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जालसाज़ी की कला में माहिर कैसे हो जाते हैं छू मंतर

 सोमवार, 15 जुलाई, 2013 को 10:20 IST तक के समाचार
कलाकृतियों की जालसाज़ी

महान कलाकृतियों की जालसाज़ी का कारोबार बढ़ता ही जा रहा है.

जार्जीयाना एडम्स बता रही हैं कि विश्वप्रसिद्ध कलाकृतियों की जालसाज़ी का अरबों डॉलर का कारोबार किस तरह फलफूल रहा है और ख़रीददार क्यों इतनी आसानी से इन जालसाज़ों के जाल में फँस जाते हैं.

अभी हाल ही में जर्मनी और इसराइल की पुलिस ने छापे मारकर जर्मनी में छह और इसराइल में 18 कलाकृतियों के जालसाज़ों को गिरफ्तार किया. दोनों देशों की पुलिस ने अपनी इस कार्रवाई से कलाकृतियों की जालसाज़ी करने वाले गिरोह को बड़ा झटका पहुँचाया है.

पुलिस के अनुसार इस गिरोह ने रूस के कलाकार की करीब 400 कृतियों की नकली कृति बना रखी थी. इस कलाकार की कृतियाँ अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेहद मँहगी बिकती रही हैं. बाजार में उतारी गई इन 400 जाली कृतियों में दो कृतियों की कीमत 20 लाख यूरो से ज्यादा है. इस कृति को जर्मनी की एक बंद हो चुकी कलादीर्घा के माध्यम से बेचा जा रहा था.

अभी दो साल पहले ही जर्मन पुलिस ने जालसाज़ों के एक गिरोह का भण्डफोड़ किया था. इस गिरोह ने यूरोप के आधुनिक कलाकारों फर्नांड लेगर और ग्योर्गेस ब्राक की तस्वीरों की नकल बना रखी थी. इस मामले में जालसाज़ वोल्फगांग बेलत्राची को छह साल की सजा हुई है.

दूसरी तरफ अमरीका में न्यूयॉर्क की सबसे पुरानी कलादीर्घा के माध्यम से दर्जनों जाली कलाकृतियों के बेचे जाने से बहुत ज़्यादा हंगामा मचा हुआ है. इस कलादीर्घा को पिछले साल अचानक ही बंद कर दिया गया. इस कलादीर्घा पर आरोप लगाए गए थे कि यह जैकसन पोलॉक, मार्क रोथको और विलेम डी कूनिंग जैसे कई महँगे अमरीकी कलाकारों की संदिग्ध कलाकृतियाँ बेच रहा है.

इस कलादीर्घा के ख़िलाफ अदालत में कम से कम छह मामले दायर किये गये है. इनमें से एक मामला तो 50 मिलियन डॉलर का है जिसे एक पूर्व ख़रीददार ने दायर किया है.हालाँकि कलादीर्घा ने इस बात से इनकार किया है कि उसने किसी तरह की गलती की है.

ये मामले तो बस कुछ नमूने मात्र हैं. पुलिस का अनुमान है कि नकली कलाकृतियों का सालाना कारोबार करीब कई अरब डॉलर का हो चुका है. यह मामला अब इतना गंभीर हो चुका है कि इंटरपोल ने पिछले साल इस विषय पर अपना पहला सम्मेलन किया था.

जालसाज़ी की कला

जाली कलाकृतियों के निर्माण में आई बढ़ोत्तरी के कारणों को समझना ज़्यादा मुश्किल नहीं है. कलाकृतियों की कीमतों में भारी बढ़ोत्तरी के कारण इसका फायदा उठाने की इच्छा बहुत स्वाभाविक है. बीसवीं सदी की कलाकृतियों की कीमतों में तो और भी ज़्यादा उछाल आया है. ध्यान रहे कि प्राचीन श्रेष्ठ कलाकारों की कृतियों से ज़्यादा कहीं ज़्यादा आसान होता है बीसवीं सदी के कलाकारों की कृतियों की नकल बनाना. कालनिर्धारण तकनीक और तकनीकी विश्लेषण के कारण पुरानी कलाकृतियों में की जाने वाली जालसाज़ी को पकड़ना अब काफी आसान भी हो गया है.

पुरानी कलाकृतियों का कालनिर्धारण काफी कठिन होता है. 2006 में ब्रितानी सम्पूर्ण कला जगत को उस वक़्त शर्मिंदा होना पड़ा जब उत्तरी इंग्लैंड के बोल्टन स्थित एक साधारण काउंसिल हाउस में रहने वाले एक परिवार ने स्थानीय कला संग्रहालय को खड़िया की बनी एक छोटी मूर्ति को 14वीं सदी की मिस्र की प्राचीन कलाकृति बताकर 7,50,000 डॉलर में बेच दिया था.

इस जालसाज़ी के उजागर होने के पहले ‘अमारा प्रिंसेस’ नाम की इस मूर्ति को ब्रिटिश म्यूजियम ने प्रमाणित कर दिया था. इसे क्रिस्टी नीलामी घर के माध्यम से बेचा गया था. इसे दो सरकारी संस्थाओं से वित्तीय सहायता प्राप्त थी और कर में छूट भी दी गई थी. प्रतिष्ठित कला पत्रिका दि क्लिक करें बर्लिंगटन मैगज़ीन में इसे एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देखा गया था.

