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चरमपंथी कैसे करते हैं आपस में बातचीत?

 रविवार, 3 नवंबर, 2013 को 17:11 IST तक के समाचार

कुछ सालों के दौरान तकनीक ने संचार के माध्यमों को सबके लिए खोल दिया है.

पिछले दो दशकों में चरमपंथियों, संगठित अपराधियों और बेशक साधारण कानून का पालन करने वाले नागरिकों के लिए संचार के माध्यमों में वृद्धि हुई है.

इसके साथ ही डिजिटल तकनीक में भी मौजूदा दौर में मुख्यतः संदेशों की दो श्रेणियां है, पहला गुप्त तरीका और दूसरा सार्वजनिक.

लेकिन इन दोनों तरह के सन्देशों में मैसेज के असली प्रेषक का पता लगाया जा सकता है.

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लेकिन चालाक चरमपंथी अपने पीछे कोई डिजिटल सबूत नहीं छोड़ते जिससे उनके पकड़े जाने की कोई संभावना हो.

यही कारण था कि अमरीका के ख़ुफ़िया तंत्र को ओसामा का पता लगाने में इतना लम्बा वक़्त लग गया, सन्देश पहुचने के 'ह्यूमन कूरियर' जैसे माध्यम का उपयोग करता था.

चरमपंथ निरोधी दस्ते 'एमआई-5' के महानिदेशक एंड्रू पार्कर का मानना है कि आतंकियों के लिए कोई ऐसा मरू उद्यान या सुरक्षित स्थान नहीं होना चाहिए जहाँ कानून तोड़ने वाले या चरमपंथी योजना बनने वाले अपने सन्देश छुपा सकें या किसी अवरोध के भय के बिना बातचीत कर सकें.

उपयुक्त माध्यम

लेकिन उनके आलोचकों का तर्क है कि सरकार का लोगों के व्यक्तिगत संचार में अतिक्रमण या जासूसी ने तो सारी हदें ही लाँघ दी हैं.

अकेले व्यक्ति कम से कम सबूत छोड़ते हैं. उदाहरण के लिए नॉर्वे के सामूहिक हत्याकाण्ड के आरोपी ऐन्डर्स ब्रेविक ने हमलों की योजना बनाने को दौरान बिना किसी सामाजिक संपर्क के चार साल बिताए.

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जब बात सूचना को व्यापक रूप से प्रसारित करने की हो तो इंटरनेट सबसे उपयुक्त माध्यम के रूप में उभर कर आया.

2001 में 9/11 के हमले के वक़्त की बात है. जब हमले के साजिशकर्ता अलकायदा के लोग पाकिस्तान के किसी गुप्त स्थान से बैठकर क़तर के चैनल अलजज़ीरा पर लगातार वीडियो पोस्ट कर रहे थे.

लेकिन चैनल द्वारा विडियो के कुछ एडिटेड वर्जन ही चलाये जाने के बाद अलकायदा ने विडियो को इंटरनेट पर अपलोड करना शुरु कर दिया.

तब से अल कायदा, तालिबान और सोमालिया के अल-शबाब सहित कई संगठनों ने ऑनलाइन संदेशों के जरिये अपना खुद का प्रोडक्शन हाउस बना लिया है. कई संगठनों के प्रोडक्शन हाउस तो बहुत अच्छे स्तर के हैं.

कुछ जाने-पहचाने विकल्प

  • डिस्पोजेबल सिम कार्ड- सिम कार्ड्स किसी भी दुकान पर कम दामों में और वैध रूप से उपलब्ध होते हैं. इन्हें फोन में लगाकर, एक बार इस्तेमाल कर फेंका जा सकता है. कई कंपनियों के अधिकारी रूस औऱ चीन में अपने नियमित फोन के हैक होने के डर से इन सिम कार्ड्स को प्रयोग करते हैं.
  • ईमेल और मोबाइल संदेश- सावधान चरमपंथी अपने निशानों की चर्चा करते वक्त कोडों का इस्तेमाल करते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि उनकी बातचीत में बाधा पहुँचाई जा सकती है. उदाहरण के लिए 9/11 के हमलावरों मोहम्मद अट्टा और रामजी बिनालशिभ ने बातचीत के दौरान में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर को 'आर्किटेक्चर' और पेंटागन को 'आर्ट' और व्हाइट हाउस को 'पॉलिटिक्स' कोड किया था.
  • सोशल मीडिया, चैटिंग और गेमिंग- इंटरनेट का प्रयोग करने वाले लोगों में अब सोशल मीडिया के जरिये संदेश भेजने का प्रचलन दिन-ब-दिन बढ़ रहा है. कई ऑनलाइन साइटों को प्रयोग करने के लिए पासवर्ड की जरूरत होती है. कुछ साइटों पर सरकारी खुफिया एजेंट ऑनलाइन चरमपंथी बनाने के लिए घुसपैठ कर सकती है.
  • पैन ड्राइव- इस छोटी सी डिवाइस में बहुत सारा डाटा एक साथ ले जाया जा सकता है. किसी भी तरह के वायरस औऱ मेलवेयर के लिए भी ये बेहद अतिसंवेदनशील है.
  • जेपीज और जिफ्स- इसे स्टीगेनोग्राफी के तौर पर भी जाना जाता है. यह एक ऐसी कला है जिसमें एक संदेश के अंदर दूसरा संदेश छिपा रहता है. डिजिटल तस्वीरों को भी सीधे टाइटल के साथ जेपीईजी औऱ जीआईएफ में एनकोड किया जा सकता है.
  • सैटेलाइट फोन- तकनीक के गोपनीय होने के बावजूद यह विशेषतः दूरदराज आबादी वाले क्षेत्रों में चरमपंथी नेताओं के लिए यह बहुत लाभकारी होते हैं, क्योंकि वहाँ इन्हें पकड़ना या बातचीत में अवरोध पहुँचाना आसान नहीं होता.
  • ह्यूमन कूरियर- इस तरीके का प्रयोग ओसामा बिन लादेन के लिए भी किया गया. सालों से इसका प्रयोग होता आ रहा है. ह्यूमन कूरियर एक एसा तरीका है जो डिजिटल तकनीक की तरह कोई सबूत तो नहीं छोड़ता. लेकिन इसमें ठिकाने तक पहँचने की संभावना रहती है. ओसामा को भी 2011 में इसी तरीके से यूएस नेवी ने मार गिराया था.

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