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विवादों के साथ शुरू हो रहे चोगम से उम्मीदें

 शुक्रवार, 15 नवंबर, 2013 को 00:59 IST तक के समाचार
महिंदा राजपक्षे

राष्ट्रमंडल देशों के राष्ट्राध्यक्षों का तीन दिवसीय सम्मेलन 'चोगम' श्रीलंका की राजधानी कोलम्बो में शुक्रवार से आरंभ हो रहा है. चौबीस वर्षों में ये पहला अवसर है जब कोई एशियाई देश 'चोगम' की मेज़बानी कर रहा है.

साल 2009 में तमिल टाइगर विद्रोहियों के ख़िलाफ़ फ़ौज की निर्णायक कार्रवाई के साथ ही श्रीलंका में लगभग 25 वर्षों से जारी गृह युद्ध समाप्त हो चुका है. लेकिन श्रीलंका की सरकार पर गृह युद्ध के दौरान मानवाधिकारों के उल्लंघन के गंभीर आरोप लगते रहे हैं.

श्रीलंका की सरकार इन आरोपों को ख़ारिज़ करती रही है, लेकिन ये विवाद कभी थमता नज़र नहीं आया और कोलम्बो सम्मेलन पर भी इसकी छाया मंडरा रही है.

'सवाल पूछने के लिए नहीं बुलाया'

पड़ोसी देश भारत के तमिल राजनीतिक दलों की आपत्तियों के मद्देनज़र प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सम्मेलन में शामिल नहीं हो रहे हैं. उनकी जगह विदेशमंत्री सलमान ख़ुर्शीद भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं.

डेविड कैमरन

डेविड कैमरन श्रीलंका रवाना होने से पहले अपने इरादे जता चुके हैं

वरिष्ठ पत्रकार ज्योति मल्होत्रा इस सम्मेलन के संभावित नतीजे से बहुत ज्यादा उत्साहित नहीं हैं.

उन्होंने बीबीसी से कहा, ''चोगम उन देशों का समूह है जो एक ज़माने में ब्रिटेन के उपनिवेश थे. इस तरह के सम्मेलन का कोई आज की दुनिया में कोई बहुत ज़्यादा महत्व नहीं है क्योंकि ब्रिटेन अब उतना शक्तिशाली नहीं रहा, जितना पहले था. भारत जैसे इतने बड़े मुल्क के प्रधानमंत्री इस सम्मेलन में नहीं जा रहे हैं. इस सम्मेलन का जो भी नतीजा निकलेगा, वो बड़ा सीमित होगा.''

इसी तर्ज पर कनाडा के प्रधानमंत्री स्टीफ़न हार्पर ने भी सम्मेलन का बहिष्कार किया है. मॉरीशस के प्रधानमंत्री नवीन रामग़ुलाम ने भी सम्मेलन में जाने से इंक़ार कर दिया है.

कोलम्बो रवाना होने से पहले ब्रितानी प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने कहा था कि वे श्रीलंका में कथित युद्ध अपराधों की जांच की मांग करेंगे.

इस पर श्रीलंका सरकार की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया में कहा गया है कि श्रीलंका एक सम्प्रभु राष्ट्र है और कोई उससे कुछ भी मांग नहीं कर सकता.

श्रीलंका के सूचना मंत्री ने यहां तक कह दिया कि सम्मेलन में कैमरन को सवाल पूछने के लिए नहीं बुलाया गया है.

स्वागत का अंदाज़

महिंदा राजपक्षे

कोलम्बो में इस तरह के कट-आउट देखे जा सकते हैं

सम्मेलन में आ रहे मेहमानों के स्वागत के लिए कोलम्बो में बड़े-बड़े कट-आउट में नज़र आ रहे राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे अपने आलोचकों को आड़े हाथों ले रहे हैं.

तमिल विद्रोहियों के ख़िलाफ़ गृह युद्ध के दौरान मानवाधिकारों के कथित उल्लंघन के आरोपों पर राजपक्षे का कहना है कि विद्रोही यहां लगातार तीन दशक तक बम बरसाते रहे.

मानवाधिकार हनन के आरोपों पर राजपक्षे का कहना है कि इस मामले में श्रीलंका के पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है.

उन्होंने आलोचकों को जवाब देते हुए कहा है कि श्रीलंका में मौतें सिर्फ़ साल 2009 में नहीं हुईं, जब सरकार ने तमिल विद्रोहियों को कुचला था, बल्कि उससे 30 साल पहले से होती चली आ रही थीं.

उनका कहना है कि हर दिन 10-15 लाशें मिलती थीं जिनमें बच्चे और गर्भवती महिलाएं भी शामिल थीं, लेकिन तब किसी ने इसे मुद्दा नहीं बनाया.

भारत से जुड़े मुद्दे

भारतीय विदेश सचिव सुजाता सिंह ने कहा है कि राष्ट्रमंडल सम्मेलन के दौरान भारत, श्रीलंका से जुड़े तमाम मुद्दों को उठाएगा.

श्रीलंका, भारत के तमिलनाडु राज्य के मछुआरों को ये कहकर पकड़ता रहा है कि वे उसकी जलसीमा में दाख़िल हो जाते हैं.

इस मुद्दे पर तमिलनाडु की राजनीति भी गर्माती रही है. लेकिन समस्या का अभी तक कोई पुख़्ता समाधान नहीं हो पाया है.

"चोगम उन देशों का समूह है जो एक ज़माने में ब्रिटेन के उपनिवेश थे. इस तरह के सम्मेलन का कोई आज की दुनिया में कोई बहुत ज़्यादा महत्व नहीं है क्योंकि ब्रिटेन अब उतना शक्तिशाली नहीं रहा, जितना पहले था. भारत जैसे इतने बड़े मुल्क के प्रधानमंत्री इस सम्मेलन में नहीं जा रहे हैं. इस सम्मेलन का जो भी नतीजा निकलेगा, वो बड़ा सीमित होगा."

ज्योति मल्होत्रा, वरिष्ठ पत्रकार

सुजाता सिंह ने कहा है कि मछुआरों के मुद्दों पर दोनों देशों के मछुआरों के संघों की बैठक के सिलसिले में तमिलनाडु सरकार की प्रतिक्रिया का इंतज़ार किया जा रहा है.

उन्होंने कहा कि मछुआरों की ओर से समाधान आने पर दोनों देशों की सरकारें इस दिशा में आगे कदम बढ़ाएंगी.

ज्यादा स्पष्ट शब्दों का इस्तेमाल किए बिना सुजाता सिंह ने कहा है कि सम्मेलन के दौरान भारतीय विदेश मंत्री सलमान ख़ुर्शीद को श्रीलंका के नेतृत्व से संवाद के कई अवसर मिलेंगे और तब जटिल मुद्दों पर विचार-विमर्श किया जाएगा.

वरिष्ठ पत्रकार ज्योति मल्होत्रा का कहना है कि भारत में आगामी चुनावों को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस सम्मेलन में नहीं जाने का फ़ैसला किया.

वे कहती हैं कि श्रीलंका ने गृह युद्ध प्रभावित रहे अपने उत्तरी इलाकों के लोगों को समान अधिकार आज तक नहीं दिए हैं.

उनका मानना है कि तमिलनाडु के अलावा भारत के अन्य राज्यों के लोग भी श्रीलंका के तमिलों के साथ सहानुभूति रखते हैं, यही वजह है कि प्रधानमंत्री ने इस मामले में बहुत सतर्कता बरतने की कोशिश की है.

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