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वो मुर्दाघर जहाँ से लापता हो जाते हैं शव

 सोमवार, 27 मई, 2013 को 09:29 IST तक के समाचार
काहिरा

काहिरा के मुर्दाघर पर लोगों का संदेह बढ़ा है. वहां लापता शवों को ढूंढने की इजाज़त आसानी से नहीं मिलती

मिस्र के काहिरा में स्थित जाइनहोम मुर्दाघर के अधिकारियों पर आरोप लगते रहे हैं कि वे संदिग्ध हालात में हुई मौत को छिपाने के लिए शव परीक्षण की रिपोर्ट के साथ छेड़छाड़ कर रहे हैं. हालांकि देश की क्लिक करें पुलिस का कहना है कि अब वह प्रदर्शनकारियों पर गोली नहीं चलाती है.

आप जैसे ही क्लिक करें काहिरा के जाइनहोम मुर्दाघर में घुसेंगे, आपको दुर्गंध का सामना करना होगा. यहां की हवा में अजीब तरह की गर्मी के साथ ही खून और रसायन की गंध घुली-मिली सी मालूम होती है.

क्लिक करें मिस्र में हिंसा से हुई मौत को अक्सर राजनीतिक रंग दे दिया जाता है. कार्यकर्ताओं का कहना है कि पुलिस की बर्बरता पर पर्दा डालने के लिए शव परीक्षण और उसकी रिपोर्ट में गड़बड़ी होती है. जाइनहोम मुर्दाघर के भीतर मौजूद कर्मचारियों के सिर पर इस प्रक्रिया में मददगार साबित होने का इल्ज़ाम है.

कुछ हफ्ते पहले मैं अमल अब्बास के घर गया था. अमल सिर से लेकर पांव तक काले रंग का लिबास पहनकर शोक में डूबी हुई लग रही थीं. उनका कहना था कि उनके बेटे को पुलिस ने गोली मारी और मुर्दाघर के अधिकारियों ने उनके बेटे के शव को छिपा दिया.

सरकार विरोधी प्रदर्शनों में लगातार शिरकत करने वाले मोहम्मद पिछली जनवरी की एक शाम को प्रदर्शन में शामिल होने के लिए गए और उसके बाद वह लापता हो गए.

उनके परिवार वालों और दोस्तों ने कई हफ्तों तक उन्हें ढूंढने की कोशिश की. वे कई दफ़ा जाइनहोम भी गए और वहां उनकी तस्वीरें दिखाईं और उन्होंने यह ब्यौरा भी दिया कि उन्होंने कैसे कपड़े पहन रखे थे.

उनकी लाख मिन्नतों के बावजूद उन्हें अंदर जाने की इजाज़त नहीं मिली. लेकिन 10वीं बार जब उनके चाचा मुर्दाघर गए तो उन्हें अंदर जाने की इजाज़त मिल गई. वहां उन्होंने मोहम्मद का शव देखा, उनकी आंखों के बीच गोली लगने का निशान था.

अमल कहती हैं कि उनका बेटा भी पुलिस और मुर्दाघर के अधिकारियों द्वारा ऐसी मौत को गुप्त रखने की कोशिशों का शिकार हो गया.

काहिरा

लोगों का कहना है कि मुर्दाघर के अधिकारियों की मिली-भगत से पुलिस की बर्बरता छिप रही है

वह गुस्से में कहती हैं, “आखिर वे पूरे एक महीने तक मुर्दाघर में मेरे बेटे को रखकर क्यों छोड़ेंगे? हमने मोहम्मद के बारे में भी बार-बार पूछा था लेकिन उन्होंने कुछ भी नहीं बताया.”

मुर्दाघर के भीतर का नज़ारा कुछ और है. यहां कर्मचारी अपनी बेगुनाही की दुहाई दे रहे हैं. वे अपने काम से जुड़े आरोपों को सुनकर व्यथित हो जाते हैं और शिकायत करते हैं कि उनके पास सामानों की कमी है और कम कर्मचारियों के होने से दबाव भी ज्यादा है.

पूंजी की कमी

क्लिक करें राष्ट्रपति मोहम्मद मोरसी की सरकार को बजट संकट से भी जूझना पड़ रहा है. ऐसे में फॉरेंसिक और मुर्दाघरों में निवेश के पैसे की काफ़ी किल्लत है.कर्मचारियों की शिकायत है कि उन्हें अपने दस्ताने, उपकरण और रसायनों तक के लिए ख़ुद जेब ढीली करनी पड़ती है.

उनके काम में आने वाले माइक्रोस्कोप भी दो दशक पुराने हैं. ख़राब होने की वजह से एक्स-रे मशीन भी कोने में पड़ी हुई है. मुर्दाघर बेहद गंदा है और वहां कि जमीन पर जगह-जगह खून के धब्बे दिख रहे हैं.

