एक देश जिसकी दौलत बनी उसके लिए आफ़त

  • 11 अक्तूबर 2013
कांगो के विद्रोहियों के बीच डैन स्नो

डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कांगो शायद दुनिया के सबसे अमीर देशों में से एक है लेकिन औपनिवेशवाद, ग़ुलामी और भ्रष्टाचार ने इसे दुनिया के सबसे ग़रीब देशों की क़तार में ला खड़ा किया है.

ये देश दूसरे विश्व युद्ध के बाद के सबसे हिंसक संघर्ष को झेल रहा है. इस युद्ध में पचास लाख से ज़्यादा लोग मारे जा चुके हैं, लाखों लोग भुखमरी और बीमारियों के शिकार हैं. यही नहीं, यहाँ लाखों महिलाओं और लड़कियों का बलात्कार भी हुआ है.

'द ग्रेट वॉर ऑफ़ अफ़्रीक़ा' कही जाने वाली इस लड़ाई में नौ देशों के सैनिक और आम लोगों के अलावा अनगिनत विद्रोही गुट एक दूसरे को निशाना बनाते रहे हैं और ये सब एक ऐसे बदक़िस्मत देश की सीमाओं के अंदर ही हो रहा है जिसका नाम है डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कांगो.

इस देश में हर के तरह के खनिज मौजूद हैं, फिर भी ये संयुक्त राष्ट्र के मानव विकास सूचकांक में ग़रीब देशों में शामिल है.

अराजकता

मैंने कांगो की यात्रा की और इस देश के उस अतीत की पड़ताल की जिसकी वजह से आज ये देश पूरी तरह हिंसा और अराजकता के आग़ोश में हैं.

मैंने बलात्कार पीड़ितों, विद्रोहियों, फले फूले राजनेताओं और दहशत में जीने वाले आम लोगों से बात की.

कांगो के मौजूदा हालात पिछले पांच सदियों में लिए गए फ़ैसलों और उनके मुताबिक़ उठाए गए क़दमों का नतीजा हैं.

जब 1480 के आस-पास पुर्तगाली व्यापारी कांगो पहुंचे तो उन्हें लगा कि उन्हें एक ऐसी ज़मीन मिल गई है जो प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर है- ख़ास कर इंसानी संसाधनों से.

कांगो को मज़बूत, लंबे-तगड़े और बीमारियों से अछूते रहने वाले ग़ुलामों के बड़े ख़ज़ाने के तौर पर देखा गया. पुर्तगालियों को अहसास हुआ कि माहौल अगर अराजक होगा तो उनके लिए ग़ुलामों की आपूर्ति करना बेहद आसान होगा.

कांगो में प्राकृतिक संसाधन
डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में प्राकृतिक संसाधन भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं

उन्होंने स्थानीय स्तर पर मौजूद ऐसी सभी राजनीतिक ताक़तों को ध्वस्त कर दिया जो उनके व्यापार और ग़ुलामों के कारोबार में बाधा बन सकती थीं.

विद्रोहियों को पैसा ही नहीं, बल्कि आधुनिक हथियार भी दिए गए. कांगो की सेनाओं को हराया गया और राजाओं की हत्याएं की गईं, धनाढ्य लोगों को मारा गया और अलगाववाद को बढ़ावा दिया गया.

1870 के दशक में बेल्जियम के लोग कांगो पहुंचे. ये वही समय था जब पश्चिम में साइकिल और मोटरगाड़ियां आम ज़िंदगी का हिस्सा बन रही थी, जिनके लिए रबर के टायरों की भारी मांग थी.

और कांगो में बड़ी मात्रा में रबर पाई गई. इसका फ़ायदा उठाने के लिए बेल्जियम की फ़ौज ने वहां की महिलाओं को अपनी सेवा में लगाया और उन पर ज़्यादतियां की जबकि उनके पतियों से जंगल में रबर की खेती कराई जाती थी.

आज़ादी के बाद तानाशाही

दूसरे विश्व युद्ध में हिरोशिमा और नागासाकी में गिराए गए परमाणु बमों में इस्तेमाल यूरेनियम दक्षिण पूर्व कांगो की खदानों से निकाला गया था.

कांगो के संसाधनों के बल पर पश्चिम की आज़ादी की रक्षा की गई लेकिन कांगो के काले निवासियों को वोट देने और यूनियन और राजनीतिक संघ बनाने का भी अधिकार नहीं दिया गया.

कांगो को 1960 में बेल्जियम से आज़ादी मिली और आशंकाओं के मुताबिक़ उसका आगे का सफ़र ख़ासा दुर्भाग्यपूर्ण रहा. आकार में कांगो पश्चिमी यूरोप के बराबर है.

एक बड़े देश के छोटे-छोटे हिस्सों ने अलग होने की कोशिश की और वहाँ मौजूद बेल्जियम के अफ़सरों के ख़िलाफ़ बग़ावत होने लगी. जो लोग अब तक कांगो को चला रहे थे वो सभी कांगो छोड़ कर चले गए. ऐसे में वो सक्षम लोग नहीं रहे जो देश और उसकी अर्थव्यवस्था को संभाल पाएं.

