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नए पाक आर्मी चीफ़: नई तकनीकों के माहिर

 बुधवार, 27 नवंबर, 2013 को 17:51 IST तक के समाचार

पाकिस्तानी थलसेना के नए प्रमुख लेफ्टिनेंट राहील शरीफ़ कई सालों से सेना को अंदरूनी चुनौतियों के लिए तैयार करने के लिए जाने जाते हैं.

नए सैन्य प्रमुख ने पाकिस्तानी सेना को नई-नई तकनीकों की ट्रेनिंग दी है और इसे देश की सीमाओं के अंदर मझौले दर्जे की लड़ाइयों और चरमपंथ के खिलाफ जंग के लिए तैयार करने में अहम भूमिका निभाई है.

लेफ्टिनेंट जनरल राहील ने पाकिस्तानी फौज के लगभग सभी महत्वपूर्ण कोर्सों को नया रूप दिया है और इन्हें मौजूदा समय की ज़रूरतों के मुताबिक़ बनाया.

पाकिस्तान के अंदर और बाहर, सेना को ''लो इंटेंसिटी कॉनफ्लिक्ट'' के लिए तैयार करने पर उनके लेखों को ख़ासी सराहना मिली है.

इससे पहले लेफ्टिनेंट जनरल राहील शरीफ़ पाकिस्तानी फौज में बहुत पसंद की जाने वाली पोस्टिंग कमांडेट, पाकिस्तान मिलिट्री अकेडमी पर रहे हैं. इस दौरान उन्होंने अकेडमी के पाठ्यक्रम में भी कई अहम बदलाव किए.

इन बदलावों का मकसद भी नए फौजी अफसरों को देश के अंदर लड़ाई औऱ चरमपंथ के खिलाफ जंग के लिए तैयार करना था.

'औलाद से भी ज़्यादा भरोसा'

राहील शरीफ़ का करियर

  • अक्तूबर 1976 में फ्रंटियर फोर्स रेजिमेंट की छठी बटालियन में कमीशन हासिल किया
  • गिलगित में इंफेंट्री ब्रिगेड और बाद में बतौर पाकिस्तानी मिलिट्री एकेडमी के एजुटेंट की जिम्मेदारी संभाली
  • जर्मनी से कंपनी कमांडर कोर्स किया
  • रॉयल कॉलेज ऑफ डिफेंस स्टडीज, ब्रिटेन से ग्रेजुएशन
  • नियंत्रण रेखा और सियालकोट सीमा पर भी रहे
  • 30 कोर और 12 कोर के चीफ ऑफ स्टाफ भी रहे
  • इंफेंट्री डिविजन के जनरल ऑफिसर कमांडिंग
  • पाकिस्तानी सैन्य एकेडमी के कमांडेंट
  • कोर कमांडर गुजरावालां

कोर कमांडर, गुजरावालां के तौर पर भी जनरल राहील ने अपनी इसी दिलचस्पी को अमली जामा पहनाया और कोर में ऐसे प्रशिक्षण अभ्यास शुरू कराए जिनके जरिए ''लो इंटेंसिटी कॉनफ्लिक्ट'' से बेहतर तरीके से निपटा जा सके.

कई सैन्य अफसरों का कहना है कि भविष्य की चुनौतियों को समझने और उनसे निपटने के लिए मौजूदा हालात में लेफ्टिनेंट जनरल राहील की नियुक्ति ख़ासी अहम है.

लेफ्टिनेंट जनरल राहील की नियुक्ति में कुछ भूमिका रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल अब्दुल कादिर बलोच के साथ उनके लंबे संबंधों की भी हो सकती है.

जनरल बलोच नवाज़ शरीफ़ के मत्रिमंडल में क़बायली और सरहदी मामलों के मंत्री हैं और कई सूत्रों का कहना है कि कई सैन्य मामलों पर नवाज़ शरीफ बलूचिस्तान के इस पूर्व कोर कमांडर की बात ग़ौर से सुनते हैं.

जनरल राहील और जनरल बलोच के संबंध इतने क़रीबी हैं कि अब्दुल कादिर बलोच ने एक बार नवाज़ शरीफ़ से कहा था कि वो जितना भरोसा जनरल राहील पर करते हैं, शायद अपनी औलाद पर भी न करें.

पारिवारिक पृष्ठभूमि

लेफ्टिनेंट जनरल राहील लेफ्टिनेंट जनरल अब्दुल कादिर बलोच के स्टाफ अफसर रह चुके हैं.

कुछ अन्य फौजी अफसर समझते हैं कि उनकी नियुक्ति में कुछ भूमिका उनके पारिवारिक, व्यक्तिगत और क्षेत्रीय पृष्ठभूमि की भी है.

कयानी

कयानी गुरुवार को रिटायर हो रहे हैं

लेफ्टिनेंट जनरल राहील शरीफ़ प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की तरह लाहौर से ही संबंध रखते हैं. उनके पिता मेजर शरीफ़ और प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के पिता मियां मोहम्मद शरीफ़ के बीच संबंधों का हवाला भी दिया जाता है.

जनरल राहील के बड़े भाई मेजर शब्बीर शरीफ निशान-ए-हैदर पाने वाले पहले पाकिस्तानी सैन्य अफसर थे.

अपनी पारिवारिक और क्षेत्रीय परंपराओं के मुताबिक लेफ्टिनेंट जनरल राहील एक खुले दिल के अफसर माने जाते हैं, जो अपनी बात किसी के भी सामने खुलकर बयान कर देते हैं.

ये वो खूबियां हैं जो जनरल राहील और जनरल ज़ियाउद्दीन बट में एक जैसी मानी जाती हैं. जनरल ज़ियाउद्दीन बट को नवाज़ शरीफ़ ने जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ की जगह सैन्य प्रमुख बनाने की कोशिश की थी.

सीनियर अफसर नजरअंदाज़

कई सैन्य अफसरों के अनुसार लेफ्टिनेंट जनरल राहील शरीफ़ की सैन्य प्रमुख के तौर पर नियुक्ति साबित करती है कि नवाज़ शरीफ़ ने इस अहम पद के लिए उपयुक्त व्यक्ति का चुनाव करते समय पेशेवर योग्यताओं से ज़्यादा पारिवारिक औऱ व्यक्तिगत पृष्ठभूमि को अहमियत दी है.

पाकिस्तान सेना

पाकिस्तान सेना के सामने अंदरूनी सुरक्षा भी एक बड़ी चुनौती है

लेफ्टिनेंट जनरल राहील शरीफ़ के व्यक्तित्व से वाकिफ़ अफसर उन्हें किसी भी तरह अयोग्य सैन्य अफ़सर मानने को तैयार नहीं हैं. लेकिन उनमें से कुछ समझते हैं कि वरिष्ठता और योग्यता के लिहाज़ से जनरल राहील से बेहतर अफ़सरों को नजरंदाज किया गया है.

सैन्य परंपराओं और नियमों को देखें तो प्रधानमंत्री किसी भी लेफ्टिनेंट जनरल को थलसेना के प्रमुख के तौर पर नियुक्त कर सकते हैं. इसके लिए उन्हें सबसे सीनियर या रिटायर होने वाले सैन्य प्रमुख के मशविरे पर अमल करना जरूरी नहीं है.

इसीलिए पाकिस्तानी सेना के सबसे वरिष्ठ लेफ्टिनेंट जनरल हारून असलम को नजरअंदाज़ करना संभव हुआ.

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