सेना के साथ नाज़ुक रिश्तों की डोर संभाल पाएँगे नवाज़ शरीफ़?

  • 26 मई 2013
तीसरी बार पाकिस्तान की सत्ता संभालने जा रहे शरीफ का रास्ता मुश्किलों भरा है

किसी और के मुकाबले नवाज शरीफ ज्यादा बेहतर जानते हैं कि पाकिस्तान की सेना कितनी ताकतवर है. 1999 में सेना ने उनका तख्तापलट किया गया था.

अब यह सवाल उठ रहा है कि जब वो एक बार फिर से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री होंगे तो देश कौन चलाएगा?

पाकिस्तान में इस तरह की बातें हो रही हैं कि क्या नवाज ने अपने अतीत से कोई सबक सीखा है.

1990 में जब वो दो तिहाई बहुमत के साथ आए थे तब उन्होंने एक सेना अध्यक्ष को हटा दिया था और दूसरे को हटाने की तैयारी कर रहे थे.

लेकिन दूसरे वाले सेना अध्यक्ष ने नाटकीय तरीके से तख्ता पलट करके उन्हें सत्ता से बेदखल कर दिया और उन्हें निर्वासन में सउदी अरब जाना पड़ा.

अपने पिछले कार्यकाल में जब वो प्रतिदंद्वी देश भारत के साथ संबध ठीक करने की कोशिशों में जुटे ही थे कि तभी सेना के जनरलों ने उनकी मेहनत पर पानी फेरते हुए कारगिल की लड़ाई छेड़ दी. नवाज़ शरीफ का कहना है कि ये सब उनकी पीठ पीछे किया गया.

अब एक बार फिर शरीफ सत्ता में आएँगे. हां, ये बात अलग है कि इस बार उनके पास 1990 से थोड़ा ही कम बहुमत है. लेकिन इस बार उनके सामने जो चुनौतियां हैं वो पिछली बार के मुकाबले ज्यादा हैं.

सेना से संतुलन

सैन्य मामलों की जानकार आयेशा सिद्दीका आगा कहते हैं कि अभी कुछ दिनों तक नवाज शरीफ का 'हनीमून पीरियड' चलेगा.

वो कहते हैं, “सेना प्रमुख कयानी छह महीने बाद रिटायर होने वाले हैं. जो भी नया सेना प्रमुख बनेगा उसे सहज होने में कुछ महीनों का वक्त लगेगा.”

हालांकि ऐसा हो सकता है कि शरीफ को मुसीबत की लहरों से पहले ही खेलना पड़े.

सेना से संतुलन बनाना शरीफ की बड़ी चुनौती होगी.

शरीफ के सामने सबसे बड़ी चुनौती डूबती हुई अर्थव्यवस्था है.

इसके लिए जरूरी है कि शरीफ देश के भू-रणनीतिक महौल को दुरुस्त करें. अभी तक इसमें सेना का ही नियंत्रण है.

आर्थिक विकास

आर्थिक विकास के लिए सबसे अहम बात है –शांति और सुरक्षा—और ये दोनों पाकिस्तानी तालिबान के गतिविधियों पर निर्भर है.

पाकिस्तानी तालिबान कई चरमपंथी संगठनों के नेटवर्क का एक हिस्सा है जो पाकिस्तान में बने सुरक्षित ठिकानों से अफगानिस्तान में अस्थिरता फैलाता रहा है. कई लोग इसे पाकिस्तानी सेना का 'रणनीतिक कोष' भी कहते हैं.

शरीफ पहले ही संकेत दे चुके हैं कि वो तालिबान से बात करना चाहेंगे क्योंकि अतीत में भी संघर्ष से कुछ हासिल नहीं हुआ है.

फाटा(पाकिस्तान्स फेडरली एडमिनिस्टर्ड ट्राइबल एरियाज) के पूर्व सुरक्षा प्रमुख ब्रिगेडियर मुहम्मद शाह कहते हैं कि बातचीत का भी कोई हल नहीं निकला है. वो मानते हैं कि शरीफ जल्द ही इस बात को समझ जाएंगे.

वे कहते हैं, “सेना चरमपंथियों के पनाहगाहों को खत्म करना चाहती है. और वो ऐसा कर भी सकती है लेकिन वो चाहती है कि इस कार्रवाई को संपूर्ण राजनीतिक समर्थन हासिल हो.”

दोहरा मापदंड

अगर सेना की यही सोच है तो क्या ये बदलती नीति को दर्शाता है? रक्षा विशेषज्ञ डॉक्टर हसन अंसारी इस बात पर संदेह व्यक्त करते हैं.

