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ज़िंदगी की तलाश में जान हथेली पर लेकर मौत का सफ़र?

 शुक्रवार, 6 सितंबर, 2013 को 08:12 IST तक के समाचार
शरणार्थी

हर महीने हज़ारो प्रवासी हिंद महासागर से ऑस्ट्रेलिया के तटों पर पहुँचने के लिए जान जोखिम में डालकर सफ़र करते हैं.

इनमें से बहुत से लोग अफ़ग़ानिस्तान, ईरान और श्रीलंका जैसे देशों में पेश आ रही मुश्किलों से निजात पाने के लिए भागे हुए होते हैं.

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इस सफ़र के लिए ये लोग मानव तस्करों को एक बड़ी रक़म चुकाते हैं. ये मानव तस्कर इंडोनेशिया से बाहर जाने के लिए असुरक्षित नौकाओं का इस्तेमाल करते हैं. ऑस्ट्रेलिया में होने वाले आम चुनावों के प्रचार अभियान में शरणार्थियों का मुद्दा ज़ोरशोर से उठा है.

ऑस्ट्रेलिया की दोनों ही प्रमुख विपक्षी पार्टियों ने इनके आने पर कठोर नीतियों का मुद्दा उठाया है.

बीबीसी ने कुछ प्रवासियों से उनके सफ़र के बारे में बात की. 41 साल के हबीब काबुल में नागरिक अधिकारों के लिए काम करते हैं. उनकी तीन बेटियाँ हैं जिनकी उम्र नौ, आठ, और तीन साल है. उन्हें और उनके परिवार को उम्मीद है कि वे लोग एक रोज़ अफ़ग़ानिस्तान छोड़ देंगे.

समुद्र के रास्ते अवैध तरीके से ऑस्ट्रेलिया पहुँचने वालों की संख्या

हबीब की कहानी

मैंने हिंसा से प्रभावित लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए बहुत काम किया है. अदालतों में कई मामलों को ले जाने की वजह से मुझे कई परेशानियों से रूबरू होना पड़ा."

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मुझे तीन बार जेल भेजा गया और दो बार मुझ पर हमला किया गया. दूसरी बार मुझे छुरा भोंक दिया गया. उन्होंने मेरी जान लेने की कोशिश की.

मुझे एहसास हुआ कि अगर मैं मर गया तो मेरी बीवी और तीन लड़कियों का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा. इसलिए मैंने अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने का फ़ैसला किया. मैंने ऑस्ट्रेलिया को इसलिए चुना क्योंकि ये देश मानवाधिकारों की क़द्र करता है.

मैं चाहता हूँ कि मेरी बेटियाँ ऐसी किसी जगह स्कूल जा सकें जहाँ अमन हो और जहाँ उन्हें हर लम्हें ख़ून-ख़राबे, ख़ुदकुश हमलावरों और क़त्ल की ख़बरें न सुननी पड़े.

ऑस्ट्रेलिया में शरण के लिए आवेदन करने वालों की संख्या

मानव तस्कर

मेरे कुछ रिश्तेदार इंडोनेशिया में रहते हैं. उनके मार्फ़त मैने काबुल की एक ट्रैवेल एजेंसी से संपर्क किया. उस ट्रैवेल एजेंसी के ज़रिए मानव तस्करों से राबता क़ायम हुआ. मैं मानव तस्करों से अभी तक ख़ुद नहीं मिला हूँ लेकिन ट्रैवेल एजेंसी ने जल्द ही मुलाक़ात कराने की बात कही है.बेशक यह एक बड़ा जुआ है.

मानव तस्कर कोई भरोसे के लायक़ आदमी नहीं होता. लेकिन इन लोगों ने पहले भी हमारे रिश्तेदारों को बाहर निकालने में मदद की है और हमारे पास कोई दूसरा विकल्प भी नहीं है. इसलिए हमें उन पर भरोसा करना पड़ेगा.हमें बताया गया कि पहले हमें भारत जाना होगा. उसके बाद वे हमें मलेशिया और फिर वहाँ से इंडोनेशिया ले जाना होगा."

मलेशिया में पढ़ाई और काम के वीज़ा के लिए हमें मुझे 21 हज़ार डॉलर या तक़रीबन 14 लाख रुपए देना होगा.

