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कीनिया: कैसे होती है चरमपंथियों की भर्ती?

 बुधवार, 2 अक्तूबर, 2013 को 15:26 IST तक के समाचार
केन्या, चरमपंथी

मकाबुरी से मेरी मुलाकात पूर्वी कीनिया के मोम्बोसा में मक्खियों से भरे एक कमरे में हुई थी.

आप शायद इस जगह पर ऐसे कट्टर धार्मिक नेता से मिलने की उम्मीद न करें जो ख़ुद को अल-शबाब के भर्ती तंत्र को रोकने की कीनिया की लड़ाई में नंबर एक लक्ष्य बताता है.

मकाबुरी को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की एक सूची में रखा गया था, मकाबुरी का असली नाम अबुबकर शरीफ अहमद है और उनके कीनिया से बाहर जाने पर पाबंदी है, उनकी संपत्ति 2012 में जब्त कर ली गई थी.

उनके बारे में कहा गया था कि वो "युवा कीनियाई मुसलमानों की सोमालिया में हिंसक चरमपंथी गतिविधियों में भर्ती के लिए मदद करते हैं."

उन्होंने ये सिखाया है कि "युवाओं को सोमालिया जाना चाहिए, चरमपंथी गतिविधियों में शामिल होना चाहिए, अल-क़ायदा के लिए लड़ना चाहिए औऱ अमरीकी नागिरकों को मारना चाहिए."

'उदार मुसलमान नहीं'

मकाबुरी को अपनी गतिविधियों पर कोई पछतावा नहीं है और उनका मानना है कि ये गतिविधियां कुरान की उनकी अपनी विवादास्पद व्याख्या के अनुसार सही हैं.

केन्या, चरमपंथी

मकाबुरी कहते हैं, "उदार मुसलमान जैसी कोई चीज़ नहीं है. पैगंबरों ने हमें इस्लाम में उदारता नहीं सिखाई - इस्लाम तो इस्लाम है."

उनका कहना है, "उदार मुसलमान होने का मतलब है ये स्वीकार करना कि आपके दुश्मन जो कहते हैं आप वही हैं."

हालांकि मकाबुरी को अपनी हत्या होने का डर है लेकिन वो छिपे हुए नहीं हैं.

मैं उनके घर में उनसे खुलकर मिला और उनके साथ एक गांव में गया जहां उन्होंने एक मस्जिद में सार्वजनिक रूप से नमाज पढ़ी.

मकाबुरी का कहना है कि इस तरह के आरोप गलत हैं कि वो अल-शबाब को सीधे तौर पर पैसे देते हैं लेकिन उन्होंने हिंसा करने के अधिकार का बचाव किया.

'दखल देने का हक़ नहीं'

"उदार मुसलमान जैसी कोई चीज़ नहीं है. पैगंबरों ने हमें इस्लाम में उदारत नहीं सिखाई - इस्लाम तो इस्लाम है. उदार मुसलमान होने का मतलब ये स्वीकार करना है कि आपके दुश्मन जो कहते हैं आप वही हैं."

अबुबकर शरीफ़ अहमद, धार्मिक नेता, कीनिया

वो कहते हैं, "अल-शबाब के लड़ाके हिंसा कर रहे हैं क्योंकि वो अपने देश को बाहरी लोगों की चढ़ाई से बचाना चाहते हैं. ये अमरीका या किसी और देश का हक़ नहीं है कि वो किसी और देश में दखलंदाज़ी करें."

वो मुझे मोम्बासा के ठीक बाहर एक इस्लामिक बोर्डिंग स्कूल में लेकर गए जहां करीब छह से 10 साल की उम्र वाले मुसलमान बच्चों को, कुरान को कंठस्थ करना सिखाया जाता है. इनमें से कुछ बच्चे अनाथ हैं.

इन्हें मकाबुरी जैसी विचारधारा वाले शिक्षक कुरान की एक ख़ास व्याख्या सिखाते हैं.

वो गर्व से बताते हैं कि उनका बेटा भी इन छात्रों में से एक है.

इस स्कूल का नाम शेख रोगो मोहम्मद के नाम पर है जिन्हें संयुक्त राष्ट्र ने "मकाबुरी का निकट सहयोगी" बताया था.

मैंने केन्या में अल-शबाब के भर्ती तंत्र की जांच करते हुए दो हफ्ते बिताए हैं.

इसकी शुरुआत मकाबुरी और दूसरे कट्टर धार्मिक नेताओं से होती है जो युवा मुसलमानों को प्रवचन देते हैं, जो अक्सर धर्मांतरित होते हैं और कुछ कर दिखाना चाहते हैं.

मैंने इस मार्ग का पीछा उत्तर में मोम्बासा से लामू होते हुए और इसके तट के पास के दूरदराज़ के टापुओं तक किया जहां से सोमालिया की सरहद तक नाव से कुछ घंटों में पहुंचा जा सकता है.

शेख रोगो, मकाबुरी, सहयोगी

संयुक्त राष्ट्र ने शेख रोगो को मकाबुरी का निकट सहयोगी बताया था.