किसी कलाकृति का उद्गम स्थान यानी उसका इतिहास उसे खरीदने वालों को यकीन दिलाता है कि वह कलाकृति असली है. बोल्टन के जालसाज़ों ने इस कलाकृति से जुड़े फर्जी दस्तावेजों की लम्बी फेहरिस्त बना रखी थी. जालसाज़ों ने दो विश्वयुद्धों को दौरान पूरी दुनिया में मची अफरा-तफरी का काफी लाभ उठाया था. अभी हाल ही में जर्मनी में नतालिया गोंचारोवा और वैसिली कैंडिंस्की की कलाकृतियों को निशाना बनाया गया था.

रूसी अवांगार्द कलाकृतियों क एमटी अब्राहम फाउण्डेशन के अध्यक्ष आमिर कबीरी कहते हैं, “1932 से पेत्रोस्तिका के समय तक अवांगार्द कलाकृतियों के व्यापार, संग्रह या प्रदर्शन पर पाबंदी थी. उन 50 सालों में इस बात से जालसाज़ों को नकली दस्तावेज बनाने में काफी मदद मिली क्योंकि असली दस्तावेज न के बराबर ही रहे होंगे.”

साम्यवाद के पतन के बाद रूसी ख़रीददारों में अपनी कला धरोहरों को ख़रीदने की होड़ लग गई थी. उनके पास इसके लिए पर्याप्त साधन भी थे. कैंडिंस्की की कलाकृति की कीमत का विश्व रिकार्ड 2 करोड़ डॉलर से ज़्यादा है और गोंचारोवा की कीमत का विश्वरिकार्ड 1 करोड़ डॉलर से ज़्यादा है. यानी जालसाज़ी में होने वाला मुनाफा काफी ललचाने वाला है.

ख़रीदार रहें सावधान

क्रिस्टी

कलाकृतियों की असलियत को लेकर विशेषज्ञों में भी मतभेद रहता है.

जालसाज़ जालसाज़ी क्यों करते हैं यह समझना तो आसान है लेकिन ख़रीदार इनके हाथों इतनी आसानी से कैसे ठगे जाते हैं ! अक्सर इसके पीछे भी वही कारण होता है जो जालसाज़ों को नकली कलाकृति बनाने के लिए प्रेरित करता हैं. यह कारण है लालच, या फिर मोलतोल का लाभ उठाने की इच्छा. 2007 में कला आलोचक जेम्स फेंटन ने लिखा था, “हम जालसाज़ों का सबसे आसानी से तभी शिकार बनते हैं जब हम खुद किसी महान कलाकृति को ख़रीदते वक़्त किसी को धोखा देना चाहते हैं.”

संदिग्ध कलाकृतियाँ की कीमत अक्सर ललचाने वाली होती है. जब तक कि लोगों को पता चले कि वो ठगे जा चुके हैं उन्हें यही लगता है कि वो भाग्यशाली थे और उन्होंने किसी और से पहले यह कलाकृति कम दामों में झटक ली. ऐसा सोचने वाले पूरी तरह ग़लत भी नहीं होते. कई बार स्थानीय स्तर पर बिकने वाली असली कलाकृतियों भी मोलतोल से सस्ते दाम में मिल जाती हैं.

चोरी और गायब हुई कलाकृतियों के आंकड़े रखने वाली संस्था आर्ट लॉस रजिस्टर के क्रिस मैरिनेलो कहते हैं, “ख़रीददार अच्छी कलाकृति को महँगे दामों में ख़रीदने से पहले सबसे बुनियादी एहतियात भी नहीं बरतते. वो जितने में अपना घर खरीदते हैं उससे ज़्यादा पैसे ख़र्च करने के बावजूद ख़रीदारी से पहले ज़रूरी पड़ताल नहीं करते.”

नकली कलाकृतियों की ख़रीदारी की दूसरी बड़ी वजह है, उनको पाने की तीव्र बेचैनी जिसके कारण ख़रीदार अपनी आँख के सामने पड़े सबूत को नहीं देख पाते.

इसके अलावा विशेषज्ञता का अभाव भी नकली कलाकृतियों की ख़रीदारी को बढ़ावा देता है. किसी भी कलाकृति के बारे में विशेषज्ञों की राय अलग-अलग होती है. यहाँ तक की कई बार आधुनिक कलाकृतियों के बारे में भी कलापारखी एकमत नहीं होते. जैसे, क्रिस्टी अभी भी मानती है कि रूसी रईस को उसने 2005 में जो कलाकृति बेची है वो उन्नीसवीं सदी के कलाकार बोरिस कुस्तुदिएव की है जबकि अदालत ने तमाम विशेषज्ञों की राय सुनने का बाद इसे नकली करार दिया था. अदालत ने क्रिस्टी को खरीददार को उसके पैसे वापस करने के साथ ही डेढ़ करोड़ डॉलर अतिरिक्त देने के लिए कहा था.

याद रहे कि प्रसिद्ध कलाकार थियोडोर रूसो ने कहा था, “हम केवल बुरी नकल के बारे में बात कर सकते हैं, ऐसी जालसाज़ी जिसे पकड़ा जा चुका है. लेकिन अच्छी जालसाजियाँ अभी भी लोगों की दीवार की शोभा बढ़ा रही हैं.”

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