पाकिस्तान में मनमोहन-शरीफ़ वार्ता पर मिली-जुली प्रतिक्रिया

  • 30 सितंबर 2013
मनमोहन सिंह, नवाज़ शरीफ़

पाकिस्तानी मीडिया के कई वर्गों ने प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ हुई बातचीत का स्वागत किया है. लेकिन सेना समर्थक अख़बारों ने कश्मीर मुद्दे से बचने के लिए मनमोहन सिंह पर निशाना साधा है.

अधिकांश मध्यमार्गी और उदार अख़बारों को लगता है कि द्विपक्षीय मामलों को सुलझाने के लिए बातचीत ही एकमात्र रास्ता है.

कश्मीर पिछले 60 से दोनों के देशों के बीच विवाद का मुख्य मुद्दा रहा है. करगिल के साथ-साथ यह दो बड़े युद्धों का कारण बना है.

उदार माने जाने वाले पाकिस्तानी अख़बार 'डेली टाइम्स' को लगता है कि शांति प्रक्रिया उत्साहवर्धक है. अख़बार को लगता है कि 'दोनों प्रधानमंत्रियों ने आगे बढ़ने की जो इच्छा जताई है, वह उन ताक़तों को जवाब है जो प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के भारत से संबंध सुधारने की इच्छा जताने के बाद से ही षड्यंत्र रचने' में लगे हैं.

पाकिस्तान के राजनीतिक विश्लेषकों को लगता है कि दोनों प्रधानमंत्रियों की बैठक द्विपक्षीय रिश्तों को मज़बूती देने के लिए अच्छा प्रयास है.

राजनीतिक विश्लेषक रसूल बख़्श रईस ने पाकिस्तानी टीवी चैनल 'पीटीवी' से कहा, ''यह एक अच्छा अवसर था, जिसका प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ और डॉक्टर मनमोहन सिंह ने अच्छा उपयोग किया. हालांकि यह एक कठिन रास्ता है. भारत और पाकिस्तान के लोग चाहते हैं कि उनकी सरकारें शांति और प्रगति के रास्ते पर चलें.''

मनमोहन सिंह

उदार वामपंथी दैनिक 'डॉन' इस बातचीत को एक छोटी जीत के रूप में देखता है. अख़बार कहता है कि इसका सकारात्मक पक्ष यह रहा कि बैठक के बाद आयोजित संवाददाता सम्मेलन में कठोर बयानबाजी से बचा गया.

अख़बार कहता है, "भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ का मानना है कि संबंधों का सामान्य होना भारत और पाकिस्तान के लिए ज़रूरी है."

अख़बार 'दि नेशन' को भी लगता है, ''भारत के साथ लंबे शत्रुततापूर्ण संबंध के बाद, इसका केवल एक ही समाधान है, और वह है बातचीत. अधिक से अधिक बातचीत.''

मध्यममार्गी उर्दू अख़बार 'जंग' कहता है, ''भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों के बीच बैठक ऐसे समय हुई है जब दोनों के देशों के बीच टिकाऊ शांति और तनाव को ख़त्म करने की सबसे अधिक ज़रूरत है. यह अवास्तविक नहीं है कि दोनों देशों के नेतृत्व पारस्परिक शांति और समृद्धि का रास्ता प्रशस्त करें. युद्ध की तैयारियों पर खर्च की जाने वाली धनराशि लोगों की भलाई और उनके जीवन को आसान बनाने पर खर्च की जाए.''

'आरोप बंद किए जाएं'

जब अधिकतर पाकिस्तानी अख़बार भारत के साथ शांति वार्ता की वकालत कर रहे हैं, कुछ सेना समर्थक अख़बार और विश्लेषक कश्मीर समस्या के समाधान को लेकर भारत के रुख की आलोचना कर रहे हैं.

नवाज़ शरीफ़

सेना समर्थक अख़बार 'पाकिस्तान ऑब्जर्बर' कहता है, ''सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता पाने के लिए एक देश के नेता (मनमोहन सिंह) पाकिस्तान में मीन-मेख निकाल रहे हैं. वास्तव में यह संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय समुदाय का अपमान है. यह आंखें खोल देने वाली घटना होनी चाहिए. यह देखने वाला होगा कि सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट मिल जाने के बाद भारत का रवैया और योगदान क्या होता है.''

पाकिस्तान में प्रतिबंधित संगठन जमात-उद-दावा के प्रमुख हाफ़िज़ सईद ने एक्सप्रेस टीवी से कहा, ''बातचीत होनी चाहिए और चीजों को आगे बढ़ना चाहिए, अभी वार्ता को स्थगित करने पर विचार नहीं कर सकते हैं.'' उन्होंने भारतीय प्रधानमंत्री के कश्मीर पर विचार और आतंकवाद का केंद्र पाकिस्तान में बताने के लिए आलोचना भी की.

लोकप्रिय उर्दू अख़बार 'एक्सप्रेस' से कहा, "संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में भारतीय प्रधानमंत्री के भाषण ने शांति प्रक्रिया के लिए ख़तरा पैदा किया है, इसका कोई फल नहीं निकलेगा."

अखबार का कहना है, "शांति प्रक्रिया और दोस्ताना संबंधों की पहली शर्त यह है कि पारंपरिक आरोप तुरंत बंद किए जाएं. लेकिन भारतीय प्रधानमंत्री चरमपंथियों की भाषा का उपयोग कर रहे हैं."

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