कांगो में गुलामी
पश्चिमी देशों ने बड़ी मात्रा में कांगो के लोगों की गुलामों के रूप में आपूर्ति की.

इसी का नतीजा रहा कि जहां आज़ादी से पहले कांगो में पांच हज़ार सरकारी अफ़सर थे, वहीं आज़ादी के पास इनकी संख्या तीन हज़ार ही रह गई. नए नवेले आज़ाद देश में कांगो का कोई वकील, डॉक्टर, अर्थशास्त्री या इंजीनियर नहीं था.

ऐसे में देश में घोर अव्यवस्था फैल गई. कांगो के नेता पैट्रिक लुमुम्बा को पश्चिम समर्थित विद्रोहियों ने ख़ूब पीटा और फांसी पर चढ़ा दिया. इसके बाद सेना के एक प्रवक्ता जोसेफ़ डेसाइर मोबुतु ने देश की सत्ता संभाली जो बाद में एक तानाशाह साबित हुए.

जब तक पश्चिमी जगत को कांगो के खनिज मिलते रहे और कांगो सोवियत संघ के घेरे से दूर रहा, तब तक पश्चिम ने मोबुतु को बर्दाश्त किया. उनके दौर में विद्रोहियों का उत्पीड़न किया गया, मंत्री पूरा का पूरा बजट चुरा लेते थे. पश्चिमी जगत भी मोबुतो को अरबों डॉलर का क़र्ज़ देते रहे, जिसे आज का कांगो अब तक चुका रहा है.

क़ब्ज़े की होड़

1997 में रवांडा के नेतृत्व में कई पड़ोसी देशों ने कांगो पर हमला कर मोबुतु से छुटकारा पाने का फ़ैसला किया. ख़ास कर रवांडा इस बात को लेकर बहुत नाराज़ था कि मोबुतु ने रवांडा में 1994 के नरसंहार के लिए दोषी लोगों को अपने यहां पनाह दी थी. इस नरसंहार में सौ दिन के भीतर लगभग आठ लाख लोग मारे गए थे.

मोबुतु को हटा कर लौरें कबीला को कांगो का नेता बनाया गया. उन्हें रवांडा की कठपुतली माना गया लेकिन बाद में उन्होंने रवांडा के आदेशों को मानना बंद कर दिया.

इससे नाराज़ हो कर रवांडा ने फिर हमला किया, लेकिन इस बार उसका रास्ता उन्हीं देशों ने रोका जो पहले रवांडा के साथी थे और इस तरह कांगो फिर युद्ध में घिर गया. विदेशी सेनाओं की उपस्थिति के बीच कांगो में घमासान हो रहा था जिससे वहां पूरी तरह अराजकता फैल गई.

सैकड़ों हथियारबंद समूहों ने अत्याचार ढाए, लाखों लोग मारे गए.

कांगो में कोल्टान
मोबाइल फोन में पाए जाने वाले कोल्टान का खनन इस तरह अराजक माहौल में होता है

जातीयता और भाषाई आधारों पर हिंसा हुई. इसके अलावा कांगो के प्राकृतिक संसाधनों पर क़ब्ज़े की होड़ ने इस लड़ाई को और बर्बर बना दिया.

मोबाइल फ़ोन में इस्तेमाल होने वाला कोल्टान कांगो में काफ़ी मात्रा में मिलता है, जिसकी खुदाई के लिए बच्चों का इस्तेमाल किया गया और उन्हें लड़ाई में भी इस्तेमाल किया गया.

ये देश पूरी तरह से ठप्प हो चुका है. मुख्य शहरों को जोड़ने के लिए सड़कें नहीं हैं. स्वास्थ्य सेवाएं सिर्फ़ धर्मार्थ संस्थाओं के सहारे चल रही हैं.

पुर्तगालियों, बेल्जियनों, मोबुतो और मौजूदा सरकार, सभी ने कांगो में राज्य, सेना, न्यायपालिका और शैक्षिक तंत्र को मज़बूत ही नहीं होने दिया ताकि ज़मीन के नीचे दबे प्राकृतिक ख़ज़ाने के दोहन में उन्हें कोई अचड़न नहीं आए.

इन संसाधनों से अरबों डॉलर की कमाई की गई है लेकिन उसका फ़ायदा इस देश के लोगों नहीं मिला है. यहां के लोग सिर्फ़ तकलीफ़ें और मौत ही झेलने को मजबूर हैं. इसका फ़ायदा कांगो के कुछ अभिजात वर्ग और उनके विदेशी समर्थकों को ही मिल रहा है.

कांगो के संसाधनों की बुनियाद पर ही विकसित देशों में तकनीकी क्रांति हो रही है.

कांगो कुल मिलाकर एक ऐसे देश का नाम है जिसके संसाधन समृद्धि नहीं, बल्कि त्रासदी की वजह बन रहे हैं.

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