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लाओसः सेंसरशिप को चुनौती देता 'टुक टुक सिनेमा'

 शनिवार, 9 नवंबर, 2013 को 01:31 IST तक के समाचार
लाओस

फ्रेंच फोटोग्राफर और सेट डिजाइनर यीश बर्नाड छुट्टियां मनाने एक ऐसी जगह पहुंच जाते हैं जहां के लोगों ने फिल्में नहीं देखी.

लाओस, एक ऐसी जगह है जहां लोगों ने क्लिक करें सिनेमा नहीं देखा. साल 1975 के बाद लाओस में फिल्मों पर लगभग पाबंदी है.

साल 1975 में जब लाओस में साम्यवादी सरकार सत्ता में आई तो उसने मीडिया को पूरी तरह से अपने नियंत्रण में ले लिया.

फिल्मों को लोगों का मनोरंजन नहीं बल्कि खास मत का प्रचार करने वाले क्लिक करें माध्यम के रूप में देखा जाने लगा.

सख्त सेंसरशिप

परिणाम ये हुआ कि फिल्मों के बनाने और दिखाए जाने पर अघोषित पाबंदी लग गई. कुछ मुट्ठीभर फिल्में यदि बनी भी तो वे साम्यवादी मत का प्रचार प्रसार ही करती नजर आईं. युवा वर्ग इनके प्रति उदासीन होता चला गया.

लाओस

लाओस सरकार ने सख्त सेंसरशिप लागू कर रखा है. फिल्म के विषयों पर सरकार की कड़ी नजर है.

इसके अलावा लाओस में बाजार का आकार भी एक समस्या है. देश में केवल दो सिनेमाघर हैं. टिकट खरीदने के पैसे होने के बावजूद साढ़े छह मिलियन लोगों में से बहुत कम लोग सिनेमाघरों तक पहुंच पाते हैं.

ऑटो-रिक्शा पर साजो सामान

मगर यीश बनार्ड की घर-घर जाकर फिल्मों को दिखाए जाने की पहल से लाओस का ये क्लिक करें इतिहास अब बदलने वाला है.

फ्रांसीसी फोटोग्राफर और सेट डिजाइनर यीश ने अपना 25 साल का करियर पीछे छोड़ लाओस जाना तय किया. फिल्मों को घर घर तक पहुंचाने के संकल्प और जिद में उन्होंने 'टुक टुक सिनेमा' बना डाला.

'टुक टुक सिनेमा' नाम उस ऑटोरिक्शा के नाम पर रखा गया जिस पर यीश सिनेमा दिखाने का साजो सामान घर घर तक ले जाया करते थे.

लाओस

ऐसे लोग जिन्होंने पहले कभी सिनेमा नहीं देखा उनके लिए टुक टुक किसी परी की कथा, किसी सपने के सच होने से कम नहीं है.

यीश बताते हैं, "मैंने देखा कि 1975 के बाद से लाओस में लोगों ने फिल्में देखी ही नहीं. अगर फिल्म है भी तो केवल ब्लैक एण्ड व्हाइट. साठ लाख से ज्यादा की आबादी वाले मुल्क के लिए मैंने कुछ करने की ठानी."

दाहिना हाथ

1947 में जन्में सम्पन्न, प्राथमिक स्कूल के शिक्षक यीश के इस मूवमेंट में उनका दाहिना हाथ बने.

"फिल्म देखते हुए लोगों के मनोभावों को बयां करना बहुत मुश्किल है. मुझे याद है गुलाबी फ्रॉक पहने हुए वह छोटी बच्ची. वो दर्शकों के बीचों बीच खड़ी थी. मुंह बाए हुए. फिल्म देखते हुए दो घंटे तक वह बिलकुल नहीं हिली-डुली.""

यीश बनार्डः फ्रांसीसी फोटोग्राफर

सम्पन्न बताते हैं, "साल 1975 के पहले तो बहुत सारी फिल्में बनती और दिखाई जाती थीं. मगर उसके बाद हमने एक भी फिल्म नहीं देखी."

यीश ने जब लोगों को 'चांग' फिल्म दिखाई तो उन्हें बहुत पसंद आई. यह फिल्म 'किंग कांग' के निर्देशक मैरियान कूपर की ड्रामा फिल्म है. कूपर की प्रोडक्शन टीम साल 1924 में इस फिल्म को शूट करने लाओस आई थी. उन्होंने लाओस में चार साल रहकर ये फिल्म बनाई.

इस फिल्म को देखकर लोगों को सालों पहले का जीवन देखने का मौका मिलता है.

मगर आज भी लोगों का जीवन कई मायनों में बिलकुल भी नहीं बदला. चावल के खेतों के किनारे लकड़ी के घर बने हैं और लोग आज भी हाथों से खेती करते हैं.

संगीतकारों की टीम

यीश बताते हैं, " हम भीतरी इलाकों में जाने के लिए हाथियों का इस्तेमाल करते हैं. दो-तीन हाथियों की पीठ पर टुक टुक सिनेमा चलता है."

लोगों को ज्यादातर मूक फिल्में दिखाई जाती हैं. यीश फिल्म दिखाने के साजो सामान के साथ पारंपरिक लाओ संगीत बजाने वालों की टीम भी जगह जगह ले जाते हैं.

लाओस

यीश ने बताया, "मेरे साथ 12 संगीतकारों की टीम रहती है. वे सभी लाओस का पारंपरिक संगीत बजाते हैं."

यीश के संगीतकारों की ये टोली संगीत से सुकून देने के साथ ही लोगों को खूब हंसाती भी हैं.

ये टोली लोगों को हंसाने के लिए कई बार संगीत के बोल में कुछ बदलाव भी करती हैं, उन लोगों के नाम लेकर जो सुन रहे होते हैं. जैसे गांव का मुखिया.

कठपुतली और स्टोरी टेलिंग आर्ट

फिल्म स्क्रीनिंग के साथ-साथ यीश लोगों का मनोरंजन करने के लिए 'शैडो पपेट्री' यानि कठपुतली के आभासी करतब और स्टोरी टेलिंग की परंपरागत कला को फिर से जिंदा करने की कोशिश कर रहे हैं.

लाओस

1975 के बाद सिनेमा की ही तरह कठपुतली और स्टोरी टेलिंग का प्राचीन स्वरूप भी खत्म हो गया था.

यीश अपनी कलाकारी दिखाने के लिए सबसे खूबसूरत जगहों को चुनते हैं. ज्यादातर वो जगह मंदिर का आंगन या नदी का किनारा होता है.

यीश बताते हैं कि फिल्म देखने के लिए कई बार तो पूरा गांव यानि 1000 या 2000 लोग जुट जाते हैं.

वे कहते हैं, "फिल्म देखते हुए लोगों के मनोभावों को बयां करना बहुत मुश्किल है. ये नजारा इतना सजीव होता है, जीवन से भरा-भरा. लोग खूब हंस रहे होते हैं. कभी रोते भी हैं."

उन्होंने आगे बताया, "ऐसे ही एक दर्शक के बारे में मुझे याद है. गुलाबी फ्रॉक पहने हुए एक छोटी बच्ची 12 घंटों तक दर्शकों के बीचोंबीच खड़ी थी. मुंह बाए हुए. दो घंटे तक वह हिली-डुली नहीं."

(बीबीसी आउटलुक सीरिज पर आधारित)

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