मैंने पाया कि होने वाले जिहादी, उनकी नागरिकता कुछ भी हो, खुद रास्ता नहीं ढूंढते बल्कि मकाबुरी जैसे धार्मिक प्रचारक सक्रिय तौर पर मार्गदर्शित करते हैं.

उन्हें बताया जाता है कि उन्हें किन टापुओं की ओर जाना चाहिए, कहां ठहरना चाहिए और पेट आइलैंड से सोमालिया तक नाव से पहुंचने के लिए किस से संपर्क करना चाहिए.

मैंने केन्या के दो युवा रंगरूटों से बात की जो इसी तरह के एक भर्ती तंत्र के ज़रिए अल-शबाब से जुड़ने के लिए सोमालिया पहुंचे थे.

वे अपने असली नाम नहीं बताना चाहते थे.

'टूटे जिहाद के सपने'

उनसे वादा किया गया था कि उनके परिवारों को पैसा मिलेगा और उनके काम के इनाम के तौर पर स्वर्ग में जगह भी.

जब वे सोमालिया पहुंचे तो जिहाद और तारीफ़ पाने के उनके सपने चकनाचूर हो चुके थे.

अली ने कहा कि जब वो सोमालिया पहुंचे तो 13 या 14 साल के थे. उन्होंने बताया कि किस तरह उन्हें एक रंगरूट का सिर काटने की घटना देखने को मजबूर किया गया था, इस रंगरूट ने किसमायो में अल-शबाब के शिविर से भागने की कोशिश की थी.

"उसके हाथ और पैर पीछे बंधे हुए थे. उन्होंने उसे झुकने को मजबूर किया और बेहद पैने चाकू से मेरे सामने उसे मार दिया. वो जानवर की तरह चीख रहा था, ठीक वैसे ही जैसे बकरी को काटा जाता है."

अली, अल-शबाब के भगोड़े

उन्होंने बताया, "उसके हाथ और पैर पीछे बंधे हुए थे. उन्होंने उसे झुकने को मजबूर किया और बेहद पैने चाकू से मेरे सामने उसे मार दिया. वो जानवर की तरह चीख रहा था, ठीक वैसे ही जैसे बकरी को काटा जाता है."

तमाम जोखिम के बावजूद अली भागकर वापस नैरोबी पहुंचे. अब वो अपने परिवार से दूर रहते हैं क्योंकि उन्हें डर है कि किसी को ये पता चला कि वो अल-शबाब के भगोड़े हैं तो उन्हें मार दिया जाएगा.

खलील ने कहा कि शेख रोगो ने उन्हें सोमालिया जाने और जिहादी बनने के लिए प्रोत्साहित किया था.

खलील ने सोमालिया में जो महसूस किया उससे वो भी हैरान थे. उन्होंने कहा कि वे जानते हैं कि अल-शबाब छह-सात साल के बच्चों को भी आत्मघाती हमलावरों की तरह इस्तेमाल करता है.

'क़ानून के दायरे में काम'

दोनों ही जिहाद के लिए सोमालिया पहुंचे थे लेकिन उनसे कहा गया कि वो खाना पकाएं और बच्चों की देखभाल करें.

लड़ने के लिए सोमालिया जाने वाले कीनियाई युवाओं के बारे में प्रशासन को तभी पता चलता है जब उनकी मांएं उनके लापता होने की रिपोर्ट दर्ज कराती हैं.

कीनिया की नौसेना को ब्रिटेन, अमरीका और कई यूरोपीय देशों की एजेंसियों की मदद से भर्ती के इस तंत्र को तोड़ने में थोड़ी कामयाबी मिली है.

कीनिया, अल-शबाब

माना जाता है कि अल-शबाब के पास करीब सात हज़ार से नौ हज़ार लड़ाके हैं.

सितंबर 2012 में कीनिया की सेनाओं ने किसमायो पर सफल हमला किया. किसमायो दक्षिण सोमालिया में अल-शबाब का ख़ास बंदरगाह है और उसकी आय का खास स्रोत है.

इसका नतीजा ये हुआ कि सोमालियाई समुद्री डाकुओं की गतिविधियों पर भी लगाम लगी है.

किसमायो पर हमला करने वाले कीनियाई सुरक्षा बल के कमांडर ने मुझे बताया कि समुद्री डाकू लाइसेंस के लिए फिरौती की रकम अल-शबाब को देते हैं.

अहम सवाल है कि ये कट्टर धार्मिक नेता बगैर मुकदमों का सामना किए खुले आम कैसे काम कर सकते हैं.

सितंबर 2012 में मकाबुरी पर शेख रोगो की हत्या के बाद दंगे भड़काने के कई आरोप लगे. वो अभी ज़मानत पर हैं.

जिन कीनियाई अफसरों से मैंने बात की उनका कहना है कि मकाबुरी और दूसरे कट्टर धार्मिक नेता क़ानून की हद में रह कर काम करते हैं और उनको दोषी साबित करने के लिए सबूत जुटाना बेहद मुश्किल है. ब्रिटेन भी इसी समस्या का सामना कर रहा है.

डर इस बात का है कि मकाबुरी जैसे कट्टर धार्मिक नेताओं को न रोक पाने पर अल-शबाब का भर्ती तंत्र कायम रहेगा.

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