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जब नेहरू ने चीन पर नज़र रखने के लिए अमरीका से कहा...

 शनिवार, 17 अगस्त, 2013 को 15:47 IST तक के समाचार
पंडित जवाहर लाल नेहरु

भारत ने 1962 के युद्ध में मिली हार के बाद चीन की सीमा पर नजर रखने के लिए अमरीका के 'यू-2' जासूसी विमानों को अपने हवाई ठिकाने के इस्तेमाल की अनुमति दी थी.

अमरीका में शुक्रवार को जारी दस्तावेजों में कहा गया है कि भारतीय प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने 11 नवंबर 1962 को चीन से लगी सीमा पर नजर रखने के लिए यू-2 मिशन को भारतीय क्षेत्र में उड़ान भरने की इजाजत दी थी.

अमरीका के सूचना की स्वतंत्रता कानून के तहत नेशनल सिक्योरिटी आर्काइव ने सीआईए से इससे जुड़े दस्तावेज हासिल किए हैं. उन्हीं दस्तावेजों में ये जानकारी दी गई है.

राधाकृष्णन और कैनेडी में सहमति

जॉन एफ़ कैनेडी

जॉन एफ़ कैनेडी के राष्ट्रपति रहते भारत-अमरीका में खुफिया विमानों के इस्तेमाल पर सहमति बनी थी.

इसके बाद अमरीका दौरे पर गए तत्कालीन भारतीय राष्ट्रपति एस राधाकृष्णन और अमरीकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी के बीच तीन जून 1963 को उड़ीसा के चारबतिया हवाई ठिकाने के इस्तेमाल को लेकर सहमति बनी थी.

चारबतिया हवाई अड्डा दूसरे विश्व युद्ध के समय बनाया गया था. लेकिन इस ठिकाने की मरम्मत में अधिक समय लगने के कारण मिशन को थाइलैंड के तख्ली से शुरू किया गया.

साल 1954 से 1974 के बीच के जासूसी मिशन के बारे में जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि 10 नवंबर 1963 को 'यू-2' मिशन ने 11.45 घंटे की सबसे लंबी उड़ान भरी थी.

इस उड़ान में पायलट बुरी तरह थक गया था. इसके बाद से इस प्रोजेक्ट के मैनेजर ने भविष्य की उड़ानों की अवधि 10 घंटे तक सीमित कर दी थी.

नेशनल सिक्योरिटी आर्काइव ने कहा है कि नेहरू के निधन के कारण मई 1964 में चारबतिया में पहली तैनाती समाप्त हो गई थी.

'चीन की घुसपैठ की जानकारी'

यू-2 प्रोग्राम के बारे में सीआईए के एक अन्य दस्तावेज के आधार पर एनएसए ने कहा है कि सीआईए ने इन यू-2 जासूसी विमानों के जरिए कई उड़ाने भरी थी.

इसके आधार पर भारतीय सीमा में चीन की घुसपैठ की जानकारी दी गई थी.

रिपोर्ट में कहा गया है, "चारबतिया 1964 की शुरुआत में भी इस्तेमाल में नहीं था. इसलिए 31 मार्च 1964 को तख्ली से दूसरा मिशन डिटैचमेंट जी स्टेज शुरू किया गया.

24 मई 1964 तक चारबतिया से पहले मिशन की शुरुआत नहीं हो सकी. इसके तीन दिन बाद नेहरू का निधन हो गया और बाद में इस ऑपरेशन को स्थगित कर दिया गया."

'चीन के औचक हमले' के बाद भारत ने अमरीका से की थी सहायता की अपील.

इसके बाद चारबतिया से पायलट और विमान चले गए लेकिन लागत राशि बचाने के लिए अन्य लोग वहीं रुक गए.

दिसंबर 1964 में भारत-चीन के बीच सीमा पर विवाद बढ़ने के समय चारबतिया लौटे डिटैचमेंट जी ने तीन सफल मिशन पूरे किए.

हालांकि उस वक्त तक डिटैचमेंट के एशिया ऑपरेशन के लिए तख्ली मुख्य अड्डा बन चुका था और चारबतिया केवल एक फॉरवर्ड स्टेजिंग बेस था.

अमरीका से अपील

जुलाई 1967 में चारबतिया को बंद कर दिया गया.

सीआईए की रिपोर्ट के मुताबिक अक्टूबर 1962 में चीन ने भारतीय सीमा बलों के खिलाफ जम्मू और कश्मीर और नॉर्थ-इस्ट फ्रंटियर एजेंसी (नेफा) में बड़े पैमाने पर अचानक हमले किए.

चीनी सैनिकों ने अपनी कार्रवाई रोकने से पहले तक ब्रह्मपुत्र घाटी के उत्तर में मौजूद भारतीय सीमा बलों को खदेड़ दिया था.

इसके बाद भारत सरकार ने अमरीकी सरकार से सैन्य सहायता की अपील की थी.

उस वक्त भारत में अमरीकी राजदूत जॉन केनेथ गालब्रेथ ने भारत सरकार को सुझाव दिया था कि विवादित क्षेत्र के हवाई सर्वे से चीन की घुसपैठ के बारे में सटीक तस्वीर मिल सकेगी.

अमरीका दो कारणों से सीमा क्षेत्र की तस्वीरें भारत के साथ बांटता था.

पहला कारण यह था कि अमरीकी नीति निर्माता विवादित क्षेत्र की तस्वीर स्पष्ट करना चाहते थे.

जबकि दूसरा कारण तत्कालीन सोवियत रूस के खिलाफ भारत में स्थायी 'इलेक्ट्रॉनिक रीकानिसेंस मिशन' स्थापित करना था.

इसके बाद अप्रैल 1963 में अमरीकी राजदूत ने भारत में स्थायी बेस के लिए पहला औपचारिक आवेदन किया.

इसके बाद ही अमरीकी राष्ट्रपति कैनेडी और राधाकृष्णन के बीच चारबतिया में ठिकाना बनाने में सहमति बनी.

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