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क़ैद से छूटा एक फ़ौजी जो जेल वापस लौट गया

 शनिवार, 7 सितंबर, 2013 को 13:16 IST तक के समाचार
युद्धबंदी कैप्टन रॉबर्ट कैम्पबेल, प्रथम विश्वयुद्ध

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान पकड़े गए एक ब्रितानी सैनिक को मरती हुई माँ को देखने के लिए जेल से छुट्टी दे दी गई थी. इस रिहाई के लिए एक शर्त रखी गई थी कि उसे वापस जेल लौटना होगा.

इस घटना का पता लगाने वाले इतिहासकार रिचर्ड वैम इम्डेन ने बीबीसी को बताया कि कैप्टन रॉबर्ट कैम्पबेल ने क़ैसर विल्हम द्वितीय से इस रिहाई के बदले वापस लौट आने का वादा किया था और वह केंट से जर्मनी वापस लौट गया.

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रिचर्ड कहते हैं, "कैप्टन कैम्पबेल को लगा होगा कि अपने वादे को पूरा करना उनका फ़र्ज़ है."

रिचर्ड को अपने शोध में ये भी पता चला कि कैप्टन कैम्पबेल ने जर्मनी वापस लौटने के बाद जेल से भागने की कोशिश भी की थी.

इतिहासकार रिचर्ड को इस कहानी का पता उस वक़्त चला जब वे अपनी किताब 'मीटिंग द एनेमीः दि ह्यूमन फ़ेस ऑफ़ ग्रेट वार' के लिए नेशनल आर्काइव्स में विदेश विभाग के दस्तावेज़ खंगाल रहे थे.

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ईस्ट सरे रेजीमेंट के फ़र्स्ट बटालियन के कैप्टन कैम्पबेल 24 अगस्त 1914 को उत्तरी फ्रांस में पकड़ लिए गए थे. उस वक़्त उनकी उम्र 29 साल थी.

माँ की मृत्यु

युद्धबंदी, विश्वयुद्ध

पकड़े जाने के बाद कैम्पबेल को उत्तर पूर्वी जर्मनी के युद्धबंदी शिविर भेज दिया गया. जब वे शिविर में थे तो उन्हें ख़बर मिली कि उनकी माँ लुईस कैंसर से मर रही हैं.

यह सुनकर कैप्टन कैम्पबेल ने जर्मन सम्राट को एक चिठ्ठी लिखकर बीमार माँ को देखने जाने की इजाज़त देने की विनती की . सम्राट क़ैसर ने इसकी इजाज़त दे दी. लेकिन यह रिहाई सशर्त थी.

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क़ैसर ने कहा कि कैम्पबेल को यह वादा करना पड़ेगा कि माँ को देखने के बाद वह वापस लौट आएगा.

रिचर्ड बताते हैं कि कैम्पबेल नीदरलैंड के रास्ते नाव और ट्रेन से सफ़र करके केंट पहुँचे. कैम्पबेल अपनी माँ के पास हफ्ते भर रहे और फिर उसी रास्ते से जर्मनी वापस लौट गए.

कैम्पबेल की माँ साल 1917 के फ़रवरी महीने में गुज़र गईं.

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रिचर्ड कहते हैं, "कैम्पबेल ने यह महसूस किया होगा कि अपना वादा निभाना उनका कर्तव्य है. उन्होंने सोचा होगा कि अगर मैं वापस नहीं लौटा तो कोई फ़ौजी इस आधार पर कभी भी रिहा नहीं किया जाएगा."

भागने की कोशिश

प्रथम विश्वयुद्ध

रिचर्ड के मुताबिक़ यह बात भी चौंकाने वाली है कि कैप्टन कैम्पबेल को ब्रिटेन से वापस जर्मनी जाने के लिए नहीं रोका गया.

ऐसी ही एक गुज़ारिश ब्रिटेन के नियंत्रण में रह रहे जर्मन युद्धबंदी पीटर गैस्ट्रिक ने भी की थी जिसे यह इजाज़त नहीं दी गई जिसके बाद जर्मनी में किसी अन्य ब्रितानी क़ैदी को इस तरह की छुट्टी नहीं दी गई.

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लेकिन कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती है. कैप्टन कैम्पबेल युद्धबंदी शिविर में लौटते ही भागने की कोशिश करते हैं.

कुछ साथी क़ैदियों के साथ कैम्पबेल नौ महीने तक खुदाई करते हैं और भागने के क्रम में हॉलैंड की सीमा के पास फिर से पकड़ लिए जाते हैं.

'द डेली मेल' अख़बार के मुताबिक़ युद्ध समाप्त हो जाने के बाद कैप्टन कैम्पबेल ब्रिटेन वापस लौट आए और 1925 तक सेना में बने रहे.

दूसरे विश्व युद्ध के समय 1939 में कैम्पबेल सेना में दोबारा भर्ती हो गए थे. साल 1966 के जुलाई महीने में 81 साल की उम्र में उनकी मृत्यु हो गई.

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