कहां हुआ था 13वीं सदी का महाविस्फोट?

  • 3 अक्तूबर 2013
सामलास ज्वालामुखी में विस्फोट की जगह बहुत बड़ा झील बन गया.

वैज्ञानिकों के एक दल का दावा है कि उन्होंने उस ज्वालामुखी का पता लगा लिया है जिसके चलते 13वीं शताब्दी में बहुत बड़ा विस्फोट हुआ था.

सन् 1257 में हुआ यह विस्फोट इतना बड़ा था कि इसका असर आज भी आर्कटिक और अंटार्कटिक की बर्फीली सतहों पर देखा जा सकता है.

यूरोप के मध्यकालीन साहित्य में भी इस विस्फोट की चर्चा मिलती है. जिसके अनुसार विस्फोट के बाद वातावरण में अचानक से ठंड बढ़ गई थी और खेती करना मुश्किल हो गया था.

पीएनएएस जर्नल की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने इन सबके लिए इंडोनेशिया के लॉमबॉक द्वीप समूह के सैमालास ज्वालामुखी को जिम्मेदार बताया है.

हालांकि अब इस ज्वालामुखी का बेहद छोटा हिस्सा ही बचा है और वहां एक विशाल झील है.

विश्वसनीय सबूत

शोधकर्ताओं के इस दल ने ध्रुवीय क्षेत्र के बर्फ में मौजूद सल्फर और धूलकण की पहचान लॉमबॉक इलाके के मौजूद सल्फर और धूलकण से की है. इसमें रेडियो कार्बन के प्रकार और पर्वतीय धूल के विभिन्न प्रकारों का अध्ययन किया गया.

इस अध्यय के बाद वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि सन् 1257 का महाविस्फोट लॉमबॉक द्वीप स्थित सामलास ज्वालामुखी में ही हुआ था.

इंग्लैंड के कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर क्लाइव ओपनहेमर ने बीबीसी से कहा, "सबूत काफी दमदार और विश्वसनीय लग रहे हैं."

इस शोध अध्ययन में शामिल पैंथन सॉरबॉन यूनिवर्सिटी, फ्रांस के प्रोफेसर फ़्रैंक लाविजन ने कहा, "हम लोगों ने ठीक उसी तरीके का प्रयोग किया है जिसका प्रयोग आपराधिक जांच के मामले में होता है."

लाविजन ने कहा, ''किसी आपराधिक मामले की तरह हम पहले से नहीं जानते थे कि मुजरिम कौन है. लेकिन हमें जियो केमेस्ट्री की मदद हत्या का समय और वहां मौजूद फिंगर प्रिंट जैसे सबूत मिले. इसकी मदद से हमने पाया कि यह ज्वालामुखी ही विस्फोट की असल वजह था."

अब तक सन् 1257 के महाविस्फोट को मेक्सिको के ज्वालामुखी और इक्वाडोर और न्यूज़ीलैंड के ज्वालामुखीसे जोड़ा जाता रहा था.

लेकिन शोधकर्ताओं के मुताबिक जियो केमेस्ट्री के सबूत ऐसी किसी संभावना पर विराम लगाते हैं और इंडोनेशिया का सामलास ज्वालामुखी सभी नजरिए से उस विस्फोट के केंद्र में है.

लॉमबॉक द्वीप पर किए गए इस शोध दल के मुताबिक सामलास ज्वालामुखी में हुए विस्फोट के दौरान 40 क्यूबिक किलोमीटर तक लावा फैला था. इस विस्फोट के चलते धूलकण आसमान में 40 किलोमीटर ऊपर तक पहुंचे थे.

मौसम पर असर

इतनी ऊंचाई तक धूलकणों के पहुंचने के बाद उसके लिए पूरी पृथ्वी तक फैलना आसान हो जाता है और यही वजह है कि इस ज्वालामुखी के धूलकण ग्रीनलैंड और अंर्काटिकतक मौजूद मिले हैं.

इतना ही नहीं इस विस्फोट का वायुमंडल पर पड़ने वाला प्रभाव भी बेहद महत्वपूर्ण रहा है.

यूरोप के मध्यकालीन साहित्य में इस बात का जिक्र है कि सन् 1258 की गर्मियों में अचानक से मौसम बदल गया था और काफी ठंड पड़ी थी.

ग्रेट ब्रिटेन में उस समय बहुत ज़्यादा बारिश भी हुई थी जिसके कारण ब्रिटेन के अधिकांश हिस्सों में बाढ़ आ गई थी.

पुरात्तवविदों ने हाल ही में सन् 1258 के उस दिन विशेष का पता लगाया जिस दिन लंदन में इस विपदा में मारे गए हजारों लोगों को दफनाया गया था.

प्रोफेसर लाविजन ने बीबीसी न्यूज़ से कहा, "हम ये नहीं कह सकते हैं कि इन दो घटनाओं में सीधा संबंध था लेकिन अगर ऐसा नहीं होता निश्चित तौर पर आबादी काफी ज़्यादा होती."

हाल की विपदाओं से अगर तुलना करें तो शोधकर्ताओं के मुताबिक सामलास का विस्फोट सन्1883 में कारकाटोआ और सन्1815 में ताम्बूरा में हुए विस्फोट जितना ही भयानक था.

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