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एक शख़्स जिसने नस्लभेद को मिटा दिया

 शुक्रवार, 13 दिसंबर, 2013 को 15:09 IST तक के समाचार
शार्पविले नरसंहार

शार्पविले में हुए नरसंहार की दुनिया भर में आलोचना हुई थी.

वर्ष 1964 में जेल जाने के बाद नेल्सन मंडेला विश्व भर में नस्लभेद के ख़िलाफ़ संघर्ष के एक प्रतीक बन गए. लेकिन नस्लभेद के ख़िलाफ़ उनका विरोध इससे कई साल पहले शुरू हो चुका था.

बीसवीं सदी के ज़्यादातर हिस्से में दक्षिण अफ़्रीका में नेशनल पार्टी और डच रिफ़ॉर्म चर्च का बोलबाला था. उनका सिद्धांत ‘अफ़्रीकनर’ ढंग से बाइबल को पढ़ने और बोएर लोगों की सत्ता में भूमिका निभाने पर आधारित था.

नस्लभेद यानि ‘एपरथाइड’ की जड़ें दक्षिण अफ़्रीका में यूरोपीय शासन के शुरूआती दिनों से ही मौजूद थीं. लेकिन 1948 में नेशनल पार्टी की पहली सरकार के सत्ता में आने के बाद नस्लभेद को क़ानूनी दर्जा दे दिया गया. इस चुनाव में सिर्फ़ श्वेत लोगों ने ही मत डाले थे.

नस्लभेद के तीन स्तंभ

क़ानूनी तौर पर नस्लभेद के तीन स्तंभ थे:

  • रेस क्लासिफ़िकेशन एक्ट – हर उस नागरिक का वर्गीकरण जिस पर ग़ैर-यूरोपीय होने का संदेह.
  • मिक्स्ड मैरिज एक्ट – अलग-अलग नस्ल के लोगों के बीच विवाह पर प्रतिबंध
  • ग्रुप एरियाज़ एक्ट – कुछ तय नस्ल के लोगों को सीमित इलाक़ों में रहने के लिए बाध्य करना

अश्वेत लोगों के अधिकारों के लिए अफ़्रीकन नेशनल कांग्रेस यानि एएनसी की स्थापना 1912 में हो गई थी. नेल्सन मंडेला इस संस्था से 1942 में जुड़े.

नौजवान, समझदार और बेहद प्रेरित युवाओं के समूह के साथ मिलकर मंडेला, वॉल्टर सिसुलु और ऑलिवर टेंबो ने धीरे-धीरे एएनसी को एक राजनीतिक जन आंदोलन में परिवर्तित करना शुरू किया.

नेशनल पार्टी की सरकार के क़दमों पर एएनसी का जवाब समझौता न करने वाला था. वर्ष 1949 में तय हुए ‘कार्रवाई के कार्यक्रम’ के अनुसार श्वेत लोगों के आधिपत्य को समाप्त करने के लिए बहिष्कार, हड़ताल, नागरिक अवज्ञा और असहयोग का आह्वान किया गया.

इसी समय एएनसी के पुराने चेहरों को हटाकर नए नेतृत्व ने कमान संभाली. वॉल्टर सिसुलु नए महासचिव बने और मंडेला पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारी समिति में शामिल हुए.

‘फ़्रीडम चार्टर’

"दक्षिण अफ़्रीका उन सभी का है जो यहां रहते हैं - अश्वेत और श्वेत - और कोई भी सरकार राज करने के अधिकार का तब तक दावा नहीं कर सकती तब तक ये सभी लोगों की इच्छा पर आधारित न हो."

नेल्सन मंडेला

पिछली सदी के पांचवें दशक की शुरूआत में नेल्सन मंडेला ने एएनसी के एक अभियान में हिस्सा लेते हुए सारे देश का दौरा किया, जिसमें कई जन नगारिक अवज्ञा अभियान चलाए गए.


इस यात्रा के लिए सरकार ने ‘साम्यवाद विरोधी क़ानून’ का इस्तेमाल करते हुए मंडेला को एक स्थगित कारावास की सज़ा सुनाई और उसके बाद उनकी सार्वजनिक सभाओं पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया. इस दौरान उन्हें छह माह के लिए जोहानेसबर्ग से बाहर निकलने की इजाज़त नहीं दी गई.

इसके बाद मंडेला ने एएनसी के लिए एक नई योजना तैयार की जिसे ‘एम-प्लान’ का नाम दिया गया. इस योजना ने एएनसी को भूमिगत समूहों में बांट दिया.

वर्ष 1955 में मंडेला ने एएनसी का ‘फ़्रीडम चार्टर’ लिखा, “दक्षिण अफ़्रीका उन सभी का है जो यहां रहते हैं - अश्वेत और श्वेत - और कोई भी सरकार राज करने के अधिकार का तब तक दावा नहीं कर सकती तब तक ये सभी लोगों की इच्छा पर आधारित न हो. ”

अगले वर्ष 156 राजनीतिक कार्यकर्ताओं समेत मंडेला पर ‘फ़्रीडम चार्टर’ की हिमायत करने के लिए राजद्रोह का अभियोग लगाकर गिरफ़्तार कर लिया गया.

