BBC navigation

'आप शार्कों को चक्कर काटते देख सकते थे'

 सोमवार, 29 जुलाई, 2013 को 17:30 IST तक के समाचार
इंडियानापोलिस के बचाए गए नाविक

द्वितिय विश्व युद्ध के अंतिम हफ्ते की बात है. अमरीकी युद्धपोत यूएसएस इंडियानापोलिस पर जापानी टॉरपीडो ने हमला किया. जान बचाने के लिए उसके सैकड़ों नाविक समुद्र में कूद गए.

शार्क मछलियों से भरे इस समुद्री इलाक़े में नाविकों को एसओएस की प्रतिक्रिया का इंतज़ार था. मगर कोई उनकी खोजख़बर लेने नहीं आया.

जुलाई 1945 के अंतिम दिनों में यूएसएस इंडियापोलिस एक गुप्त मिशन पर था. वह तिनियान के प्रशांत द्वीप पर मौज़ूद अमरीकी क्लिक करें बमवर्षक बी-29 को पहले परमाणु बम के टुकड़े देने गया था.

काम पूरा कर लौट रहे इस युद्धपोत पर उस वक़्त 1197 लोग सवार थे. जब उन पर हमला हुआ, तो वे पश्चिम में फिलिपिंस के लेयत की तरफ़ जा रहे थे.

30 जुलाई 1945 की आधी रात बिना किसी चेतावनी के जहाज़ से पहला टॉरपीडो लगा. उस समय ब्रिज पर 19 साल के क्लिक करें नाविक लिओल डीन कॉक्स ड्यूटी पर थे. आज वे 87 साल के हैं. कॉक्स के मन में इस टॉरपीडो हमले की यादें अभी भी ताज़ा हैं.

पहला हमला

"उस साफ़ पानी में आप शार्कों को चक्कर काटते देख सकते थे. वे हर क्षण बिजली की गति से आतीं और एक नाविक को लेकर नीचे चली जातीं. ऐसे ही एक शार्क मेरे पास से एक नाविक को ले गई. वह चीख-चिल्ला रहा था."

लिओल डीन कॉक्स, इंडियानापोलिस के नाविक

वो कहते हैं,''मैं ऊपर हवा में चला गया. वहां पानी नहीं था, मलबा, आग और सब कुछ ऊपर की ओर आ रहा था. हम पानी की सतह से 25 मीटर ऊपर थे. एक ज़ोरदार धमाका हुआ. इसके बाद दूसरा हमला हुआ.''

जापानी पनडुब्बी से छोड़ी गई दूसरी टॉरपीडो ने क्लिक करें जहाज़ को क़रीब आधा तोड़ दिया. इसके बाद जहाज़ को छोड़ देने का आदेश आया.

''मैं मुड़ा और पीछे देखा तो जहाज़ डूब रहा था. लोग कूद रहे थे और चार प्रोपेलर अभी भी चल रहे थे.''

''610 फ़ुट लंबा जहाज, जिसमें दो फुटबाल के मैदान समा सकते हैं, केवल 12 मिनट में डूब गया. वह लुढ़का और पानी में समा गया.''

पनडुब्बियों का पता लगाने वाला सोनार यंत्र इंडियानापोलिस पर नहीं था. जहाज के कप्तान चार्ल्स मैकवे ने एक रक्षक दल की मांग की थी लेकिन उनकी मांग नहीं मानी गई.

अमरीकी नौसेना यह पता लगा पाने में नाकाम रही कि इलाक़े में जापानी पनडुब्बियां अभी भी सक्रिय थीं. इंडियानापोलिस जिस समय डूबा उस समय वह प्रशांत महासागर में अकेला था.

कॉक्स के मुताबिक़,''मैंने जीवनरक्षक बेड़ा कभी नहीं देखा. मैंने अंत में कुछ लोगों के चीखने-चिल्लाने, सिसकने, कराहने और तैरने की आवाजें सुनी. मैं 30 लोगों के एक समूह के साथ मिल गया.''

''हमने सोचा कि अगर हम कुछ दिन के लिए बाहर आते हैं, तो वे हमें पकड़ लेंगे लेकिन हमें बचाने कोई नहीं आया. हालांकि डूबने से पहले इंडियानापोलिस ने कुछ एसओएस सिग्नल भेजे थे. नौसेना ने उन्हें गंभीरता से नहीं लिया. जहाज़ के सही समय पर न पहुँच पाने को भी गंभीरता से नहीं लिया गया.''

