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लोगों को चोरी की चीज़ें ख़रीदने से कैसे रोकें?

 रविवार, 10 नवंबर, 2013 को 18:30 IST तक के समाचार
चोरी की चीज़ें

क्या आप ख़ुद या फिर दूसरों को चुराई गई चीज़ें न ख़रीदने के लिए समझा सकते हैं. कौन सा सबसे अच्छा तरीका है जिससे लोगों को चुराई गई चीज़ें ख़रीदने से रोका जा सकता है.

कभी ऐसा मौक़ा भी आ सकता है जब आप किसी पब में खड़े हों और कोई व्यक्ति आप से कहे कि 'क्या आप एक नया लैपटॉप देखना चाहेंगे? केवल सौ डॉलर में.'

बेशक, आपके ज़ेहन में यह बात आएगी, हो न हो, यह लैपटॉप ज़रूर चोरी का होगा. ऐसी स्थिति में किसी भी व्यक्ति की प्रतिक्रिया क्या होगी?

निश्चय ही कोई भी व्यक्ति इस प्रस्ताव देने वाले व्यक्ति को गिरफ़्तार करवाने की कोशिश करेगा. मगर वास्तविकता यह है कि काला बाज़ार शायद पहिए के आविष्कार से पहले से मौजूद रहा है.

जबकि बहुत से लोगों के लिए मोलभाव करना या कम कीमत देकर चीजें ख़रीदना चोरी अधिनियम 1968 की धारा 22 की बारीकियों से कहीं बढ़कर है. विशेषकर ऐसी स्थिति में जब उन्हें पता हो कि पकड़े जाने का जोख़िम नहीं के बराबर है.

'बाज़ार न होना मुश्किल'

दूसरी ओर, चुराई गई वस्तुओं का कोई बाज़ार न होने से इसके साथ कोई अपराध या परेशानी नहीं जुड़ी हुई है.

ब्रिटेन में विज्ञापन अभियान के बाद शराब पीकर गाड़ी चलाने की घटनाओं में कमी आई थी.

जैसा कि पैट्रिक कोलक्यूहोन ने साल 1796 में "ए ट्रीटाइज ऑन द पुलिस ऑफ द मेट्रोपोलिस" में लिखा है. "एक चोर को उसकी चुराई गई चीज़ों के लिए एक सुरक्षित और तैयार बाज़ार मुहैया करा दिया जाए, तो वह अपने आप ही बर्बाद हो जाएगा."

मैं यहां इन बातों का उल्लेख इसलिए कर रहा हूं कि एक बार न्याय चयन समिति को भेजे गए एक प्रस्तुतिकरण में यह सलाह दी गई थी कि जब कालाबाज़ार की बात होती है तो समस्या केवल सामान कौड़ियों के दामों में देने की नहीं है, बल्कि इसके संभावित हल की है.

1979 में शराब में धुत लोगों के गाड़ी चलाने की वजह से एक दिन में 28 लोग मारे गए या गंभीर रूप से घायल गए.

इसके 30 वर्ष बाद यह संख्या घटकर चार रह गई. किस बदलाव की वजह से ऐसा हुआ? यातायात विभाग ने पिछले वर्ष एक क्लिक करें संक्षिप्त शोध पत्र पेश करते हुए यही सवाल पूछा था.

इसके बाद विशेषज्ञों ने निष्कर्ष निकाला कि कठोर सज़ा की वजह या कड़े रवैए की वजह से शराब पीने वालों की संख्या में कमी नहीं आई है, बल्कि उन्हें सार्वजनिक करने की कोशिश ही इसका नतीजा है.

एक विज्ञापन का असर

इस मामले में बदलाव के लिए ज़िम्मेदार था एक विज्ञापन अभियान, जिसे 1987 से साल 1992 के बीच चलाया गया था.

यह अभियान शराब पीकर ड्राइविंग करने की सामाजिक स्वीकार्यता में व्यापक बदलाव के लिए शुरू किया गया था. इसका सीधा सा मतलब था, शराब पीकर गाड़ी चलाने के प्रति नफ़रत और ग़ुस्सा पैदा करना.

वर्ष 1987 में यातायात मंत्रालय की ओर से जारी विज्ञापन

ये विज्ञापन कुछ इस तरह थे :

  • आग बुझाने वाला एक कर्मचारी एक मां और एक बच्ची की दुर्घटना वाले दृश्य को देखकर रो पड़ता है.
  • एक सहपाठी की मौत स्कूल के बच्चों के लिए एक हिला देने वाली घटना होती है.

इस विज्ञापन के संदेशों से मानकों में बदलाव में मदद मिली. लोगों के नज़रिए में ख़ासा बदलाव देखा गया. शराब पीकर गाड़ी चलाना केवल अपराध नहीं था, बल्कि सामाजिक रूप से ही अस्वीकार्य हो गया.

'अस्वीकार्यता अहम'

समाज को शराब पीकर गाड़ी चलाना मंज़ूर न होना इन घटनाओं में आई कमी की बड़ी वजह थी न कि इससे जुड़ा अपराध.

अब हम न्याय चयन समिति को भेजे गए प्रस्तुतिकरण पर आते हैं. 'इट्स माइन टेक्नोलॉजी' नाम की कंपनी ने ये प्रस्तुतिकरण दिया था.

इसमें अपराध रोकने के लिए सबूत आधारित नज़रिया अपनाने पर ज़ोर दिया गया था- प्रभावशाली तकनीक के साथ व्यावहारिक विज्ञान.

जब बात चोरी गए सामान की कालाबाज़ारी की आती है, तो क्या ऐसे कारोबार को शराब पीकर गाड़ी चलाने जितना नफ़रतभरा बनाना संभव है? न्याय चयन समिति को भेजा गया प्रस्तुतिकरण कहता है कि हमें कोशिश करनी चाहिए.

इसमें कहा गया है "व्यवहार में बदलाव का दूसरों पर भी असर पड़ सकता है."

यानी अगर एक चोरी गए लैपटॉप या तस्करी वाली सिगरेट को सामाजिक रूप से अस्वीकार कर दिया जाए तो काला बाज़ार चरमरा जाएगा.

प्रस्तुतिकरण देने वाले कहते हैं कि पहला क़दम यह होना चाहिए कि चोरी गए सामान जिसके पास मिलें उस पर चोरी क़ानून के तहत मुकदमा चले.

एक ऐसे विज्ञापन अभियान की कल्पना की जा सकती है जो पब में पेश की जा रही लूट की चीज़ों से जुड़ी परेशानी की ओर इशारा करे.

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