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क्यों महत्वपूर्ण हैं ईरान के आम चुनाव?

 शुक्रवार, 14 जून, 2013 को 08:49 IST तक के समाचार

शुक्रवार के दिन क्लिक करें ईरान के लोग नया राष्ट्रपति चुनने के लिए मतदान करने जा रहे हैं. इन चुनाव को विपक्ष विहीन मुकाबले के तौर पर देखा जा रहा है.

चुनाव में 678 क्लिक करें उम्मीदवारों ने दावेदारी की थी जिनमें से आठ उम्मीदवार ही आख़िरी मुकाबले में रह गए हैं. हालांकि दो उम्मीदवार ऐसे भी हैं जिन्होंने दावेदारी वापस ले ली है.

इन चुनाव में वहाँ ऐसा कोई दल नहीं है जिसे पारंपरिक अर्थों में राजनीतिक पार्टी कहा जा सके लेकिन सात उम्मीदवार ऐसे हैं जो ईरान की राजनीति में असर रखते हैं.

चार उम्मीदवार रूढ़िवादी हैं और ईरान के सबसे बड़े नेता आयतुल्लाह ख़मेनेई के वफ़ादार माने जाते हैं. शेष तीन उम्मीदवारों को सुधारवादी कहा जा सकता है.

मुकाबले के अहम दावेदार

क्लिक करें सईद जलीली दक्षिणपंथी रुझान वाले नेता हैं. वे मौजूदा परमाणु वार्ताकार हैं और सरकारी निज़ाम दक्षिणपंथियों के नियंत्रण में देखना चाहते हैं.

क्लिक करें क्या दूसरे अहमदीनिजाद साबित होंगे जलीली?

अली अकबर विलायती मुख्यधारा की सियासत के रुढ़िवादी उम्मीदवार हैं. वे विदेश मंत्री भी रह चुके हैं और परमाणु वार्ता के मसले पर ईरान के रवैए को बदलना चाहते हैं.

मोहम्मद बाकर कलीबाफ मुख्यधारा के रुढ़िवादी नेता हैं. वे तेहरान के मेयर भी हैं और खुद को व्यावहारिक सियासी शख्सियत के तौर पर देखा जाना पसंद करते हैं.

रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के पूर्व कमांडर मोहसिन रेज़ाई दक्षिणपंथी रुझान वाले मध्यमार्गी नेता माने जाते हैं. वे आर्थिक संघवाद के जरिए सामाजिक सुधार करना चाहते हैं.

वामपंथी रुझान वाले मध्यमार्गी नेता हसन रहानी परमाणु वार्ताकार भी रह चुके हैं. उन्हें मध्यमार्गियों और सुधार समर्थक धड़े की नुमांइदगी करने वाले नेता के तौर पर भी देखा जाता है.

क्या राष्ट्रपति अहमदीनेजाद दोबारा मैदान में हैं?

राष्ट्रपति क्लिक करें महमूद अहमदीनेजाद पहले ही अपने दो लगातार कार्यकाल पूरा कर चुके हैं. इसलिए वे इन चुनाव में भाग नहीं ले सकते.

साल 2009 के विवादास्पद राष्ट्रपति चुनाव में उनकी जीत को वहाँ के सबसे बड़े धार्मिक नेता आयतुल्लाह ख़मेनेई ने अपनी रज़ामंदी दी थी.

तब सार्वजनिक तौर पर हुए विरोध प्रदर्शनों को हिंसक तरीके से कुचल दिया गया था लेकिन बाद के चार साल में दोनों के रिश्ते सार्वजनिक तौर पर खराब होते चले गए.

इस बार अहमदीनेजाद के समर्थक माने जाने वाले असफंदियार रहीम मशेई मुकाबले के शुरुआती दौर में ही दौड़ से बाहर हो गए.

चुनाव के प्रमुख मुद्दे

ईरान के परमाणु कार्यक्रम की वजह से सालों से चले आ रहे प्रतिबंधों के कारण मुल्क की बिगड़ती माली हालत का सवाल ज्यादातर मतदाताओं को सता रहा है.

सभी उम्मीदवारों ने मतदाताओं से अर्थव्यवस्था में सुधार का वादा किया है और राष्ट्रपति अहमदीनेजाद के कामकाज की आलोचना भी की है.