शार्कों का समूह

यूएसएस इंडियानापोलिस

टॉरपीडो के हमले में ज़िंदा बचे क़रीब नौ सौ लोग प्रशांत महासागर में समूहों में बहने के लिए छोड़ दिए गए थे. समुद्र की लहरों के नीचे एक ख़ामोश और अनजान ख़तरा भी था. सैकड़ों शार्क बचे हुए लोगों की तरफ़ बढ़ रही थीं.

''हम आधी रात को डूबे थे. मैंने पहली शार्क सुबह के बाद दिन के उजाले में देखी. वह बहुत बड़ी थी. मैं कसम खाकर कहता हूं कि उनमें से कुछ 15 फ़ीट तक लंबी थीं. वे लगातार वहाँ बनी हुई थीं और शवों को खा रही थीं. भगवान का शुक्र है कि वहाँ बहुत से शव थे लेकिन जल्द ही वे जिंदा लोगों के लिए भी आने लगीं.''

कॉक्स कहते हैं,''हर दिन और रात हम तीन-चार लोगों को खो रहे थे. हम हमेशा ख़ौफ़ में थे, क्योंकि वो लगातार दिखाई दे रही थीं.''

वो कहते हैं,''वे आतीं और टक्कर मारती थीं. मुझे भी कई बार टक्कर मारी. ऐसे में मुझे नहीं पता था कि वे मुझ पर कब हमला करेंगी.''

शार्कों ने जब हमला किया तो उनमें से कुछ लोगों ने उन्हें लात मारी और चिल्लाए. तब फ़ैसला हुआ कि एक साथ चिपके रहना ही बेहतर बचाव है. मगर हर हमले के साथ ही पानी में ख़ून के बादल, चिल्लाहट और छींटे उठने से और शार्क आ सकती थीं.

वो कहते हैं,''उस साफ़ पानी में आप शार्कों को चक्कर काटते देख सकते थे. वे हर क्षण बिजली की गति से आतीं और एक नाविक को लेकर नीचे चली जातीं. ऐसे ही एक शार्क मेरे पास से एक नाविक को ले गई. वह चीख-चिल्ला रहा था.''

और भी थे ख़तरे

"610 फ़ुट लंबा जहाज, जिसमें दो फुटबाल के मैदान समा सकते हैं, केवल 12 मिनट में ही डूब गया.वह लुढ़का और पानी में समा गया"

लिओल डीन कॉक्स, इंडियापोलिस के नाविक

वहाँ शार्क ही मुख्य ख़तरा नहीं थीं. लोग चिलचिलाती धूप और बिना खाए-पिए कई दिन रहने और पानी की कमी की वजह से मर रहे थे. लाइफ जैकेट में पानी समा गया था और इससे भी बहुत से लोग डूब गए.

कॉक्स कहते हैं,''हम मुश्किल से ही अपना चेहरा पानी से बाहर रख सकते थे. मेरे कंधे पर फफोले पड़ गए थे. बहुत गर्मी थी. हम अंधेरे के लिए प्रार्थना करते थे. जब अंधेरा होता था, तो हम उजाले के लिए प्रार्थना करते थे क्योंकि अंधेरे में बहुत तेज़ ठंड होती थी. हमारे दांत किटकिटाने लगते थे.''

जिंदा रहने के लिए संघर्ष, पीने के पानी की कमी और शार्कों का ख़ौफ. अगर कुछ लोग इनसे बचे भी तो वो बेहोश हो जाते थे. बहुत से लोगों को मतिभ्रम हो गया. वे क्षितिज के पार द्वीप की कल्पना करने लगे. उन्हें लगता था कि वे दोस्त पनडुब्बियों के संपर्क में हैं जो उन्हें बचाने आ रही हैं. कॉक्स बताते हैं कि एक नाविक को विश्वास था कि इंडियानापोलिस डूबा नहीं है. वह तैर रहा है और उनकी पहुंच में हैं.

