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ज़िंदगी बचाने के लिए मरने का नाटक

 रविवार, 6 अक्तूबर, 2013 को 11:01 IST तक के समाचार
फ़ेथ वैम्बुआ, कीनिया हमला, नैरोबी

कीनिया की राजधानी नैरोबी के वेस्टगेट मॉल में हमले के दौरान जारी हुई एक तस्वीर की कहानी अब उभरकर सामने आई है. इस तस्वीर में एक मां अपने बच्चों के साथ मॉल के फर्श पर लेटी हुई नज़र आ रही हैं. उनका नाम फ़ेथ वैम्बुआ है.

चरमपंथियों ने जब क्लिक करें वेस्टगेट मॉल की घेराबंदी की, तब वह अपनी नौ साल की बेटी साइ और 21 महीने के अपने बेटे टाइ के साथ वहां थीं.

मॉल में क़रीब साढ़े चार घंटे तक फ़ेथ ने बिताए. हमले के दौरान ज़मीन पर वे ऐसे पड़ी रहीं, मानो मृत हों. वे अपने छोटे बच्चों को भी ज़मीन पर लिटाकर शांत रखने में कामयाब रहीं. आख़िरकार क्लिक करें कीनिया के एक पुलिसकर्मी अयाद अदान ने उन्हें वहां से सुरक्षित निकाला.

बीबीसी संवाददाता ग्रैब्रियल गेटहाउस से उन्होंने अपने डरावने अनुभव साझा किए. फ़ेथ ने जो बताया हम उन्हीं के लफ़्ज़ों में आपके सामने रख रहे हैं.

'भगवान रक्षा करो'

हम मॉल में फूल बेचने वालों की तलाश में थे, तभी हमने ज़ोरदार धमाके की आवाज़ सुनी. मैंने सोचा कि शायद इमारत गिर रही हो और ऐसे में खुली जगह पर लेटना ही सही होगा.

मैंने अपने बच्चों को कहा, "लेट जाओ, लेट जाओ." मैंने सोचा कि यह लूटपाट की कोई सामान्य सी घटना हो और पांच-छह मिनट के भीतर यह ख़त्म हो जाएगा. वक़्त बीतता गया और हम यह सुनने के लिए इंतज़ार कर रहे थे, "अब उठ जाइए, वे लोग जा चुके हैं."

मगर ऐसा नहीं हुआ. लगा कि मैंने जितना सोचा था, उससे कहीं ज़्यादा ख़राब चीजें हो रही हैं. मेरी बेटी तेज़ आवाज़ में प्रार्थना कर रही थी, "भगवान, भगवान हमारी रक्षा करो."

फाइद वैम्बुआ

फ़ेथ वैम्बुआ का कहना है कि यह एक चमत्कार ही है कि उनका परिवार इस हादसे में बच गया.

मैं भी मन में प्रार्थना कर रही थी. मुझे लगा कि मेरी बेटी की आवाज़ तेज़ है. मैंने उसे अपनी आवाज़ धीमी करने को कहा.

मुझे यह नहीं पता था कि वहां क्या हो रहा था, लेकिन उस वक़्त मैं बस यही जानती थी कि मुझे अपने बच्चों को शांत रखना है.

कीनिया हमला

कई दिनों तक चले इस हमले में लगभग 70 लोग मारे गए थे

मैं उस वक़्त अपने बेटे के लिए ज़्यादा चिंतित थी क्योंकि वह केवल 21 महीने का है. हमने सुबह नौ बजे ही नाश्ता किया था और मुझे पता था कि उसे भूख ज़रूर लगी होगी.

मैं सोचने लगी, "मेरा बेटा उठेगा और रोना शुरू कर देगा. मैंने अपनी ऊंगली उसके मुंह में रख दी और उसके बाद वह चुप रहा."

'बारूद की महक'

हमारे चारों तरफ़ टूटे हुए शीशे और खंभों के छोटे-छोटे टुकड़े पड़े थे. जब हमलावर हमारी तरफ़ बढ़े, तो मैंने बारूद की गंध महसूस की. मैं ज़मीन पर गोलियां दागने की आवाज़ साफ़ तौर पर सुन सकती थी. उस वक्त मुझे लगा कि हम सब मारे जाएंगे.

ठीक उसी वक्त मैंने पुनर्जीवन से जुड़ा एक गीत गाना शुरू कर दिया क्योंकि मैंने यह सोच लिया था कि हम सब मारे जाएंगे.