चुनाव में रूढ़िवादियों का ज़ोर भ्रष्टाचार से लड़ने, निजीकरण के विस्तार और प्रबंधन में सुधार जैसे आंतरिक समाधान पर है.

हालांकि सुधारवादी धड़ा बाकी दुनिया के साथ ईरान के रिश्ते सुधारने पर थोड़ी सावधानी के साथ बात करता है.

यह भी महत्वपूर्ण है कि परमाणु कार्यक्रम पर किसी भी उम्मीदवार ने सवाल नहीं उठाया है जो कि अर्थव्यवस्था के पंगु बनने की सबसे बड़ी वजह है.

चुनावी तौर-तरीके

अगर इन चुनाव में किसी उम्मीदवार को 50.1 फीसदी मत नहीं मिल पाते हैं तो 21 जून को सबसे बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले दो प्रमुख उम्मीदवारों के बीच दोबारा चुनाव कराए जाएंगे.

तीन अगस्त को आयतुल्लाह ख़मेनेई नए राष्ट्रपति के शपथ ग्रहण से पहले इसके नतीजों को मंजूरी देंगे.

इससे पता चलता है कि राष्ट्रपति ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता के मातहत ही काम करते हैं.

निष्पक्ष चुनाव का सवाल

ईरान का निज़ाम कहता है कि मुल्क का चुनाव निष्पक्ष होता है लेकिन क्लिक करें विपक्ष की राय इस बारे में पूरी तरह से अलग है.

इस इस्लामी गणराज्य का कहना है कि उसकी राजनीतिक व्यवस्था ‘धार्मिक लोकतंत्र’ की तरह काम करती है और तमाम यथार्थपरक मापदंडों पर यहाँ खुले चुनाव होते हैं.

जिसमें राजनीतिक प्रतिद्वंदिता और बहस मुबाहिसों के लिए भी जगह होती है.

विपक्ष अभिव्यक्ति की आजादी के प्रति लोगों की ख्वाहिश और निष्पक्ष चुनाव के लिए जरूरत के तौर पर राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने के अधिकार को रेखांकित करता है.

मतदाता के निर्णय को किस तौर पर देखा जाए?

हालांकि इस बारे में कोई भरोसेमंद आंकड़ा उपलब्ध नहीं है लेकिन एक अनुमान के मुताबिक ईरान में 30 फीसदी लोग आम तौर पर वोट ही नहीं डालते.

15 फीसदी लोग सत्तारूढ़ रूढ़िवादी निज़ाम के वफादार मतदाता माने जाते हैं. तकरीबन इतने ही लोग सुधारों का भी समर्थन करते हैं.

शेष 40 फीसदी ऐसे लोग हैं जो आखिरी लम्हों में अपने वोट का फैसला करते हैं.

ये किसी सियासी धड़े या विचारधारा के लिए वफादार नहीं होते और ये लोग ज्यादातर चली आ रही यथास्थिति के खिलाफ वोट करते हैं.

ज्यादातर उम्मीदवार इन मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करना चाहते हैं.

क्या रुढ़िवादी धड़ा अपनी पकड़ बरकरार रख पाएगा?

सत्तारूढ़ रूढ़िवादी धड़े की पकड़ पूरे निज़ाम पर ही नहीं बल्कि सरकारी संस्थानों पर भी है.

इन चुनाव से यह साफ हो जाना चाहिए कि वे अपनी पकड़ और मतदाताओं का समर्थन किस हद तक बरकरार रख पाएंगे.

दूसरे धड़ों के प्रति उनकी सहिष्णुता पर भी विपक्ष करीब से नजर रखेगा.

उग्र विपक्ष की राय

ईरान के पिछले चुनाव में यह देखा गया है कि उग्र माने जाने वाला विपक्ष चुनाव का बहिष्कार करता रहा है.

उनका कहना है कि इस्लामी गणराज्य ईरान निष्पक्ष चुनाव कराने में समर्थ नहीं है और वे तभी इसमें भागीदारी करेंगे जब राजनीतिक दलों को इसमें खुले तरीके से शिरकत करने की इजाजत दी जाएगी.

वे कहते हैं कि जिन उम्मीदवारों को व्यवस्था चुनाव लड़ने की इजाजत देती है वे सर्वोच्च धार्मिक नेता के चापलूस होते हैं और किसी के भी चुनाव जीतने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा.

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