शीशे के घरों में रहने वाले पत्थर ना फेंके: राजपक्षे

  • 17 नवंबर 2013
महिंदा राजपक्षे

श्रीलंका की राजधानी कोलम्बो में जारी राष्ट्रमंडल सम्मेलन के दूसरे दिन राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे ने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन को आड़े हाथों लिया है.

लाशें बरसों पहले से मिलती रही हैं: महिंदा राजपक्षे

श्रीलंका में कथित युद्ध अपराधों की कैमरन की मांग के जबाव में राजपक्षे ने कहा, ''ये उनकी इच्छा है. ये एक लोकतांत्रिक देश है. हम सब बराबर हैं और वो क्या चाहते हैं, कह सकते हैं. ये उन पर निर्भर करता है. आप शिक़ायत कैसे कर सकते हैं. मेरा मतलब ये कि शीशे के घरों में रहने वाले लोगों को पत्थर नहीं फेंकने चाहिए.''

इससे पहले, श्रीलंका के आर्थिक विकास मंत्री और महिंदा राजपक्षे के भाई बासिल राजपक्षे ने कहा था कि इस तरह की किसी जांच को मंज़ूर नहीं किया जाएगा.

उन्होंने कहा, ''उन्होंने पहले भी तारीख़ दी थी. ये सही नहीं है, ख़ुद कैमरन ने कहा है कि श्रीलंका को और समय चाहिए. कैमरन ने ये भी कहा है कि उत्तरी आयरलैंड में अभी तक मुद्दे हैं.''

अंतरराष्ट्रीय जांच

ब्रितानी प्रधानमंत्री डेविड कैमरन कह चुके हैं कि श्रीलंका ने यदि अगले वर्ष मार्च तक अपनी ओर से स्वतंत्र जांच दल नहीं बनाया तो ब्रिटेन संयुक्त राष्ट्र से अंतरराष्ट्रीय जांच दल बनाने का आग्रह करेगा.

डेविड कैमरन

कैमरन ने कहा, ''मैं अपनी बात साफ़ कह देना चाहता हूं. मार्च तक जांच पूरी नहीं हुई तो मैं संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में इस मुद्दे को उठाउंगा और पूर्ण, निष्पक्ष तथा विश्वसनीय अंतरराष्ट्रीय जांच की मांग करूंगा. ये न्याय का मामला है. हम ऐसा कर पाए तो यहां और बेहतर भविष्य होगा.''

इस पर राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे ने कहा है कि डेविड कैमरन जो चाहें, कह सकते हैं.

कैमरन के जाफ़ना दौर का हवाला देते हुए राजपक्षे ने कहा कि उन्होंने अपने विदेशी मेहमानों को वहां जाने दिया क्योंकि श्रीलंका एक आज़ाद मुल्क़ है. उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि श्रीलंका के पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है.

राजपक्षे ने कहा, ''हमें वक्त लगेगा और हम तीस साल चले इस युद्ध की पड़ताल करेंगे. किसी के ख़िलाफ़ कोई आरोप है तो हम इसकी जांच के लिए तैयार हैं. हमारे पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है. वरना मैंने उन लोगों को इस देश में आज़ादी से घूमने और तमाम विपक्षी समूहों से मिलने की मंज़ूरी नहीं दी होती जो हमारी बहुत आलोचना कर रहे हैं.''

साल 2009 में तमिल टाइगर विद्रोहियों के ख़िलाफ़ फ़ौज की निर्णायक कार्रवाई के साथ ही श्रीलंका में लगभग 25 वर्षों से जारी गृह युद्ध समाप्त हो चुका है. लेकिन श्रीलंका की सरकार पर गृह युद्ध के दौरान मानवाधिकारों के उल्लंघन के गंभीर आरोप लगते रहे हैं.

श्रीलंका की सरकार इन आरोपों को ख़ारिज़ करती रही है, लेकिन ये विवाद कभी थमता नज़र नहीं आया और दिनोंदिन बढ़ता प्रतीत हो रहा है.

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