पूरे पाकिस्तानी समाज में जमात, लश्कर की पैठ?

  • 26 नवंबर 2013
पाकिस्तान आतंकवादी चरमपंथी

मुंबई हमलों से पहले भी चरमपंथी संगठन लश्कर-ए-तैयबा का ज़िक्र भारत में होने वाली कई चरमपंथी गतिविधियों के सिलसिले में लिया जाता था, लेकिन 26/11 के बाद पूरी दुनिया का ध्यान इसकी तरफ़ गया.

दिसंबर 2008 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने लश्कर-ए-तैयबा को 'आतंकवादी संगठन' घोषित कर इस पर प्रतिबंधों का ऐलान किया.

आरिफ़ जमाल लश्कर-ए-तैयबा पर किताब लिख चुके हैं और इसे लेकर उन्होंने काफी शोध भी किया है.

बीबीसी के साथ बातचीत में आरिफ़ जमाल ने इस चरमपंथी संगठन के बढ़ते ख़तरे और पाकिस्तानी समाज और शासन तंत्र में उसकी गहरी पैठ का ज़िक्र किया. पेश है इसी बातचीत के अंश:

लश्कर-ए-तैयबा को एक संगठन के तौर पर आप किस तरह देखते हैं?

लश्कर-ए-तैयबा कोई स्वतंत्र संगठन नहीं है. यह जमात-उद-दावा की सैन्य शाखा है. इसका मक़सद भारत में या भारत प्रशासित कश्मीर में जिहाद करना है. इसकी अपनी कई शाखाएं हैं जो अन्य मुल्कों में काम करती हैं.

दूसरी बात यह है कि पिछले चार साल में जमात-उद-दावा और लश्कर-ए-तैयबा पाकिस्तान में बहुत ताक़तवर हो गए हैं. मुंबई हमले के बाद एक साल तक तो थोड़ी पाबंदी रही, लेकिन उसके बाद उसे खुली छूट मिल गई.

हम देखते हैं कि 2007 तक तो जमात-उद-दावा पाकिस्तान में धार्मिक और राजनीतिक ताकत बन चुकी थी, लेकिन बीते तीन साल में जमात-उद-दावा अन्य धार्मिक संगठनों का नेतृत्व कर रही है. अगर आप यूट्यूब पर देखें, तो जमात-उद-दावा खौफ़नाक तरीक़े से राजनीतिक ताकत बन चुकी है.

यह कैसे मुमकिन हुआ?

देखिए, पाकिस्तान ने शुरू से एक नीति अपनाई थी कि अपनी सुरक्षा को वह जिहाद से मज़बूत बनाएगा. इसे पाकिस्तान ने अब तक जारी रखा हुआ है. न सिर्फ भारत बल्कि उसने अफ़ग़ानिस्तान के सिलसिले में भी यही नीति अपनाई थी.

इसकी वजह से पाकिस्तान में जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में यह नीति समा गई है. अगर आप पाकिस्तानी टीवी टॉक शो देखें, तो हाफ़िज़ सईद एक बड़ा चेहरा है. पाकिस्तानी मीडिया और टीवी एंकर उन्हें एक धार्मिक विद्वान, शांतिपूर्ण नागरिक और एक धार्मिक नेता के बतौर पेश करते हैं न कि एक जिहादी के तौर पर.

वो इस बात से भी इनकार करते हैं कि उन्होंने कभी किसी जिहाद में हिस्सा लिया. यह न सिर्फ़ मीडिया की अज्ञानता है बल्कि एक सोची-समझी कोशिश भी है. जमात-उद-दावा को लेकर समाज में बहुत ज़्यादा सहानुभूति है.

क्या लोकतांत्रिक सरकारें इस चलन पर रोक लगा सकती हैं?

पाकिस्तान के पहले चुने हुए प्रधानमंत्री लियाक़त अली ख़ान ने भारत में जिहाद शुरू किया था, न कि किसी फ़ौजी अधिकारी ने.

दूसरी बात, ज़ुल्फिकार अली भुट्टो ने 1975 में अफ़ग़ानिस्तान में जिहाद शुरू किया था और गुलबुदीन हेक्मत्यार, मुल्ला रब्बानी, मुल्ला जमीलुर्रहमान और अमहद शाह मसूद को पाकिस्तान लाए और उन्हें ट्रेनिंग दी गई.

पाकिस्तान आतंकवादी चरमपंथी हाफ़िज़ सईद

कुल मिलाकर लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकारों के बीच भी इस तरह की मुहिमों को लेकर सहानुभूति है. दूसरे, पाकिस्तानी सेना का वहां के समाज पर इतना असर है कि अगर कोई सिविलियन कुछ भी करना चाहे, तो वह बहुत बेबस है.

पिछले तीन साल में तो यह देखा गया है कि पाकिस्तान की अदालतों, ख़ासतौर पर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट, उन्हें देखकर ऐसा लगता है कि जैसे जमात-उद-दावा के लोग उनमें बैठे हुए हैं.

कुछ ख़ास इलाक़ों में सेना भी भर्ती करती है और वहीं से जमात-उद-दावा या लश्कर के सदस्य भी आते हैं. ये कैसे संबंध हैं? क्या इन्हें ख़त्म नहीं किया जा सकता?

हमने एक अध्ययन किया था जिसका मैं सह-लेखक हूं. उसमें हमने दिखाया कि जिन लोगों ने लश्कर-ए-तैयबा के लिए लड़ते हुए जान दी है, उनका संबंध केंद्रीय पंजाब या पंजाब के अन्य इलाक़ों से है.

मगर ये आंकड़े उन जीवनियों पर आधारित थे, जो लश्कर-ए-तैयबा ने प्रकाशित की थी. इनके ताल्लुक 1990 के दशक और इस सदी के शुरुआती वर्षों के थे.

लेकिन अब जमात उद दावा और लश्कर-ए-तैयबा इतने फैल गए हैं कि बलूचिस्तान, सिंध और खैबर पख़्तूनख़्वाह में उन्होंने बहुत गहरी जड़ें पकड़ ली हैं. अब जमात उद दावा 'एक राष्ट्रीय पार्टी' बन गई है.

मुंबई हमले

लेकिन मेरा ख्याल है कि सेना और जिहादियों का कोई ऐसा जातीय संबंध नहीं है. मगर बुनियादी तौर पर उनका लक्ष्य एक ही है. भारत को लेकर दोनों एक लक्ष्य को लेकर काम कर रहे हैं. हालांकि जिहादी विचारधारा के तौर पर पूरी दुनिया को काबू करना चाहते हैं.

मैं समझता हूं कि कोई भी लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार सेना और जिहादियों के बीच रिश्ते खत्म करने की कोशिश नहीं करेगी क्योंकि आपने देखा कि राष्ट्रपति ज़रदारी को इसकी कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी.

क्या आने वाले समय में लश्कर-ए-तैयबा से अमरीका को भी ख़तरा हो सकता है?

जी, बिल्कुल ख़तरा हो सकता है. हालांकि आने वाले पांच और दस साल में नहीं होगा.

लेकिन अगर ऐसा ही रहा तो वह दिन दूर नहीं. हो सकता है कि हमारे जीवनकाल में ऐसा देखने को मिले कि लश्कर-ए-तैयबा अमरीका में होने वाली किसी चरमपंथी घटना में शामिल हो.

एक बात तो स्पष्ट है कि लश्कर-ए-तैयबा की स्थापना से जुड़े जो दस्तावेज हैं, वो बताते हैं कि वह दुनिया में हर जगह जिहाद करना चाहते हैं, अमरीका में भी.

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