कांगो: खनिज़ों पर अधिकार के लिए जंग

  • 16 अगस्त 2013
कटांगा, विद्रोह, खनिज संपदा

कटांगा की जेल से एक कुख्यात अपराधी की फ़रारी के बाद कांगो डेमोक्रेटिक रिपब्लिक का सबसे ज़्यादा शांत राज्य पिछले एक साल से आतंक के साए में जी रहा है. यह ख़तरा पैदा हुआ है इस खनिजों से भरे इलाक़े की आज़ादी की मांग को लेकर.

कटांगा में लोगों को यह शिकायत करते आमतौर पर सुना जा सकता है कि वो अपने इलाक़े के तांबे और कोबाल्ट के संसाधनों का कोई फ़ायदा नहीं उठा पा रहे हैं. ऐसे में बहुत से नौजवानों ने अलगाववादियों की मांग का समर्थन कर दिया.

जून 1960 में कांगो की आज़ादी के एक हफ़्ते से भी कम वक़्त बाद इस इलाक़े में अलग होने की मांग उठने लगी थी. इसके बाद संघर्ष शुरू हो गया जिसमें शीतयुद्ध की दुश्मनी ने भी अपना योगदान दिया.

अलगाववादी नेता और बिज़नेसमैन मोइज़े शॉम्बे को पूर्व में उपनिवेशवादी ताक़त रहे बेल्जियम ने अपना समर्थन दे दिया. कटांगा में खनन को लेकर ब्रिटेन और अमरीका दोनों के हित जुड़े थे, जिन्होंने सोवियत यूनियन सरकार के नेतृत्व वाली सरकार के अंतर्गत कांगो के रहने का विरोध किया.

चार महीने में ही कांगो के प्रधानमंत्री पैट्रिस लुमुंबा को बाहर कर दिया गया. बाद में उनकी हत्या कर दी गई जबकि अलगाववादी नेता शॉम्बे संयुक्त राष्ट्र संघ के दबाव के आगे झुक गए थे. कटांगा 1963 में दोबारा कांगो में शामिल हो गया.

शीतयुद्ध की राजनीति इस स्वाहिली भाषी राज्य के लिए ज़्यादा वक़्त तक मुद्दा नहीं रहा. मगर यहां के बाशिंदे मानते हैं कि बाक़ी कांगो से इसका अलगाव अभी तक बना रहा है.

आंदोलन से नागरिक दूर

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क़रीब 60 हज़ार लोग कांगो के कटांगा शहर को छोड़कर ज़ांबिया से लगी सीमा पर मौजूद प्वेटो शहर चले गए हैं और क़रीब चार लाख विस्थापन शिविरों में रह रहे हैं.

हालांकि मौजूदा अलगाववादी गुट माई माई काटा कटांगा ऐसा नहीं है कि वो नागरिक आबादी का दिल दिमाग जीत सके.

18 साल की एंटोइने अपने गांव मॉन्टोफ़िटा पर अलगाववादियों के हमले को याद करते हुए कहती हैं, ‘उन्होंने मेरी मां को एक पेड़ से बांध दिया और उनकी पसलियों में तीर मारा.’ इस हमले में कुछ घर जला दिए गए थे और उनका और उनकी मां का अपहरण कर लिया गया था

एंटोइने बताती हैं,"उन्होंने छाती काट दीं. मैंने यह सब देखा. इसके बाद दो लोगों ने मुझसे बलात्कार किया. मेरे पड़ोसियों को ज़िंदा जला दिया गया."

एंटोइने ने ज़ांबिया की सीमा से लगे क़स्बे प्वेटो में शरण ली, जहां कटांगा के 60 हज़ार दूसरे गांव वाले पहले से जमा थे.

संयुक्त राष्ट्र संघ की शरणार्थी एजेंसी का अनुमान है कि 1700 से ज़्यादा महिलाओं का भागने से पहले बलात्कार किया गया.

क़रीब चार लाख लोग इस वक़्त कैंपों में रह रहे हैं जिन्हें विस्थापित लोगों के लिए बनाया गया है. यह बड़ी संख्या है, मगर अक्सर कांगो के दूसरे संघर्षों में विस्थापित लोगों की तादाद के मुक़ाबले यह कम ही है.