कॉक्स कहते हैं कि पीने का पानी जहाज़ के दूसरे तल पर रखा था. हमारा एक साथी विभ्रम का शिकार था. उसने तय किया कि वह पीने का पानी लेने नीचे दूसरे तल पर जाएगा और नीचे चला गया. जब बाहर आया तो बोला-कितना अच्छा और ठंडा पानी था, हमें थोड़ा पानी पीना चाहिए.

वह खारा पानी पी रहा था. कुछ देर बाद ही उसकी मौत हो गई.

चौथे दिन संयोग से नौसेना के एक जहाज ने पानी में कुछ लोगों को देखा. उस समय कॉक्स के समूह में दस लोग थे.

शुरू में तो उन्हें लगा कि ऊपर उड़ रहे जहाज ने उन्हें देखा नहीं है लेकिन सूर्यास्त से पहले अचानक बड़ा नौसैनिक जहाज आया. उसने अपनी दिशा बदली और उनके समूह के ऊपर से उड़ा.

बचाव दल

यूएसएस इंडियानापोलिस

अमरीकी नौसेना ने इस हादसे के लिए कैप्टन मैकवन को ज़िम्मेदार ठहराया. वे हादसे में जिंदा बच गए थे. उन्हें सालों घृणा से भरी चिट्ठियां मिलती रहीं.

कॉक्स बताते हैं, ''जहाज में सवार साथियों ने हमारी ओर हाथ हिलाया. यह देखकर हमारी आंखों में आंसू आ गए और रोएं खड़े हो गए और हम जान गए कि हम बच गए हैं. हमें लगा कि हमें खोज लिया गया है. वह मेरे जीवन का सबसे खुशनुमा पल था.''

नौसेना का जहाज तेजी से वहां पहुंचा और नाविकों को खोजना शुरू किया. वह याद करते हैं, ''अंधेरा हो चुका था और बादलों को चीरती एक तेज़ रोशनी नीचे आई. मुझे लगा कि परियां आ रही हैं. लेकिन यह एक बचाव करने वाला जहाज़ था. इसमें नाविकों को उम्मीद की किरण नज़र आई. उन्हें लगा कि कोई उन्हें तलाश रहा है.''

''रात में किसी समय मुझे लगा कि कोई मजबूत हाथ मुझे ऊपर एक छोटी सी नाव में खींच रहा है. यह लगना कि मैं बचा लिया गया हूं, ऐसे वक़्त में सबसे अच्छी भावना हो सकती है.''

इंडियानापोलिस के 12 सौ कर्मचारियों की टीम में केवल 317 लोग बचे थे.

अमरीकी नौसेना ने इस हादसे के लिए कैप्टन मैकवन को ज़िम्मेदार ठहराया. वे हादसे में जिंदा बच गए थे. उन्हें सालों घृणा से भरी चिट्ठियां मिलती रहीं. 1968 में उन्होंने ख़ुदकुशी कर ली. कॉक्स समेत हमले में ज़िंदा बचे लोगों ने अपने कैप्टन को निर्दोष साबित करने के लिए अभियान चलाया, जो इंडियानापोलिस के डूबने के क़रीब 50 साल बाद तक चलता रहा.

बचाए जाने के बाद कुछ हफ्ते कॉक्स ने अस्पताल में गुज़ारे. उनके बाल, हाथों की उंगुलियों के नाखून, पैरों की उंगुलियों के नाखून गिर गए. वह कहते हैं कि सूर्य की रोशनी और खारे पानी की वजह से वे मुरब्बा बन गए थे. इस हादसे के निशान अब भी हैं.

वह कहते हैं,''मुझे हर रात सपना आता है. ज़रूरी नहीं कि यह पानी में ही हो लेकिन मैं बेचैनी के साथ दोस्तों को तलाशता हूं. यह मेरी विरासत का हिस्सा है. मुझे हर रोज़ चिंता होती है ख़ासकर रातों में. लेकिन मैं इसके साथ ही जी रहा हूँ. इसके साथ सो रहा हूं. मैंने इसके साथ जीना सीख लिया है.''

(बीबीसी हिंदी के क्लिक करें एंड्रॉएड ऐप के लिए क्लिक करें. आप हमें क्लिक करें फ़ेसबुक और क्लिक करें ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं)

इसे भी पढ़ें

टॉपिक

BBC © 2014 बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.