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झूठ पकड़ने वाली मशीन का सच!

 बुधवार, 22 मई, 2013 को 13:24 IST तक के समाचार

साल 2010 में भारत की क्लिक करें सुप्रीम कोर्ट ने नार्को टेस्ट को असांविधानिक ठहराते हुए इस पर रोक लगा दी थी.

ठीक इसी तरह भारत में अभियुक्त की मर्जी के खिलाफ पॉलिग्राफिक मशीन के इस्तेमाल की इजाजत कानून नहीं देता है.

भारत की सुप्रीम कोर्ट का सारा ध्यान जहां अभियुक्त की मर्जी पर है वहीं दुनिया के वैज्ञानिक इस मशीन के कारगर होने पर ही सवाल उठाते रहे हैं.

बहस पुरानी है. 1992 में रिलीज हुई फिल्म 'बेसिक इन्स्टिंक्ट' में साइकोपैथिक यानी सनकी किरदार की क्लिक करें भूमिका निभाने वाली शैरोन स्टोन ने भी इस टेस्ट के बारे में एक डॉयलॉग में कहा था, "अगर मैं दोषी होते हुए भी इस मशीन को धोखा देना चाहूँ तो ये मुश्किल नहीं होगा."

90 साल पहले बनाई गई झूठ पकड़ने वाली मशीन या लाइ डिटेक्टर का इतिहास ऐसे लोगों से भरा हुआ है जो इसे ठगने का हुनर जानते हैं.

इसीलिए वैज्ञानिक सवाल उठाते रहे हैं कि किसी के झूठ को पकड़ने का सबसे भरोसेमंद तरीका क्या हो सकता है.

ब्लड प्रेशर में उतार चढ़ाव

भारत में नार्को टेस्ट असंविधानिक करार दिया जा चुका है.

कैलिफोर्निया के बर्कले में 1921 में क्लिक करें पॉलिग्राफिक टेस्ट मशीन की खोज की गई थी.

शिकागो के नॉर्थ वेस्टर्न यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफेसर केन एल्डर कहते हैं, "बर्कले वो शहर था जिसके पुलिस चीफ अगस्त वॉल्मर हुआ करते थे. वॉल्मर ने पुलिस सुधारों और अमरीका में उसके कामकाज के तरीके में सुधार की अगुवाई करके उसके बूते बहुत शोहरत पाई थी."

उन्होंने बताया, "वह वास्तव में चाहते थे कि विज्ञान के जरिए पुलिस कानून के दायरे में रहकर काम करे. इसके लिए उन्होंने ‘थर्ड डिग्री’ वाले तौर तरीकों की बजाय इस पूछ-ताछ की इस मशीन का इस्तेमाल किया. थर्ड डिग्री वाले तरीके में लोगों को मार-पीट कर उनसे जानकारी जुटाई जाती थी."

बर्कले के ही पुलिस अधिकारी जॉन लार्सन ने पहली बार लाइ डिटेक्टर मशीन बनाई थी. यह मशीन ब्लड प्रेशर में आने वाले उतार-चढ़ाव पर आधारित थी.

मनोवैज्ञानिक विलियम माउल्टन मार्सटन ने इसकी संकल्पना दी थी. बाद में मार्सटन कॉमिक लेखक बन गए और उन्होंने वंडर मैन का किरदार गढ़ा.

वह मानते थे कि रक्त चाप में आने वाले बदलावों को मापकर झूठ पकड़ा जा सकता है.

पॉलिग्राफिक मशीन की साख

लाई डिटेक्टर टेस्ट

भारत में अभियुक्त को अपने विरुद्ध ही गवाही देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता.

आज जो लाइ डिक्टेटर मशीनें प्रचलन में हैं, वे दिल की धड़कनों, नब्ज़, साँसों और ब्लड प्रेशर में आने वाले बदलावों के आधार पर अपना काम करती हैं.

लेकिन पॉलिग्राफिक मशीन की साख को इसकी शुरुआत से ही चुनौती दी जाती रही है.

90 साल बाद आज भी पॉलिग्राफ मशीन को न तो वैज्ञानिक समुदाय ने और न ही कानून या राजनीति से जुड़े लोगों ने पूरी तरह से स्वीकार किया है.

भारत की सबसे बड़ी अदालत इसे तीन साल पहले ही खारिज कर चुकी है.

ऐसे उदाहरण मौजूद हैं जब जघन्य अपराधों की जांच के दौरान ये मशीन नाकाम हुई थी. साल 2003 में गैरी रिज्वे ने यह कबूल किया था कि उसने 49 महिलाओं की हत्या के बाद भी लाइ डिटेक्टर टेस्ट पास कर लिया था.

'नतीजों पर भरोसा खतरनाक'

"अगर दिमाग का कोई हिस्सा सक्रिय है तो हम यह नहीं कह सकते कि वह झूठ बोल रहा है. दिमाग का कोई हिस्सा एक साथ कई चीजें कर सकता है."

गोरिअंट रीज

रिज्वे को इस टेस्ट से 1987 में गुजरना पड़ा जबकि इसी मामले में एक निर्दोष आदमी पॉलिग्राफिक टेस्ट में नाकाम हो गया.

अमरीकी सेना के खुफिया अधिकारी जॉर्ज मास्के कहते हैं, "पॉलिग्राफिक टेस्ट विज्ञान पर आधारित नहीं है क्योंकि इसके तौर तरीके पूछ-ताछ करने वाले पुलिस अधिकारियों ने तय किए थे न कि वैज्ञानिकों ने. इसके नतीजों पर भरोसा करना खतरनाक हो सकता है. इसे मात दिया जा सकता है. बस खुद पर नियंत्रण रखने की जरूरत होती है."

हाल के सालों में बाजार में कई और तकनीकें भी आई हैं जिनके बारे में किए जा रहे दावों पर सरकार की ओर से जांच किए जाने की जरूरत है.

यूसीएल इंस्टीट्यूट ऑफ कॉग्निटिव न्यूरोसाइंस के निदेशक गेरिअंट रीज कहते हैं, "अगर दिमाग का कोई हिस्सा सक्रिय है तो हम यह नहीं कह सकते कि वह झूठ बोल रहा है. दिमाग का कोई हिस्सा एक साथ कई चीजें कर सकता है."

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