राष्ट्रीयता के आधार पर ऑस्ट्रेलिया आने वाले जहाजों के आँकड़ें

शरणार्थी

सफ़र की शुरुआत से पहले आधी रक़म और मलेशिया पहुँचने पर बाक़ी रक़म देनी होगी. इतनी बड़ी रक़म का इंतज़ाम करना भी एक बड़ी चुनौती है.

कुछ रक़म मुझे कर्ज़ लेनी होगी और बाक़ी रक़म जुटाने के लिए हम अपनी सारी संपत्ति और घर का सामान बेचने जा रहे हैं.

नावों के जरिए अवैध तरीके से ऑस्ट्रेलिया आने वालों की संख्या

हमने टीवी और रेडियो पर इसके बारे में सुना है कि इंडोनेशिया से ऑस्ट्रेलिया जाने के लिए नाव का सफ़र कितना ख़़तरनाक होता है. ये नौकाएँ समुद्र में चलाने लायक़ नहीं होती हैं. वे उन नावों पर ज़रूरत से ज्यादा लोग भर लेते हैं और इनमें से कई तो डूब भी जाते हैं."

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लेकिन इसके बावजूद हम देखते हैं कि ज्यादातर शरणार्थी ऑस्ट्रेलिया पहुँचते हैं और वहाँ पहुँचकर नए सिरे से ज़िंदगी शुरू करते हैं.

एक सुकून की ज़िंदगी के लिए वहाँ पहुँचने के रास्ते में पेश आने वाली मुश्किलों का सामना करने के लिए हम तैयार हैं.

अपनी जान बचाने और अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए मुझे अपना मुल्क छोड़ना पड़ेगा. यह बात मुझे उदास करती है. मैं यहाँ पैदा हुआ था और मेरे माँ-बाप की क़ब्र यहीं पर है लेकिन मेरे पास कोई और रास्ता नहीं बचा है.

अवैध अप्रवासन की वजह से हिरासत में लिए गए लोगों की संख्या

सईद की दास्तां

23 साल के सईद ईरान की राजधानी तेहरान के रहने वाले हैं. वे एक मध्यमवर्गीय परिवार से आते हैं. लेकिन इस्लाम छोड़कर ईसाइ धर्म अपना लेने के बाद उन्होंने मुल्क छोड़ देने का फ़ैसला किया.

ईरान में इस्लाम छोड़कर कोई अन्य मज़हब अपनाना क़ानूनन जुर्म है. सईद ने इंडोनेशिया से क्रिसमस आईलैंड का सफ़र नाव से तय किया.

ऑस्ट्रेलिया में बने नए नियमों के तीन दिन बाद ही सईद हिंद महासागर के इस द्वीप पर पहुँचे थे.

इन नियमों के तहत नए आने वाले लोगों को आगे की कार्रवाई के लिए पपुआ न्यूगिनी भेजा जाना था और अगर उन्हें शरणार्थी का दर्जा मिल जाता है तो वे ऑस्ट्रेलिया में नहीं बस पाएंगे. इस बात ने उन्हें हताश कर दिया है.

हिरासत में रखे गए सईद ने बीबीसी से मोबाइल फ़ोन पर बात की.

लोगों को अवैध तरीके से ऑस्ट्रेलिया भेजने के रास्ते

हताशा

सईद कहते हैं, "मैंने अपने मज़हब की आज़ादी की तलाश में ईरान छोड़ दिया. अगर मुझे इन नई परिस्थितियों के बारे में पता होता तो मैं ऑस्ट्रेलिया कभी नहीं चुनता.नाव पर तीन दिनों का सफ़र बेहद डरावना था. मैंने मौत को अपनी आँखों के सामने देखा."

"यहाँ पहुँचने के लिए हर किसी ने अपनी जान ख़तरे में डाली है लेकिन अब अधिकारी कहते हैं, ''हमें इस बात की परवाह नहीं है कि आप यहाँ किस तरह से पहुँचे हैं, तुम्हें पापुआ न्यू गिनी जाना होगा. भले ही आप यह पसंद करें या ना करें."हम पर पापुआ न्यू गिनी जाने के लिए दबाव डाला जा रहा है. यह ग़ैरवाजिब है. मैं सचमुच बेहद हताश हूँ."

"मैं अपने परिवार का एकलौता बेटा हूँ और ईरान में हमें कोई रुपए-पैसे की तंगी भी नहीं थी.अगर वे मुझे पपुआ न्यूगिनी भेज देंगे तो मैं वहाँ ख़ुदकुशी कर लूंगा. मेरे माँ-बाप फिर कभी मुझे नहीं देख पाएंगे."

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