

आखिर में हमें अभ्यास के लिए हमारी साड़ियां दी जाती हैं - मुझे सुनहरे बॉर्डर वाली सूती साड़ी दी गई. एक लंबी ब्रितानी महिला एक रेशमी साड़ी लेती है. और एक भारतीय फ़ैशन डिज़ाइन छात्रा लाल साड़ी लेती है.

'विदेशी है पेटीकोट'

हम साड़ी पहनने के पांच अलग-अलग तरीके सीखती हैं. सबसे आसान है साड़ी को तीन बार लपेटना, हर बार थोड़ा ऊंचा ताकि एक तरह की परतों वाली स्कर्ट बन जाए. साड़ी का छोर गर्दन के आसपास लपेट लिया जाता है.

रीता कपूर चिश्ती बताती हैं कि साड़ी के नीचे पहने जाना वाला पेटीकोट - जिसके पहनने के बाद मुझे छोटे कदम उठाने पड़ते हैं - असल में विदेशी चीज़ है, ये 19वीं सदी के आखिर में भारत पहनना शुरू किया गया.

लेकिन हमें कहा जाता है कि हम चाहें तो पेटीकोट की जगह हमारे ट्राउज़र पर साड़ी पहन सकती हैं या साड़ी को कमर पर बांध सकती हैं. पहले महिलाएं साड़ियों पर इस्त्री भी नहीं करती थीं, वे बस उन्हें गट्ठरों में बांध देती थीं.

साड़ी
भारत के करीब-करीब हर हिस्से में महिलाएं साड़ी पहनती हैं.

अब मैं अपनी हरी साड़ी में छोटे-छोटे कदम नहीं भरती बल्कि लगता है कि सब कुछ नियंत्रण में है.

आखिर हम सबसे ज़्यादा पारंपरिक तरीके से साड़ी पहनना सीखती हैं, जिसमें साड़ी को दो बार कमर पर लपेटा जाता है, ताकि एड़ी छिप जाए, किसी फूल की तरह आगे की ओर तहें दी जाती हैं और एक सिरा कंधे पर डाला जाता है.

'सौम्य और शालीन'

40 साल में पहली बार मैंने अपने दम पर साड़ी पहनी और ये काफ़ी अच्छी लग रही थी!

मैं अपने साथ की महिलाओं से पूछती हूं कि क्या वे वाकई साड़ी पहनेंगी?

एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था के लिए काम करने वाली ब्रितानी महिला कहती है ट्राउज़र और शर्ट जल्दी पहने जा सकते हैं लेकिन उसे नहीं लगता कि शाम के वक़्त भारत में कॉर्पोरेट सेक्टर की महिलाएं इससे बेहतर कोई और पोशाक पहन सकती हैं. क्योंकि कोई और पोशाक न तो साड़ी की तरह सौम्य होगी और न शालीन.

आखिर नौ गज की साड़ी पहनने के बाद मैं अपना एक फ़ोटो इंटरनेट पर डालती हूं. बेहद शानदार तरीक से साड़ी पहनने वाली मेरी एक भारतीय दोस्त कहती है, "बस, हो ही गया समझो."

एक पल के लिए मैं सोचती हूं, "ट्राउज़र पहनना ही ठीक है."

फिर मुझे याद आता है कि चाहे कुछ हो कम से कम मुझे पता है कि मेरी साड़ी मुझे फिट रहेगी और ये बहुत आज़ादी भरा ख़्याल है.

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