वो कहते हैं कि शरीफ की तरह सेना भी भ्रम की शिकार है. रक्षा विशेषज्ञ डॉक्टर हसन अंसारी के मुताबिक, “सेना तालिबान के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए राजनीतिक मान्यता चाहती है लेकिन वो सभी चरमपंथी संगठनों से अपने संबंध खराब भी नहीं करना चाहते. क्योंकि उनका मानना है कि 2014 में जब अफगानिस्तान से नाटो की सेनाएं हटेंगी तो उन्हें उनकी जरूरत होगी. इसका मतलब ये हुआ कि “चरमपंथियों के बारे में सेना का दोहरा रवैया चलता रहेगा.”

पूर्व सेना प्रमुख परवेज मुशर्रफ ने ही 1999 में शरीफ का तख्तापलट किया था

सेना के साथ शरीफ के संबंधों का इम्तिहान उस वक्त भी होगा जब भारत के साथ व्यापार और निवेश को प्रोत्साहित करने की बात होगी. विशेषज्ञों का मानना है कि इससे कम समय में पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में जान आ सकती है.

पाकिस्तान की सेना भारत को दुश्मन समझती है जिसके साथ वो तीन बार सीधी लड़ाई और एक बार कारगिल में अप्रत्यक्ष जंग लड़ चुकी है. इसके अलावा कश्मीर में पिछले 15 सालों से छद्म युद्ध चल ही रहा है.

अतीत में जिसने भी भारत के साथ संबंध सुधारने की कोशिश की उसे सेना के विरोध का सामना करना पड़ा है. इस कड़ी में हाल ही में सत्ता से बाहर हुई पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी भी शामिल है.

बहुत से लोग ऐसे हैं जो मानते हैं कि ये स्थिति बहुत दिनों तक नहीं रहेगी.

अफगानिस्तान के प्रति रवैया

पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल तलत मसूद कहते हैं, “मेरा मानना है कि भारत को लेकर सेना का रवैया बदल रहा है. वो जानते हैं कि भारत के साथ तनाव का सबसे अहम मसला कश्मीर समस्या कभी नहीं सुलझ सकती है. इसलिए भारत के साथ लगातार तनाव से आर्थिक हितों को नुकसान पहुंचता है. साथ ही भारत के साथ साथ पश्चिमी देशों से भी लाभ उठाने की स्थिति में नहीं रहते.”

पश्चिमी देश खासतौर से अमरीका ये चाहता है कि दोनों परमाणु संपन्न देशों के बीच शांति कायम रहे.

अगर पाकिस्तान अफगानिस्तान में चरमपंथियों की मदद करता है तो भारत खुद को असुरक्षित महसूस करेगा ही और वो 2008 के मुंबई हमले में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करेगा.

भारत के साथ आर्थिक संबंध ठीक करना शरीफ की प्राथमिकता होगी लेकिन सेना की तरफ से अड़चन आ सकती है

जानकार मानते हैं कि इस मसले पर भारत को दी गई किसी भी तरह छूट सेना और उससे जुड़े गुटों को पसंद नहीं आएगी.

कुल मिलाकर स्थिति ये है कि शरीफ तनी हुई रस्सी पर चलेंगे. अगर इतिहास के हवाले से कहें तो साफ होता है कि वो सेना से नेतृत्व लेने का प्रयास करेंगे.

अगर वो ऐसा करते हैं तो वो कुछ हद तक इसलिए भी होगा क्योंकि ऐसा माना जा रहा है कि सेना के अंदर सत्ता हड़पने की भूख अब बची नहीं है. आर्थिक समस्याओं और देश के अलग थलग पड़ने की वजह से उनके अंदर तख्तापलट करने की काबिलियत भी नहीं है.

सेना से लेंगे अधिकार

कुछ जानकार बताते हैं कि शरीफ इस दिशा में काम पहले से ही शुरू कर चुके हैं.

हाल ही में दिए गए एक बयान में शरीफ ने कहा कि वो कारगिल हमले की जांच करवाएंगे. अब तक वो इस हमले के लिए परवेज मुशर्रफ और सेना के तत्कालीन कुछ दूसरे अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराते रहे हैं.

1999 में जब शरीफ का तख्तापलट हुआ था तब परवेज मुशर्रफ भी जनरल ही थे. लेकिन अब हालात बदल चुके हैं. मुशर्रफ अब पाकिस्तान के अंदर ही नजरबंद हैं. उन पर 2007 में बेनजीर भुट्टो को पर्याप्त सुरक्षा उपलब्ध न करा पाने के लिए मुकदमा चल रहा है. उसी साल चुनाव प्रचार के दौरान बेनजीर की हत्या कर दी गई थी.

कारगिल मसले के लिए देशद्रोह का आरोप लगाकर सेना के जनरलों पर मुकदमा चलाना सेना के लिए एक खतरनाक मिसाल तय करेगा.

आयेशा सिद्दीकी मानते हैं कि शरीफ इसी भय का इस्तेमाल कर विदेश नीति पर अधिक से अधिक नियंत्रण हासिल करने के लिए कर रहे हैं. अब तक इस पर सेना का नियंत्रण रहा है.

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