प्वेटो के एक निवासी प्रिसीले का कहना है, "संभवत: काटा कटांगा आंदोलन से ये लोग जुड़े भी हों मगर उन्होंने हमें कोई मौक़ा नहीं दिया. वो एक मुक्ति आंदोलन की तरह काम नहीं कर रहे. वो घरों को जलाते हैं और लोगों की हत्याएं करते हैं."

ख़तरनाक 'काटा कटांगा'

कांगो में चल रही लड़ाई की वजह से कुछ ही परिवारों को संयुक्त राष्ट्र संघ की तरफ़ से टैंट उपलब्ध कराए जा सके हैं. यूएनएचसीआर विस्थापितों के लिए मज़बूत और बड़े शिविर बना रही है.

हथियारबंद सामुदायिक ग्रुपों में से एक माई माई के कटांगा में कई ग्रुप हैं.

‘काटा कटांगा’ नया ग्रुप है और इसकी स्थापना सितंबर 2011 में गेडियॉन क्युंगू मुटांगा के जेल से भागने के बाद की गई थी. इसका स्वाहिली में मतलब है ‘कटांगा को अलग करो.’

2006 में सज़ा दिए जाने से पहले गेडियॉन ऐसी सेना के हेड रहे थे जिसने 90 के दशक में कांगो की सेनाओं के साथ रवांडा के समर्थक विद्रोही गुटों से लड़ाई में हिस्सा लिया था. इस संघर्ष के ख़त्म होने के बाद उन्हें कथित तौर पर सेना से गुप्त समर्थन मिलता रहा.

जेल से भागने के बाद भी माना जाता है कि उनके ये संबंध बने रहे और विदेश में रहने वाले एक कटांगा निवासी से उन्हें वित्तीय मदद मिलती रही.

हाल ही में दो पत्नियों और आठ बच्चों के साथ विद्रोही गुट को छोड़ने वाले एक शख़्स ने बीबीसी को गुट में होने वाली भर्तियों की जानकारी दी.

उन्होंने बताया, "गेडियॉन हमारे गांव में अगस्त 2012 में आए थे. हमने उन्हें अपनी आंखों से नहीं देखा है लेकिन वो हमसे बात करने के लिए एक झोंपड़ी में छिपे थे. अगर हम ‘काटा कटांगा’ में शामिल हो जाते हैं तो हमारी ज़िंदगी बेहतर हो जाएगी. उन्होंने हमें कहा कि अगर कटांगा आज़ाद हो जाता है, तो सैनिकों की तरफ़ से अत्याचार बंद हो जाएगा और हमें उन संसाधनों तक पहुंच हासिल हो जाएगी जो हमारे हैं.कटांगा बहुत अमीर है लेकिन हमें उसका कोई फ़ायदा नहीं है. उनका कहना है कि इससे यह स्थिति बदल जाएगी."

कोबाल्ट से भरपूर कटांगा

दुनियाभर में कोबाल्ट की सबसे बड़ी खानें कटांगा में हैं और इस राज्य में अफ़्रीका में दूसरा सबसे बड़ा तांबे का भंडार है.

जहां हज़ारों लोग हथियारबंद ग्रुपों से बचने के लिए धूल भरी सड़कों पर कई दिन तक चलते हैं दूसरी तरफ़ लाखों डॉलर के खनिजों को देश से बाहर भेजने के लिए नई सड़कों का इस्तेमाल हो रहा है.

ज़ांबिया की सीमा पर कोबाल्ट और तांबे से भरी गाड़ियों की कई किलोमीटर लंबी लाइनें देखी जा सकती हैं.

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जो लोग कटांगा शहर से भागकर प्वेटो पहुंचे हैं और रिहाइश का खर्च नहीं उठा सकते, उनके लिए म्वाशी में एक शरणार्थी शिविर बनाया गया है, जहां वो झोपड़ियों में रह रहे हैं.

कांगो के क़ानून के मुताबिक़ कटांगा में मौजूद कंपनियों से हासिल कर का 40 फ़ीसदी सरकार को वापस राज्य में लगाना होता है मगर स्थानीय मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि इस पैसे का कोई सीधा असर यहां नहीं दिखाई देता.

प्वेटो में बसे कसीबा के एक स्कूल टीचर लुसिएन का कहना है कि इस गांव के एक दर्जन लोग अलगाववादियों के साथ शामिल हो गए हैं.