मुझे याद है कि वे एक बार हमारी तरफ़ आए क्योंकि हमसे महज़ दो मीटर दूर एक महिला ज़मीन पर लेटी थी. मुझे उनके चलने की आवाज़ सुनाई दे रही थी.

उनके बीच बातचीत शुरू हुई और उस वक़्त वे "मामा, मामा" कह रहे थे. लेकिन मुझे यह नहीं पता था कि वे मेरे बारे में बोल रहे थे या किसी और के बारे में. मैंने यह सोच लिया था कि मैं अपना सिर नहीं उठाऊंगी.

मुझे यह भी सुनाई पड़ा कि वह महिला जवाब दे रही थी लेकिन पांच सेकंड बाद ही दो गोलियां चलीं और वह महिला शांत हो गई. हम यूं ही लेटे रहे. हम असहाय थे और कुछ कर नहीं सकते थे.

हम उस महिला की तरफ़ देख भी नहीं सकते थे. उस वक़्त आतंक फैला था क्योंकि मैं जानती थी कि अगली शिकार मैं ही रहूंगी.

यह वास्तव में एक चमत्कार था. मैं बता भी नहीं सकती कि उन्होंने हमें कैसे नहीं देखा जबकि हम उस महिला के बिल्कुल पास थे.

'पुलिस ने दी राहत'

कुछ देर बाद मैंने महसूस किया कि कोई मेरा हाथ छू रहा है. मैंने कहा, "हे भगवान, उन्होंने आख़िर हमें ढूंढ ही लिया."

"जब हमलावर हमारी तरफ़ बढ़े, तो मैंने बारूद की गंध महसूस की. मैं ज़मीन पर गोलियां दागने की आवाज़ साफ़ तौर पर सुन सकती थी. उस वक़्त मुझे लगा कि हम सब मारे जाएंगे."

फ़ाइद, कीनिया हमले में बची महिला

उस आदमी ने फिर कहा, "ममा, ममा, ममा, क्या आप ठीक हैं?" उस वक़्त मैं मरने का नाटक कर रही थी.

मैंने अपनी सांस थामे रखी और कोई जवाब नहीं दिया. मैंने महसूस किया कि कोई व्यक्ति आगे की ओर बढ़ रहा है. वह आदमी मेरे सामने आ गया.

उसके बाद फिर से आवाज़ आई, "ममा, ममा" तब मुझे लगा कि कोई मेरे बेटे को छू रहा है क्योंकि मैंने उस पर अपना हाथ रखा हुआ था.

उसके बाद वह आदमी मेरी बेटी को छू रहा था. मेरी बेटी ने अपना सिर उठाया और उस आदमी से पूछा, "आप कौन हैं?"

उस आदमी ने कहा, "मैं पुलिस के साथ था." उस वक़्त मैंने अपना सिर उठाया और उसकी तरफ देखा. शुरू में मुझे संदेह हुआ क्योंकि उस शख़्स ने आम लोगों की तरह ही जैकेट पहनी थी लेकिन उसके बाद उसने अपना यूनिफ़ॉर्म दिखाया.

उन्होंने कहा, "मैं पुलिस के साथ हूं और आप सुरक्षित हैं. हम यहां आपकी मदद के लिए आए हैं." उस पर मेरी बेटी ने तुरंत पूछा, "हम यह कैसे समझें कि आप बुरे लोगों के साथ नहीं हैं?"

उन्होंने हमें अपनी ओर देखने को कहा. जब हमने उनकी ओर देखा तो पाया कि वहां पुलिस अधिकारी थे. तब मैंने साफ़तौर पर देखा कि कई लोग यूनिफ़ॉर्म में थे.

उन्होंने हर तरफ बंदूक़ से निशाना साधा हुआ था. तब मुझे अहसास हुआ कि वहां पुलिस आ गई है. उसी वक़्त उन्होंने हमसे उठने को कहा और हमारी जान में जान आई.

वह पुलिस अधिकारी काफी अच्छे थे. उन्होंने मुझे मेरी चाभी उठाने के लिए भी याद दिलाया. उन्होंने मेरे बेटे को उठाया और मेरी बेटी आगे की ओर दौड़ पड़ी. मैं तब उस पुलिस अधिकारी के पीछे थी और सोच रही थी कि अगर इस बीच कुछ होता है, तो मैं पुलिस की तरफ़ रहूंगी. इस तरह हम बचने में कामयाब हुए.

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