मुर्दाघर के छोटे से रिसेप्शन में बैठकर मैंने तकनीशियन अम्र और अहमद से उनके उपकरणों के बारे में पूछा. अम्र दृढ़ता से कहते हैं, “हमारी मांग ज़्यादा नहीं है, हमने देखा है कि महंगे उपकरणों से क्या हो सकता है. हम बस इतना चाहते हैं कि हमारे उपकरण थोड़े आधुनिक हों. क्या ऐसी मांग ग़लत है?”

वह मुझसे बात कर रहे हैं और मुझे टूटी हुई खिड़की से किसी के रोने की आवाज़ सुनाई देती है. इस परिसर के बाहर एक औरत खड़ी हैं और मुर्दाघर के अधिकारी उन्हें अंदर नहीं जाने दे रहे हैं. यहां किसी भी तरह की संवेदना और सहानुभूति की कोई गुंजाइश नहीं है.

रिकॉर्ड मिलना मुश्किल

काहिरा

काहिरा के तहरीर स्क्वॉयर में मौजूद प्रदर्शनकारी

जाइनहोम में संसाधनों का संकट देखकर यहां आने वाले लोगों का दिल भर आता है. यहां शवों का रिकॉर्ड व्यवस्थित नहीं है.अक्सर परिवार वालों को कई शवों में से अपने परिचितों को ढूंढने की मशक्कत करनी पड़ती है और इसमें सफ़लता मिलने की गारंटी भी नहीं है.

एक डॉक्टर पुराने फ्रिजों की ओर इशारा करते हुए करते हैं कि एक मां को अपने मृत बच्चे की तलाश करने के लिए करीब 100 शवों को देखना पड़ेगा. उनका कहना है कि इस बीच यहां इतनी बदबू और शोर है कि वे ऐसा करने की इजाज़त नहीं देना चाहते.

मैं अमल के बारे में सोचने लगता हूं. उनके घर वालों ने भी उनके बच्चे को ढूंढने के लिए यह सब कुछ किया.

जब मैंने डॉक्टर से पूछा कि आखिर परिवार वालों को इतनी मशक्कत क्यों करनी पड़ती है तो उन्होंने एक नीले रंग की रिकॉर्ड बुक निकाल ली जिसका इस्तेमाल अज्ञात शवों के लिए किया जाता है.

वह कहते हैं, “मोहम्मद का शव जिस दिन यहां आया, उसे इसमें नोट किया गया है लेकिन एक बार जब शव को रख दिया जाता है तो फिर ध्यान नहीं रहता.”

बर्बरता

मैं उनसे कहता हूं कि उनके शरीर के घाव से संदेह तो ज़रूर होता होगा? इस पर वह कहते हैं कि उनके पास ऐसे कई मामले आते हैं. उनका अनुमान है कि हिरासत से निकलने पर पुलिस की बर्बरता से जुड़े 1000 से ज्यादा मामले काहिरा के फॉरेंसिक डॉक्टर एक साल में देखते हैं.

मिस्र

मिस्र में क्रांति के बावजूद लोगों की जिंदगी दूभर है

उनका कहना है कि ऐसे कई शव यहां आते हैं जिनमें बेल्ट, तार से पीटने और बिजली से जलाने के निशान होते हैं. उनका यह सवाल बिल्कुल खरा लगता है, “लेकिन हम क्या कर सकते हैं? सरकारी वकील के आदेश के बग़ैर हम शव परीक्षण भी नहीं कर सकते.”

जाइनहोम से निकलते हुए मेरी नज़र परिसर के भीतर मौजूद संगमरमर के दो खंभों पर पड़ती है. उस पर दर्जनों लापता लोगों की मुस्कराती हुई तस्वीरें और उनके नाम की फोटोकॉपी चिपकाई गई है.

अहमद महमूद हुसैन अप्रैल से लापता हैं. सामी अब्देल हाकिम फकहद और उनकी छोटी बेटी नवंबर से ही ग़ायब हैं. मुझे हैरानी होती है कि उनके परिवार के लोग मुर्दाघर का दरवाजा खटखटाएंगे तो उन्हें कैसी प्रतिक्रिया मिलेगी.

इतिहासकार खालिद फहमी के मुताबिक एक वक्त ऐसा था जब क्लिक करें मिस्र पेशेवर संस्थानों के लिहाज से अग्रणी था. खासतौर पर फॉरेंसिक विज्ञान के क्षेत्र में भी क्लिक करें मिस्र अपने पड़ोसी देशों से कमतर नहीं था.

लेकिन जाइनहोम की हालत को देखते हुए अंदाजा मिलता है यह देश नागरिकों के सम्मान को खासतौर पर मौत की अवस्था में भी बरकरार रखने में अक्षम है.

मुझे ऐसा लगता है कि भले ही चीज़ों को गोपनीय रखने की भरसक कोशिश की जा रही हो लेकिन क्रांति के बावजूद महमूद की दास्तान वहां के सरकारी तंत्र की असफलता का खुलासा करती है.

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