लुसिएन कहते हैं, "मुझे भी हथियारबंद ग्रुपों ने निशाना बनाया क्योंकि मैं शिक्षित हूं. मैं लोगों को सच बताता हूं और इसलिए मैं लोगों को हथियारबंद ग्रुपों से अलग रहने की सलाह देता हूं.‘मैंने उनको कहा है कि इससे उन पर सिर्फ़ विपत्ति ही आएंगी."

'यह तो विद्रोह है'

प्वेटो में स्थानीय अधिकारियों के मुताबिक़ इस साल की शुरुआत के बाद माई माई के सैकड़ों लड़ाकों ने आंदोलन का रास्ता छोड़ दिया है.

मार्च में 200 से ज़्यादा हल्के हथियारों से लैस काटा कटांगा लड़ाके कटांगा का झंडा फहराते हुए लुबुंबाशी में घुसे थे. लड़ाई के दौरान 23 लोगों की मौत के बाद उन्होंने शहर के मुख्य चौक पर झंडा फहराया और फिर संयुक्त राष्ट्र संघ की शांति सेना के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था. माई माई ने एक बार फिर शहर में वापसी का एलान किया है.

लुबुंबाशी शहर के एक निवासी का कहना है, ‘हमें डर है कि जब वो पहले शहर में आए थे तो कई लोग उनकी गोलियों से मारे गए थे. यह तो एक विद्रोह की तरह है.’

यूएन ने बढ़ाई सुरक्षा

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कांगो के प्वेटो शहर में केवल कुछ घंटे के लिए ही बिजली आती है और वह भी सिर्फ़ सड़कों पर ही रोशनी रहती है. प्वेटो के आसपास गांवों में विद्रोहियों से लोगों को कोई सुरक्षा हासिल नहीं है.

प्वेटो गए गांववालों का कहना है कि जब उन पर हमला हुआ था तो कांगो सेना या संयुक्त राष्ट्र संघ के सैनिक कहीं मौजूद नहीं थे.

संयुक्त राष्ट्र संघ की शरणार्थी एजेंसी यूएनएचसीआर ने शांति मिशन मॉनुस्को को इलाक़े में अपनी मौजूदगी बढ़ाने और नागरिकों की सुरक्षा का आदेश दिया है.

मॉनुस्को ने जून में कुछ मिस्री सुरक्षा बलों को यहां भेजा था ताकि कटांगा में मौजूद साढ़े चार सौ सैनिकों की मदद की जा सके.

संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि कटांगा में हालात ‘काफ़ी चिंताजनक’ हैं, लेकिन उनकी प्राथमिकता उत्तरी किवू राज्य है जहां 6000 शांति सैनिक तैनात हैं.

यह साफ़ नहीं है कि कटांगा में कितने सरकारी सैनिक हैं और सरकार का कहना है कि वह अभी और फ़ौजों को वहां नहीं भेजने वाली है.

कांगो के प्रधानमंत्री मताता पोन्यो का कहना है, ‘मेरे हिसाब से यह कोई विद्रोह नहीं है.’ उन्होंने आगे कहा कि लोगों को अपनी बात कहने का लोकतांत्रिक हक़ है और सरकार ऐसे आंदोलनों पर काबू पाने की कोशिश करेगी.

'सरकारी सैनिक ज़िम्मेदार'

यूएनएचसीआर के मुताबिक़ विस्थापितों के खिलाफ बलात्कार और हिंसा के लिए बड़ी तादाद में सरकारी सैनिक ज़िम्मेदार हैं.

यूएन वर्ल्ड फ़ूड प्रोग्राम (डब्ल्यूएफ़पी) का कहना है कि वे अशांति वाले इलाक़ों में विस्थापितों की मदद करने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन उनके पास ज़रूरी पैसा नहीं है.

लुबुंबाशी में डब्ल्यूएफ़पी की प्रमुख एनी नार्दिनी का कहना है, "कटांगा को अभी भी एक अमीर राज्य माना जाता है."

लुबुंबाशी के एक निवासी ने कटांगा के आम लोगों की राय कुछ इस तरह ज़ाहिर की है, "आज़ादी कटांगा के लिए एक अच्छी चीज़ हो सकती है मगर यह इस पर निर्भर है कि इसे कैसे पाया जाता है. अगर यह लोगों के लिए है तो ठीक है, अगर यह कुछ ग्रुपों के हितों को साधने के लिए है तो नहीं".

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