एक लंबे मुक़दमें के बाद सभी अभियुक्तों को 1961 में छोड़ दिया गया.

लेकिन सत्तारूढ़ नेशनल पार्टी ने 1958 में ‘पास लॉ’ नामक क़ानून लागू कर दिया जिनमें मिश्रित नस्ल और अश्वेत लोगों की कुछ जगहों पर जाने से मनाही थी.

भूमिगत मंडेला

मंडेला

नेल्सन मंडेला नस्लभेद के विरोध पर हमेशा अडिग रहे.

दो वर्ष बाद ‘पास लॉ’ के ख़िलाफ़ प्रदर्शन पर चली गोलियों में 69 लोग मारे गए. ये घटना ‘शार्पविले हत्याकांड’ के नाम से जानी जाती है. इस घटना के नौ दिन बाद सरकार ने एएनसी पर प्रतिबंध लगाते हुए देश में आपातकाल की घोषणा कर दी.

नेल्सन मंडेला समेत हज़ारों राजनीतिक कार्यकर्ताओं को बिना मुक़दमें के जेल भेज दिया गया.

जेल से निकलने के बाद नेल्सन मंडेला ने पीटरमारिज़बर्ग में 14 सौ लोगों की भीड़ को बताया कि जब तक सरकार लोकतांत्रिक भविष्य के लिए वार्ताओं पर राज़ी नहीं होती, देश में आम हड़ताल रहेगी.

सरकारी कट्टरता और हड़ताल को कम समर्थन मिलने के बाद मंडेला भूमिगत हो गए.

अब मंडेला एक ‘वांटेड’ व्यक्ति बन गए थे, विशेषकर तब जब एएनसी ने हिंसा की वकालत करनी शुरू कर दी थी. मंडेला एएनसी के नवनिर्मित सैन्य अंग ‘उम्खोंटो वे सिज़्वे’ के कमांडर बनाए गए.

मंडेला के मातहत एएनसी ने सरकारी डाकघर, बिजली के खंबे और पुलिस स्टेशनों को उड़ाया.

विश्व भर में अभियान

मंडेला का पोस्टर

मंडेला की रिहाई के लिए दुनिया भर में अभियान चलाया गया था.

सरकार से बचते फिर रहे मंडेला कभी ड्राइवर के तो कभी माली के भेष रहते. वो समर्थन जुटाने के लिए देश के बाहर भी गए लेकिन उन्हें 1962 में गिरफ़्तार कर पांच वर्ष के लिए जेल भेज दिया गया.

दो वर्ष बाद मंडेला को तोड़फो़ड़ आयोजित करने के अभियोग में उम्र क़ैद की सज़ा सुनाई गई. उन्हें रोबेन जेल भेज दिया गया.

मंडेला की कहानी वहीं समाप्त हो जाती. एएनसी और मंडेला को सरकार ने नियंत्रण में कर लिया था, पश्चिमी देशों की सरकारों ने नस्लभेदी प्रशासन का समर्थन जारी रखा था.

इन हालात में दूर-दूर तक परिवर्तन के आसार नज़र नहीं आ रहे थे.

लेकिन 1970 के दशक में आक्रामक ‘अश्वेत चेतना आंदोलन’ के उदय और इस आंदोलन के संस्थापकों में से छात्र कार्यकर्ता स्टीव बिको की हिरासत में मौत ने मंडेला और एएनसी में लोगों की रूचि को दोबारा जगाया.

दक्षिण अफ़्रीका में अश्वेत क़स्बों विरोध से भड़क उठे. दुनिया भर में नस्लभेद विरोधी आंदोलन के लिए समर्थन बढ़ रहा था और साथ ही मंडेला की रिहाई के लिए भी दवाब बनाया जा रहा था.

जेल से मंडेला ने साफ़ कर दिया कि वो एक बहु-नस्ली दक्षिण अफ़्रीका में यक़ीन रखते हैं और साथ ही उन्होंने व्यक्तिगत औऱ राजनीतिक अनुशासन के महत्व पर भी ज़ोर दिया.

धीरे-धीरे दक्षिण अफ़्रीका अलग-थलग पड़ता गया. व्यापारियों और बैंकों उस देश व्यवसाय करने से इंकार कर दिया और परिवर्तन के लिए शोर बढ़ने लगा.

फ़रबरी 1990 में नेल्सन मंडेला को दक्षिण अफ़्रीका सरकार ने जेल से रिहा कर दिया.

इससे पहले ही सरकार ने नस्लभेद क़ानूनों के कुछ पहलुओं में ढील देनी शुरू कर दी थी और रिहाई के बाद वो एक खुली वार्ता के लिए तैयार हो गई.

जब 1994 में मंडेला देश के राष्ट्रपति बने नस्लभेद समाप्त हो चुका था. अब क़ानून की नज़र में दक्षिण अफ़्रीका के सभी लोग बराबर हैं - वो अपनी मर्ज़ी से वोट दे सकते हैं और जैसे चाहें वैसे जी सकते हैं.

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